You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
ईरान जंग पर अल-क़ायदा की चुप्पी की वजह क्या है?
- Author, मीना अल-लामी
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
चरमपंथी संगठन अल क़ायदा 28 फ़रवरी से शुरू हुए अमेरिका-इसराइल और ईरान के युद्ध और उसके व्यापक असर पर ख़ास तौर पर चुप रहा है.
ऐसा होना सामान्य नहीं है, क्योंकि अल-क़ायदा और उससे जुड़े समूह आम तौर पर मध्य पूर्व की बड़ी घटनाओं पर प्रतिक्रिया देते रहे हैं.
ख़ासकर तब, जब ऐसे संघर्ष चरमपंथियों के बीच चर्चा में बने रहते हैं, जैसा कि इस बार हुआ है.
इस साल अल-क़ायदा के केंद्रीय नेतृत्व की तरफ़ से सिर्फ़ एक बयान 4 फरवरी को आया था.
वो भी उस समय जब अमेरिका ईरान के साथ तनातनी के बीच मध्य पूर्व में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा था.
उस बयान में अमेरिका और इसराइल के सैन्य ठिकानों पर हमले की अपील की गई थी, जिसे कई चरमपंथी संगठनों ने ईरान के अप्रत्यक्ष समर्थन के रूप में देखा.
अल-क़ायदा की इस चुप्पी के पीछे सोची-समझी वजहें हो सकती हैं.
ये संगठन असहज स्थिति में है. उसके नेता सैफ़ अल-अदल और उनके क़रीबी लोग कथित तौर पर ईरान में रहते हैं.
9/11 के हमलों के बाद अल-क़ायदा के कई प्रमुख नेता और उनके परिवार अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान से भागकर ईरान चले गए थे.
अमेरिकी एजेंसी एफ़बीआई की मौजूदा "मोस्ट वांटेड टेररिस्ट" लिस्ट में भी अल-अदल को "ईरान में मौजूद" बताया गया है.
एक तरफ़,अल-क़ायदा शायद ईरान को नाराज़ करने से बचना चाहता है, इसलिए वह उन चरमपंथी समूहों की लाइन में खुलकर शामिल नहीं हो रहा जो शिया बहुल ईरान के समर्थन के ख़िलाफ़ चेतावनी दे रहे हैं.
कट्टरपंथी गुटों ने लगभग एक सुर में सुन्नियों से कहा है कि वे किसी पक्ष में न जाएँ, ख़ासकर ईरान के प्रति सहानुभूति जताने से बचें.
दूसरी तरफ़, संगठन अमेरिका या इसराइल के ख़िलाफ़ और बयान देने से भी बचने की रणनीति अपना रहा हो, जैसा कि उसने चार फ़रवरी को किया था.
क्योंकि ऐसा करने पर उसे ईरान के अप्रत्यक्ष समर्थन के रूप में देखा जा सकता है.
इससे उसके अपने समर्थकों के बीच उसकी छवि को नुक़सान हो सकता है.
कट्टर जिहादी विचारधारा में शिया ईरान को सुन्नी इस्लाम का बड़ा दुश्मन और गंभीर ख़तरा माना जाता है.
जून 2025 में अमेरिका-इसराइल और ईरान के बीच हुए 12 दिन के युद्ध के दौरान भी अल-क़ायदा इसी तरह चुप रहा था.
इसके उलट, उसके कट्टर प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाला चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट काफ़ी सक्रिय रहा है और दोनों पक्षों की तीखी आलोचना कर रहा है.
कथित इस्लामिक स्टेट ने 4 फ़रवरी को अल-क़ायदा की ओर से अमेरिका के ख़िलाफ़ 'जिहाद' की अपील को इस बात के "सबूत" के रूप में पेश किया कि वह ईरान का मोहरा बनता जा रहा है.
नेतृत्व की स्थिति पर चुप्पी के मायने
ईरान संघर्ष पर अल-क़ायदा की चुप्पी उसके नेतृत्व की स्थिति पर लंबे समय से चली आ रही चुप्पी से भी जुड़ी हुई है.
