दिल्ली में यमुना किनारे क्यों चले बुलडोज़र, क्या आगे और भी इलाक़े आएंगे ज़द में?: ग्राउंड रिपोर्ट

बुलडोज़र

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इमेज कैप्शन, दिल्ली में बीते कुछ हफ़्तों में यमुना किनारे बसे इलाक़ों में बुलडोज़र कार्रवाई हुई है
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25 जून की सुबह जैसे ही दिन निकला, यमुना के निगमबोध घाट के क़रीब घाटों से सटी बस्ती को सुरक्षा बलों ने घेर लिया. नाकेबंदी के बीच बुलडोज़र अंदर दाख़िल हुए और शाम तक जहां क़रीब एक हज़ार लोग रहते थे, वहां सिर्फ़ मलबे के ढेर बचे थे.

यमुना किनारे उस दिन सिर्फ़ मकान नहीं ढह रहे थे. बुलडोज़र की हर चोट के साथ किसी का घर टूट रहा था, किसी की जमा-पूंजी मलबे में बदल रही थी और किसी के सामने यह सवाल खड़ा था कि अब आगे जाएं तो कहां?

फ़तेहचंद भी उन्हीं लोगों में से एक हैं. उनका कहना है कि उनका परिवार यहां 1954 से रह रहा है. बुलडोज़रों के शोर के बीच उनका परिवार घर से जो कुछ बचा सकता था, उसे समेटने में लगा था.

अब उन्हें अपने परिवार के साथ किराए के मकान में नई ज़िंदगी शुरू करनी होगी. ऐसे हालात से गुज़र रहे वो अकेले नहीं थे, लगभग हर दूसरे व्यक्ति की यही कहानी थी.

शाम होते-होते जब बुलडोज़र पीछे मलबे के ढेर छोड़ते हुए बस्ती के आख़िरी छोर तक पहुंच गए, तो सड़क किनारे सिर्फ़ सामान ही नहीं बल्कि बेघर हुए लोग भी थे.

उन्हीं के बीच कई कबाड़ी भी थे, जो ओने-पौने दाम पर मलबा और सामान ख़रीद रहे थे.

दिल्ली में पिछले कुछ हफ़्तों के भीतर निगमबोध घाट के पास यमुना बाज़ार से लेकर मदनपुर खादर और उत्तर में जगतपुर गांव तक कई जगह दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) और दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) की ध्वस्तीकरण कार्रवाइयां हुई हैं.

प्रशासन का कहना है कि अदालतों के निर्देशों के तहत यमुना के बाढ़ क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त किया जा रहा है.

लेकिन जिन लोगों के घर टूट रहे हैं, उनके लिए यह सिर्फ़ एक सरकारी अभियान नहीं, बल्कि अचानक सबकुछ ख़त्म हो जाने जैसा है.

वीडियो कैप्शन, यमुना को बचाने का सवाल, घरों पर चलता बुलडोज़र, क्या है यहां की तस्वीर?

क्या है ज़ोन ओ?

हाल के दिनों में, यमुना बाढ़ क्षेत्र में ज़ोन ओ लिखे बोर्ड लगाए गए हैं

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दिल्ली विकास प्राधिकरण ने दिल्ली को मुख्य रूप से पंद्रह अलग-अलग विकास क्षेत्रों में या ज़ोन में बांटा है और इनका नामांकन अंग्रेज़ी अक्षरों ए, बी, सी और डी के आधार पर किया है. यमुना के बाढ़ क्षेत्र को 'ज़ोन ओ' कहा गया है.

यमुना के बाढ़ क्षेत्र को संरक्षित रखने का कॉन्सेप्ट नया नहीं है. दिल्ली के पहले मास्टर प्लान में भी इस इलाक़े के नियोजित विकास पर ज़ोर दिया गया था.

