क्या ट्रंप को 'छत से उतारने' के बदले पाकिस्तान को इनाम मिलेगा? - ब्लॉग

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- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पत्रकार एवं विश्लेषक, बीबीसी उर्दू
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
पिछले तीन महीनों के न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट, वॉल स्ट्रीट जर्नल, हारेत्ज़ और एक्सियोस वग़ैरह की 'ख़बरी खिचड़ी' पकाई जाए तो तश्तरी में कुछ यूं नज़र आएगा कि ईरान में दिसंबर-जनवरी के दंगों की राह आसान करने के लिए ईरानी रियाल की बची-खुची कमर तोड़ने के वास्ते डॉलर का अकाल पैदा किया गया.
इसका मक़सद यह था कि ईरानी मुद्रा के मूल्य खाई में गिरने से आम आदमी बेचैन होकर सड़कों पर निकल आए. यह बात पिछले महीने अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट कांग्रेस की एक कमेटी के सामने मान चुके हैं.
साथ ही साथ कुर्दिस्तान के रास्ते हथियार, स्टारलिंक कम्युनिकेशन उपकरणों और मास्टर ट्रेनर्स ईरान भेजने की भी भरपूर कोशिश होती है.
पिछले सरकार विरोधी जन-आंदोलनों के उलट 27 दिसंबर को तेहरान के बाज़ार से शुरू होने वाला यह विरोध प्रदर्शन न केवल रातों-रात 100 से ज़्यादा शहरों और क़स्बों तक फैल जाता है, बल्कि हथियारबंद लोग ख़ास तौर से थानों, सरकारी संपत्तियों और अधिकारियों को निशाना बनाते हैं.
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रज़ा पहलवी, नेतन्याहू और ट्रंप खुलकर कहते हैं कि डटे रहो, मदद रास्ते में है. मुल्लाओं का तख़्ता पलट दो. ईरानी सरकार इंटरनेट काट देती है.
आठ से 10 जनवरी के बीच जवाबी हिंसा होती है जिसमें तीन हज़ार से ज़्यादा लोग मारे जाते हैं. सरकारी सूत्रों का दावा है कि मरने वालों में लगभग 800 सुरक्षाकर्मी भी शामिल थे.
सन् 1953 में कुछ ऐसा ही काम सीआईए और एमआई-6 ने डॉक्टर मोहम्मद मुसद्दिक़ की सरकार के साथ किया था.
जनवरी 2026 में एमआई-6 की जगह मोसाद ने ले ली. बेस कैंप स्वायत्त इराक़ी कुर्दिस्तान को बनाया गया.
मोसाद और नेतन्याहू की सलाह

