अमेरिका से बातचीत के लिए ईरानी प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान पहुंचा, समझौते में किसे बताया जा रहा बड़ा रोड़ा

ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम के बाद शांति वार्ता पाकिस्तान में शुरू होगी

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अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के युद्धविराम के एलान के बाद शांति वार्ता पर बातचीत करने के लिए ईरान का प्रतिनिधिनिमंडल पाकिस्तान पहुंच गया है.

ईरान के सरकारी मीडिया ने ईरानी प्रतिनिधिमंडल के इस्लामाबाद पहुंचने की पुष्टि की है.

वहीं अमेरिका के उप राष्ट्रपति जेडी वेंस भी इस्लामाबाद रवाना हो गए हैं. वो इस शांति वार्ता में अमेरिका का प्रतिनिधित्व करेंगे. उनके साथ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ़ और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर भी हैं.

पाकिस्तान पिछले कुछ हफ्तों से ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ के रूप में काम कर रहा है.

उसका ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंध रहा है, जबकि ट्रंप का कहना है कि पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ईरान को 'ज़्यादातर लोगों से बेहतर' जानते हैं.

डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को ईरान की ओर से 10 सूत्री एक प्रस्ताव मिला है, जिसे उन्होंने "बातचीत के लिए एक वर्केबल बेसिस" बताया.

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने भी 15 बिंदुओं के एक प्रस्ताव का ज़िक्र किया. ट्रंप के मुख्य वार्ताकारों ने इसके बारे में कहा था कि इससे संघर्ष ख़त्म हो सकता है.

वेंस ने पत्रकारों से कहा कि वे "वार्ता का इंतज़ार कर रहे हैं", लेकिन साथ ही उन्होंने ईरान को चेतावनी भी दी.

उन्होंने कहा कि अगर ईरान "ईमानदारी से बातचीत नहीं करता" और "चाल चलने की कोशिश करता है" तो अमेरिका की ओर से सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलेगी.

हालांकि लेबनान पर इसराइल के हमले शांति वार्ता पर लगातार संदेह पैदा कर रहे हैं.

इससे पहले, ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बग़र गालिबाफ़ ने कहा कि लेबनान में युद्धविराम "बातचीत शुरू होने से पहले" होना चाहिए.

उन्होंने साफ़ किया कि जब तक लेबनान में सीज़फायर लागू नहीं होता और कुछ अन्य शर्तें पूरी नहीं होतीं, तब तक बातचीत शुरू नहीं हो सकती.

इस बयान से बातचीत की स्थिति को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है और यह दिखाता है कि ये बातचीत कितनी जटिल और शर्तों से भरी हुई हैं.

इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने जोर देकर कहा था कि युद्धविराम लेबनान पर लागू नहीं होता और बुधवार को उसकी सेना ने पूरे देश में कई ठिकानों पर बमबारी की, जिसमें लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार 300 से अधिक लोगों की मौत हो गई.

शुक्रवार शाम लेबनान ने कहा कि वह अगले हफ़्ते अमेरिका में इसराइल के साथ युद्धविराम पर चर्चा करेगा.

ट्रंप ने कहा, होर्मुज़ पर टोल नहीं लगाने देंगे

डोनाल्ड ट्रंप ने कहा उन्हें नहीं पता कि अमेरिका-ईरान वार्ता एक बार में ही ख़त्म हो जाएगी या आने वाले हफ्तों में जारी रहेगी

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इससे पहले ट्रंप से जब पूछा गया कि उन्होंने जेडी वेंस से क्या कहा तो उन्होंने कहा, ''मैंने उन्हें शुभकामनाएं दीं."

उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें नहीं पता कि अमेरिका-ईरान वार्ता एक बार में ही ख़त्म हो जाएगी या आने वाले हफ्तों में जारी रहेगी.

जब उनसे पूछा गया कि क्या कोई बैक-अप प्लान है तो उन्होंने कहा, "बैक-अप प्लान की ज़रूरत नहीं है."

एक अन्य पत्रकार ने पूछा कि उनके अनुसार ईरान के साथ एक अच्छा समझौता कैसा होगा.

उन्होंने कहा, "कोई परमाणु हथियार नहीं," और यह भी जोड़ा कि उन्हें लगता है कि सत्ता परिवर्तन पहले ही हो चुका है.

उन्होंने यह भी कहा कि होर्मुज़ स्ट्रेट ईरान के सहयोग के साथ या उसके बिना भी खोला जाएगा, हालांकि उन्होंने कहा कि अमेरिका को इसकी ज़रूरत नहीं है.

उन्होंने कहा, "हम इसे बहुत जल्द खोल देंगे.''

राष्ट्रपति से यह भी पूछा गया कि क्या ईरान होमुर्ज़ से गुजरने वाले जहाज़ों पर टोल लगाएगा.

इस पर उन्होंने जवाब दिया, "हम ऐसा होने नहीं देंगे."

