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पेन-किलर लेते ही मिनटों में कैसे ख़त्म हो जाता है दर्द?
दर्द अच्छा है. ये नहीं होगा तो दिमाग़ को चोट का पता नहीं लगेगा.
ये अर्ली वॉर्निंग सिस्टम है. बॉडी में पेन डिटेक्टर होते हैं और इन स्पेशल नर्व सेल को नोसिसेप्टर कहा जाता है.
ये इलेक्ट्रिक सिग्नल इस्तेमाल करते हैं और ब्रेन के पास इंफो भेजते हैं.
नोसिसेप्टर तब फायर होते हैं, जब शरीर को कोई नुकसान पहुंचता है.
जब टिशू ज़ख़्मी होते हैं तो नर्व, ट्यूनिंग केमिकल प्रोड्यूस करने लगते हैं. ये केमिकल नोसिसेप्टर के थ्रेशहोल्ड को इतना नीचे ले जाते हैं कि छूने भर से दर्द होने लगता है.
ऐसा ही एक केमिकल है प्रोस्टाग्लैंडिन. ये इंजरी साइट पर बनते हैं और पेन सिग्नल को एम्पलीफ़ाई करते हैं.
अब बात पेनकिलर की, जो इन्हीं ट्यूनिंग केमिकल के प्रोडक्शन को रोकती हैं.
जब सेल्स डैमेज होते हैं तो वो एरिकेडोनिक एसिड केमिकल रिलीज़ करते हैं. COX 1 और COX 2 एंज़ाइम इस एसिड को प्रोस्टाग्लैंडिन में बदलते हैं.
सभी एंज़ाइम में एक एक्टिव साइट होती है. COX 1 और COX 2 की एक्टिव साइट में एरिकेडोनिक एसिड फिट होता है.
पेनकिलर दवाएं इसी बाइंडिंग या आसान भाषा में कहें तो फिटिंग को रोकती हैं.
ये दवाएं COX एंज़ाइम की एक्टिव साइट को परमानेंटली इनएक्टिव कर देती है, जिससे एरिकेडोनिक एसिड फिट नहीं हो पाता.
कुछ पेनकिलर COX के साथ बाइंड नहीं करती, लेकिन एंजाइम के एक्शन को रोक देती है.
लेकिन इन दवाओं को पता कैसे लगता है कि दर्द कहां है? नहीं पता लगता.
वो ब्लडस्ट्रीम में घुलती है और शरीर में सभी जगह पहुंच जाती है. वहां भी जहां चोट होती है और उनके असर दिखाने पर हमें चोट का अहसास कम होने लगता है.
बस यही है इस छोटी सी गोली का बड़ा कारनामा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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