अल-क़ायदा जुलाई 2022 से ही बिना किसी नेता के नाम के सार्वजनिक बयान जारी करता रहा है .
तब से जब अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में संगठन के तत्कालीन प्रमुख अयमान अल-ज़वाहिरी को मारने की घोषणा की थी.
यह सब तब हुआ,जबकि शुरुआती ख़बरों में कहा गया था कि संगठन के डिप्टी लीडर, मिस्र के सैफ़ अल-अदल ने नेतृत्व संभाल लिया है.
अल-क़ायदा ने इन ख़बरों की कभी आधिकारिक तौर पर पुष्टि या खंडन नहीं की, हालाँकि जिहादी हलकों में, यहाँ तक कि उसके अपने समर्थकों के बीच भी, अल-ज़वाहिरी की मौत और अल-अदल के नेतृत्व संभालने को व्यापक रूप से सच माना जाता है.
संभावना है कि अल-क़ायदा की यह चुप्पी इसलिए भी रही हो ताकि वह उसके सहयोगी माने जाने वाले तालिबान को असहज स्थिति में न डाले.
साथ ही इस पेचीदा सवाल से भी बच सके कि उसका नया नेता कथित तौर पर ईरान में रह रहा है, जिसे सुन्नी जिहादी एक बड़ा दुश्मन मानते हैं.
पहले अल-क़ायदा के अंदरूनी लोगों ने भी इस बात की पुष्टि की थी कि संगठन के कुछ शीर्ष नेता ईरान में ही मौजूद हैं.
2022 के बाद से, जहाँ कथित इस्लामिक स्टेट खुले तौर पर अल-क़ायदा पर ईरान के अधीन होने का आरोप लगाता रहा है और इसके लिए सैफ़ अल-अदल की वहाँ मौजूदगी का हवाला देता है.
वहीं अल-क़ायदा के समर्थकों ने इसे अलग तरह से समझाने की कोशिश की है.
उनका कहना है कि संगठन की परिस्थितियाँ सीमित हैं और अल-अदल असल में नज़रबंद थे या उन्हें देश छोड़ने की अनुमति नहीं थी.
इस तरह ऐसा लगता है कि अल-क़ायदा एक नाज़ुक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है.
एक तरफ़ अपने ज़्यादातर ईरान-विरोधी समर्थकों को संदेश देना और दूसरी तरफ़ ईरान को नाराज़ करने से बचना.
अल-क़ायदा के कुछ लोग व्यावहारिक कारणों से वैचारिक मतभेदों के बावजूद समय-समय पर ईरान के साथ सीमित रणनीतिक तालमेल को भी सही ठहरा सकते हैं.
ठीक वैसे ही जैसे हमास (जिसकी जड़ें मुस्लिम ब्रदरहुड में हैं) ने किया है.
संघर्ष पर चुप्पी साफ़ तौर पर अलग
इस साल अल क़ायदा के केंद्रीय नेतृत्व की तरफ़ से सिर्फ़ एक ही बयान आया था, चार फरवरी को.
इसमें मध्य पूर्व में अमेरिका की बढ़ती सैन्य मौज़ूदगी के ख़िलाफ़ मुसलमानों से लामबंद होने की अपील की गई थी.
इसके क्षेत्रीय संगठनों ने भी अमेरिका-इसराइल और ईरान के युद्ध पर कोई सीधा बयान जारी नहीं किया.
यहाँ तक कि यमन में उसका संगठन एक्यूएपी, जो हाल के वर्षों में अल-क़ायदा के केंद्रीय नेतृत्व की ग़ैर मौजूदगी में वैश्विक जिहादी संदेश देने में आगे रहा है, उसने भी कोई टिप्पणी नहीं की.
सिर्फ़ दक्षिण एशिया की शाखा, अल-क़ायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट (एक्यूआईएस) ने इस पर कुछ कहा.