ईरान की शर्तें बातचीत की जटिलताओं का संकेत देती हैं

पाकिस्तान के फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर भी ईरानी प्रतिनिधिमंडल के स्वागत के लिए पहुँचे

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पॉल एडम्स, बीबीसी के कूटनीतिक संवाददाता

ईरान के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे व्यक्ति द्वारा रखी गई पूर्व-शर्तें यह दिखाती हैं कि वार्ताकारों के सामने कितनी जटिल चुनौतियाँ हैं.

लेबनान में युद्धविराम और ईरान की अरबों डॉलर की संपत्तियों को छोड़ना इन शर्तों में शामिल है.

सबसे बड़ा और पुराना मुद्दा परमाणु कार्यक्रम का है, जो लंबे समय से पश्चिमी देशों की चिंता का केंद्र रहा है.

ईरान का कहना है कि उसने कभी परमाणु बम बनाने की कोशिश नहीं की. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप की ओर से आठ साल पहले एक पहले से तय परमाणु समझौते से हटने के बाद, ईरान ने अपने नागरिक कार्यक्रम की ज़रूरत से कहीं ज्यादा यूरेनियम एनरिच किया है.

अमेरिका चाहता है कि ईरान अपना मौजूदा संवर्धित यूरेनियम सौंप दे. माना जाता है कि ये इस्फहान के पास एक फैसिलिटी के मलबे के नीचे है.

साथ ही अमेरिका चाहता है कि ईरान ये भी वादा करे कि वह कभी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा.

ईरान का कहना है कि यूरेनियम एनरिचमेंट उसका अधिकार है और इस पर कोई समझौता नहीं होगा.

फिर आता है होर्मुज़ स्ट्रेट का मामला, जो इस युद्ध से पहले मुद्दा नहीं था, लेकिन अब ईरान का एक मजबूत हथियार बन गया है.

दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में से एक पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद, ईरान समुद्री यातायात के लिए नए नियम लागू करना चाहता है.

इसमें जहाजों की जांच का अधिकार, टोल लगाना या जरूरत पड़ने पर रास्ता रोकना भी शामिल हो सकता है.

दुनिया के कई देशों, खासकर खाड़ी क्षेत्र के देशों के लिए यह बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है.

समस्याएँ यहीं खत्म नहीं होतीं. अमेरिका और इज़राइल चाहते हैं कि ईरान अपने क्षेत्रीय प्रभाव को खत्म करे, जिसे वे नकारात्मक मानते हैं. वहीं, ईरान सभी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को पूरी तरह हटाने और पिछले महीने हुए नुकसान की भरपाई की मांग कर रहा है.

पिछले एक साल में, बातचीत जारी रहने के बावजूद दो बार हमले झेलने के बाद, ईरान यह गारंटी भी चाहता है कि भविष्य में ऐसा दोबारा नहीं होगा.

असल में, बहुत कम लोगों को उम्मीद है कि इन सभी मुद्दों का समाधान इस्लामाबाद में हो पाएगा.

मौजूदा नाजुक स्थिति को देखते हुए, ज्यादातर लोग सिर्फ़ इतना चाहते हैं कि युद्धविराम बना रहे.

गहरे अविश्वास की खाई पाटना सबसे बड़ी चुनौती

ईरान और अमेरिका

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इमेज कैप्शन, शांति वार्ता के लिए इस्लामाबाद पहुंचे ईरान के विदेश मंत्री और संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ के साथ पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक डार (सबसे दाएं)

लीस डुसेट, बीबीसी की प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संवाददाता

अगर इस सप्ताहांत इस्लामाबाद में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बग़र गालिबाफ़ की साथ खड़े होने वाली तस्वीर सामने आती है, तो वह इतिहास में दर्ज होगी.

यह इसलिए अहम होगा क्योंकि 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद पहली बार इतने उच्च स्तर पर आमने-सामने बातचीत होगी.

इसी क्रांति ने अमेरिका और ईरान के रिश्तों को गहरी खाई में धकेल दिया था, जिसकी छाया आज तक कायम है.

दोनों नेता शायद मुस्कुराएं भी नहीं, हाथ मिलाना भी ज़रूरी नहीं. लेकिन सिर्फ़ एक साथ खड़े होना ही यह संकेत देगा कि दोनों देश युद्ध को खत्म करना चाहते हैं. खतरनाक टकराव को टालना चाहते हैं और कूटनीति के रास्ते समझौता करना चाहते हैं

हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की "जल्द शांति समझौते" की उम्मीद काफी अवास्तविक मानी जा रही है.

जिस दो हफ़्ते के युद्धविराम की बात हो रही है, वह शुरुआत से ही विवादित रहा है और कई बार टूट भी चुका है.

आखिरी समय तक यह भी साफ़ नहीं था कि ईरान बातचीत के लिए आएगा या नहीं, जबकि इसराइल लेबनान में युद्धविराम को लेकर सख्त रुख़ अपनाए हुए है.

अगर यह बातचीत गंभीर और लगातार आगे बढ़ती है, तो यह 2018 के बाद सबसे बड़ा कूटनीतिक प्रयास होगा.

उसी साल ट्रंप ने ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका को बाहर कर लिया था, जिसे उन्होंने "इतिहास का सबसे खराब समझौता" कहा था.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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