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ट्रंप ने अब से कुछ दिन पहले ख़ुद क़बूल किया कि उन्होंने कुर्दों के ज़रिए प्रदर्शनकारियों को हथियार भेजे, मगर "कुर्दों ने ये हथियार ख़ुद रख लिए, मैं उनसे खुश नहीं हूं."
मोसाद के प्रमुख डेविड बार्निया ने नेतन्याहू को ब्रीफ़िंग दी कि आख़िरी चोट के लिए लोहा गर्म है. ईरानी सरकार से आम आदमी सख़्त नफ़रत करता है, अगर टॉप लीडरशिप को उड़ा दिया जाए तो 47 साल से दबी जनता निकलकर बाक़ी काम ख़ुद कर लेगी.
नेतन्याहू और बार्निया ने इस दौरान दो बार व्हाइट हाउस में ट्रंप और उनकी टीम (विदेश मंत्री मार्को रुबियो, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ, चेयरमैन जॉइंट चीफ़्स ऑफ़ स्टाफ़ जनरल डैन केन और सीआईए चीफ़ जॉन रैटक्लिफ़ आदि) को लंबी ब्रीफ़िंग दी.
इन ब्रीफ़िंग्स में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शामिल नहीं थे.
पिछले साल जून में 12 दिनों की जंग के पहले ही दिन इसराइल ने जिस तरह तेहरान में फ़्रंटलाइन के सैन्य, परमाणु और राजनीतिक नेतृत्व का सफ़ाया कर दिया था, उस क़ामयाबी से अंदाज़ा हो गया था कि ईरान में मोसाद की जड़ें कितनी गहरी हैं.
ऐसे में ट्रंप और पीट हेगसेथ को यक़ीन था कि नेतन्याहू और डेविड बार्निया के विश्लेषण और अनुभवों पर भरोसा करते हुए दो से ढाई हफ़्ते का एक भरपूर और तेज़ ऐक्शन लिया जा सकता है.
बस शीर्ष नेतृत्व का सिर कटने की देर है, ईरानी राज्य ख़ुद-ब-ख़ुद इराक़ की तरह ज़मींदोज़ हो जाएगा.
हालांकि मार्को रुबियो का विश्लेषण था कि अमेरिकी नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े संस्थानों की आम राय है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम अमेरिका के लिए तत्काल ख़तरा नहीं है, इसलिए फ़िलहाल किसी निर्णायक कार्रवाई की तत्काल ज़रूरत नहीं है.
जनरल डैन केन की राय थी कि बड़ी कार्रवाई के लिए विस्तृत योजना की ज़रूरत है ताकि तेल और गैस की सप्लाई और सहयोगी खाड़ी देशों पर कम से कम असर हो, इसके लिए प्रभावी सैन्य रणनीति तैयार की जा सके.
नेतन्याहू और डेविड बार्निया की 11 फ़रवरी की आख़िरी व्हाइट हाउस ब्रीफ़िंग की भनक लगते ही खाड़ी देशों ने भी जल्दबाज़ ट्रंप पर दबाव डालने की अपनी तरफ़ से कोशिश की.
वैसे तो नेशनल सिक्योरिटी के एक अधिकारी के अनुसार, ट्रंप अक्सर महत्वपूर्ण फ़ैसले दिमाग़ से ज़्यादा दिल की आवाज़ पर करने के आदी हैं, मगर हर बार जुआ कामयाब नहीं होता.
जब 'किचन कैबिनेट' ने देखा कि ट्रंप जंग पर तुले ही हुए हैं तो फिर हर कोई लाइन में सीधा हो गया.
ईरान के बारे में ग़लत अंदाज़ा

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ट्रंप को इसराइल के ईरानी अनुभव और आश्वासन पर इतना भरोसा था कि 'नेटो' के सहयोगियों, खाड़ी के जिगरी दोस्तों, जापान, दक्षिण कोरिया, कांग्रेस और वोटरों को भी विश्वास में लेने की जहमत नहीं उठाई.
वैसे भी जिस युद्ध के छह दिन में ख़त्म होने का गुमान हो, उसके बारे में व्हाइट हाउस, पेंटागन और विदेश मंत्रालय के अलावा किसी और को विश्वास में लेने का क्या तुक है!
नेतन्याहू और उनके साथियों की सोच कुछ ऐसी है कि चाहे ईरान तबाह हो या उसके जवाब में खाड़ी देशों का 'तिया पांचा' (सर्वनाश) हो जाए, क्या फ़र्क़ पड़ता है.
मैदान साफ़ होने से असली फ़ायदा तो इसराइल का ही है.
यह सोच इसराइल में ऊपर से नीचे तक मौजूद थी और है. मगर इसराइल के लिए ईरान का निवाला मुंह से बड़ा था, इसलिए नेतन्याहू के बक़ौल "ट्रंप के रूप में मेरी 40 साल की तपस्या रंग ले आई."
इसराइल के उलट अमेरिका की दिलचस्पी, ईरान की पूरी तबाही से ज़्यादा 'रिजीम चेंज' (सत्ता परिवर्तन) के ज़रिए परमाणु और मिसाइल प्रोग्राम के ख़ात्मे और तेल तक नियंत्रण में है.
अगर ऐसा हो जाए तो वेनेज़ुएला पर क़ब्ज़े के बाद चीन को ऊर्जा के एक और स्रोत से महरूम करने के साथ-साथ खाड़ी में 1970 के दशक की तरह अमेरिकी दबदबे को दोबारा बनाना भी मुमकिन हो जाएगा.
यह सही है कि ईरान में इसराइली इंटेलिजेंस नेटवर्क मज़बूत है और यह ताना-बाना अमेरिकी सीआईए के लिए भी आंख, कान और नाक का काम करता है.
मगर शायद यह अंदाज़ा इसराइल को भी नहीं था कि ईरान के शीर्ष राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के ख़ात्मे के बावजूद, ईरान एक साही (पोरक्युपाइन) की तरह ख़ुद को ऐसा गोल-मटोल कर लेगा कि उसे निगलना लगभग नामुमकिन हो जाएगा.
यह अंदाज़ा अमेरिकी नेतृत्व को शायद जंग के दूसरे हफ़्ते में ही हो गया था. मगर समझदारी के साथ पीछे हटने के बारे में सोचने के बजाय, अगले चार हफ़्तों में अमेरिकी अड्डों और खाड़ी सहयोगियों पर लगने वाले लगातार ज़ख्मों का नतीजा यह निकला कि अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का दम घुटने लगा.
इसलिए रिजीम चेंज की ख़्वाहिश 'होर्मुज़ जलडमरूमध्य' खुलवाने तक सिमट कर रह गई. हालांकि इसे बंद करवाने के असली ज़िम्मेदार भी इसराइली और अमेरिकी ही थे.
ट्रंप को निकलने की सीढ़ी चाहिए थी