यह आठ मार्च को एक्यूआईएस की पत्रिका "नवाए ग़ज़वत-ए-हिंद" के एक लेख में छपा हुआ था, जिसमें ईरान के प्रति हल्की सहानुभूति झलक रही थी.
आम तौर पर अल-क़ायदा इस्लामी दुनिया की बड़ी घटनाओं पर प्रतिक्रिया देता है.
उदाहरण के लिए, हाल के ग़जा संघर्ष पर उसने काफ़ी मुखर होकर बयान दिए थे, जबकि उसका प्रतिद्वंद्वी कथित इस्लामिक स्टेट उतना सक्रिय नहीं था.
फिर भी, ग़ज़ा संघर्ष पर अल-क़ायदा के कुछ बयानों को हमास के समर्थन के रूप में देखा गया.
और इस तरह इसे ईरान के शिया-प्रभाव वाले ''एक्सिस ऑफ़ रेजिस्टेंस'' के साथ जोड़कर समझा गया.
हमास नेताओं की मौत पर शोक जताने वाले बयानों के बाद ख़ासकर कथित इस्लामिक स्टेट की तरफ़ से यह आरोप लगाए गए कि अल-क़ायदा का संदेश ईरान से प्रभावित है.
इस नाज़ुक स्थिति को समझते हुए, अल-क़ायदा आम तौर पर हमास की खुलकर तारीफ़ करने से बचता रहा और इसके बजाय फ़लस्तीनी "मुजाहिदीन" या हमास की सैन्य शाखा इज्ज-अद-दीन अल-कासम ब्रिगेड पर ध्यान केंद्रित करता रहा.
इसे जिहादी हलकों में हमास के ईरान समर्थक राजनीतिक नेतृत्व की तुलना में कम विवादित माना जाता है.
जून 2025 में अमेरिका-इसराइल और ईरान के बीच हुए 12 दिन के युद्ध के दौरान भी अल-क़ायदा और उसके संगठन चुप रहे थे, लेकिन इस बार की चुप्पी और ज़्यादा ध्यान खींचती है.
क्योंकि यह संघर्ष बड़ा है और इस्लामी बहसों में इसका असर भी ज़्यादा है.
ज़्यादातर कट्टरपंथी धड़े यह कहते रहे हैं कि ईरान का साथ देना सही नहीं है, क्योंकि उनके मुताबिक़ वह सुन्नियों पर अत्याचार करता है.
वहीं, कुछ इस्लामी समूह ऐसे भी रहे हैं, जो ईरान के समर्थन की बात करते हैं, लेकिन उनकी संख्या कम है.
युद्ध से पहले अल-क़ायदा के संदेश का उल्टा असर
अमेरिका की सैन्य तैयारियों के बीच, अल-क़ायदा के चार फ़रवरी के बयान में मुसलमानों से अपील की गई थी कि वे पूरे क्षेत्र में अमेरिका और इसराइल के सैन्य ठिकानों, यहाँ तक कि समुद्री जहाज़ों को भी निशाना बनाएँ.
इस लामबंदी की अपील में अरब देशों की जनता और सरकारों को भी शामिल करने की बात कही गई थी.
और सरकारों को चेतावनी दी गई थी कि अगर उन्होंने अमेरिका की मौजूदगी और प्रभाव के ख़िलाफ़ कड़ा क़दम नहीं उठाया, तो उनका हाल भी वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो जैसा हो सकता है.
मादुरो को अमेरिका ने जनवरी में सत्ता से हटा दिया था.
ऑनलाइन अल-क़ायदा के समर्थकों के बीच इस बयान पर हल्की प्रतिक्रिया देखने को मिली थी.
अल-क़ायदा के शीर्ष नेतृत्व की तरफ़ से आया यह अहम बयान, जो एक साल में पहली बार आया था, कट्टरपंथी इस्लामी हलकों में न तो ज़्यादा साझा किया गया और न ही उस पर चर्चा हुई.