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इस युद्ध से यह बात भी साफ़ हो गई कि एक अकेली सैन्य महाशक्ति की ताक़त भी असीमित नहीं है.
जिन देशों ने इस छतरी को अपने लिए काफ़ी समझा था, उन्हें भी अच्छी तरह पता चल गया कि एक ही टोकरी में सारे अंडे रखना कितना महंगा पड़ सकता है.
यूक्रेन युद्ध के कारण रूस का 'हुक़्क़ा-पानी' फ़रवरी 2022 से बंद था.
इन 40 दिनों में न केवल रूस की आर्थिक मुश्किलें काफ़ी हद तक हल हो गईं बल्कि युद्ध का सबसे ज़्यादा आर्थिक लाभ भी उसी को पहुंचा.
जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया में भी बहस शुरू हो गई है कि सुरक्षा की गारंटी बाहर से नहीं, अंदर से ही मिल सकती है.
दो दिन पहले तक ट्रंप साहब संकट की छत पर अकेले टहल रहे थे और मुक्के लहराते हुए सभ्यताओं को तबाह कर रहे थे.
यह स्थिति देखकर क्या मास्को, क्या बीजिंग, क्या ब्रसेल्स और क्या अमेरिकी कांग्रेस- सबने दांतों तले अंगुली दबा ली.
मैं इस दीवार पर चढ़ तो गया था
उतारे कौन अब दीवार पर से- जौन एलिया
इसलिए उन्हें जब पाकिस्तान की तरफ़ से दो हफ़्ते के 'सीज़फ़ायर' की सीढ़ी अर्जेंट में उपलब्ध कराई गई तो उन्होंने उसे फ़ौरन इस्तेमाल कर लिया.
ईरान की कामयाबी यही है कि वह लगातार मार सहने के बावजूद खड़ा है.
पाकिस्तान को क्या मिलेगा?

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अब जो बातचीत होगी वह पिछले दौर की एकतरफ़ा डिक्टेशन के बजाय 'कुछ लो और कुछ दो' के तहत ही होगी.
इसराइल का क्या होगा, यह अमेरिका जाने या इसराइल. नेटो को ख़ुदा माफ़ करे.
पाकिस्तान, जो पिछले सितंबर में सऊदी अरब की सुरक्षा का समझौता कर बैठा था, उसकी जान में भी जान आई.
इस आपाधापी और भाग-दौड़ के बदले 'शाबाशी' के अलावा भी क्या इस्लामाबाद और पिंडी (रावलपिंडी) वालों को कुछ मिलेगा? देखते हैं.
अब डर यह है कि ट्रंप अपनी 'मागा' (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) वाली 'चमत्कारी छवि' बहाल करने के चक्कर में कहीं क्यूबा को न कूट डालें.
नवंबर के कांग्रेस चुनावों में वोटरों को दिखाने-बताने के लिए कुछ तो होना चाहिए.
जिनके रुतबे हैं सिवा, उनको सिवा मुश्किल है (छन्नू लाल दिलगीर).
यानी जो ऊंचे रुतबे वाले होते हैं उनकी मुश्किलें भी ज़्यादा होती हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
