इससे यह संकेत मिलता है कि कहीं न कहीं असहजता थी. कुछ लोगों को इसकी टाइमिंग ठीक नहीं लगी लगा, क्योंकि उस वक़्त अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चल रहा था और ऐसा लग रहा था कि अगर सुन्नी कोई कार्रवाई करते हैं तो उसका फ़ायदा सबसे पहले ईरान को होगा.
अल-क़ायदा के प्रतिद्वंद्वी कथित इस्लामिक स्टेट के समर्थकों ने तुरंत इस बयान को ईरान के अप्रत्यक्ष समर्थन के रूप में पेश किया, क्योंकि अमेरिकी सैन्य तैयारियों का मुख्य निशाना ईरान था.
उन्होंने अल-क़ायदा पर आरोप लगाया कि वह असल में ईरान के "एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस'' का हिस्सा बनता जा रहा है.
यह धारणा 26 फरवरी को और मज़बूत हुई. यानी ईरान के साथ युद्ध शुरू होने से सिर्फ़ दो दिन पहले, जब आईएस ने एक लेख जारी कर अल-क़ायदा के 4 फरवरी के बयान का मज़ाक उड़ाया और इसे इस बात का "सबूत" बताया कि संगठन ईरान का समर्थन कर रहा है.
कथित इस्लामिक स्टेट ने यह भी कहा कि अब अल-क़ायदा की सोच और उसके आह्वान ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के इशारों पर तय हो रहे है.
और सैफ़ अल-अदल की "ईरान में मौजूदगी" की वजह से संगठन धीरे-धीरे ईरान के "शिया प्रभाव" में चला गया है.
अल-क़ायदा समर्थक समूहों का उदय
इस नए समूह का सामने आना (हालाँकि इसकी असलियत और इसके रिश्तों की अभी पुष्टि नहीं हुई है) समय के लिहाज से अहम माना जा रहा है, क्योंकि यह ईरान संघर्ष के बीच सामने आया है.
साथ ही, कथित इस्लामिक स्टेट के समर्थकों का दावा है कि यह अल-क़ायदा के ईरान के क़रीब जाने का एक संकेत हो सकता है.
एक मार्च को, यानी युद्ध शुरू होने के दो दिन बाद, एक रहस्यमय जिहादी समूह ने ख़ुद को अजनाद बैत अल-मक़दिस (यरुशलम के सैनिक) बताया.
यह समूह संभवतः सीरिया में सक्रिय है और इसने अल-क़ायदा के प्रति निष्ठा जताई है.
समूह ने कहा कि उसकी स्थापना अल-क़ायदा की "लामबंदी की अपील" के जवाब में की गई, जो शायद चार फ़रवरी वाले संदेश की ओर इशारा था.
नए समूह ने बाद में सीरिया और उसके आसपास अमेरिका और इसराइल की सेनाओं पर चार छोटे स्तर के हमलों का दावा किया.
अब तक अजनाद बैत अल-मक़दिस के बयानों और उसकी निष्ठा की घोषणा को अल-क़ायदा ने न तो स्वीकार किया है और न ही उसका समर्थन किया है.
कथित इस्लामिक स्टेट के समर्थकों ने इस समूह को ईरान का मोहरा बताकर ख़ारिज कर दिया.
कुछ समर्थकों ने यह भी कहा कि अगर यह समूह सच में अल-क़ायदा समर्थक है या उससे जुड़ा हुआ है, तो इससे उनका यह दावा और मज़बूत होता है कि अल-क़ायदा अब ईरान के इशारों पर काम कर रहा है.
इस शक को उस समय और बल मिला, जब इस नए समूह द्वारा बताए गए कुछ हमलों की ज़िम्मेदारी सीरिया में सक्रिय, ईरान समर्थक शिया समूहों (उली अल-बस और अजनाद-अल-करार) ने भी ली.
इससे यह संकेत मिला कि या तो हमलों को लेकर अलग-अलग दावे हो रहे हैं, या फिर इनके बीच किसी तरह का तालमेल हो सकता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)