बाद में 1990 में मास्टर प्लान-2001 के तहत यमुना के बाढ़ क्षेत्र को औपचारिक रूप से 'ज़ोन-ओ' के रूप में चिह्नित किया गया.

2010 में डीडीए ने ज़ोन-ओ का ज़ोनल डेवलपमेंट प्लान अधिसूचित किया और इसके संरक्षण के लिए विस्तृत नियम बनाए गए.

डीडीए के प्रस्तावित मास्टर प्लान 2041 में भी इस क्षेत्र को दो हिस्सों ओ-1 और ओ-2 में बांटने का प्रस्ताव है.

शहरी नियोजन विशेषज्ञ दीपिंदर कपूर बताते हैं कि ओ-1 को कोर फ्लड प्लेन माना गया है, जहां किसी भी तरह के निर्माण की अनुमति नहीं है जबकि ओ-2 में सीमित और प्रकृति आधारित गतिविधियों, जैसे जैव विविधता पार्क, हरित क्षेत्र और सार्वजनिक उपयोग की कुछ परियोजनाओं पर विचार किया गया है.

दिल्ली विकास प्राधिकरण ने एनजीटी को बताया है कि यमुना का बाढ़ क्षेत्र, यानी ज़ोन ओ, क़रीब 9,700 हेक्टेयर में फैला है. इसी क्षेत्र में 91 अनाधिकृत कॉलोनियां हैं, जहां लगभग 20 से 25 लाख लोग रहते हैं.

डीडीए ज़ोन ओ में 3,969.54 हेक्टेयर ज़मीन का प्रबंधन करता है. डीडीए के मुताबिक़ ज़ोन ओ क्षेत्र में 807 हेक्टेयर ज़मीन पर अनाधिकृत कॉलोनियां हैं और उसकी क़रीब 184 हेक्टेयर ज़मीन पर अवैध निर्माण हैं.

डीडीए के मास्टर प्लान में यमुना बाढ़ क्षेत्र में जैव विविधता पार्क, वेटलैंड, जंगल और आम लोगों के लिए हरे-भरे इलाकों के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव है.

लेकिन ज़मीन पर इस योजना और वास्तविकता के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है.

यमुना के किनारे कई ऐसे इलाक़े हैं जहां कई सालों से लोग रह रहे हैं. कुछ जगह नई इमारतें बनी हैं. कुछ जगह पुराने गांव हैं.

अदालतों के आदेश

एनजीटी ने अप्रैल 2025 में डीडीए से अवैध निर्माण हटाने की समयबद्ध कार्य योजना मांगी थी

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इमेज कैप्शन, एनजीटी ने अप्रैल 2025 में डीडीए से अवैध निर्माण हटाने की समयबद्ध कार्य योजना मांगी थी

जो ध्वस्तीकरण कार्रवाइयां फ़िलहाल चल रही हैं उनके केंद्र में अदालतों के दो अहम आदेश हैं.

अप्रैल 2025 में दिए एक अहम आदेश में एनजीटी (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) ने डीडीए से अवैध निर्माण हटाने की समयबद्ध योजना देने के लिए कहा था.

वहीं, इसी साल 28 मार्च को दिए एक अहम आदेश में दिल्ली हाई कोर्ट ने अवैध निर्माण पर सख़्त रुख़ अपनाते हुए कहा था कि ताज़ा हुए निर्माण को दो सप्ताह के भीतर तोड़ा जाए.

अदालत ने डीडीए को नोडल एजेंसी मानते हुए स्पेशल टास्क फोर्स के माध्यम से कार्रवाई जारी रखने को कहा.

साथ ही अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए कि यमुना के बाढ़ क्षेत्र में नया निर्माण किसी भी क़ीमत पर न होने पाए.

अपने आदेश में अवैध निर्माण पर टिप्पणी करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा, "यमुना के बाढ़ क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर निर्माण एक रात में नहीं हुए हैं बल्कि यहां एजेंसियों और अधिकारियों की कई सालों से चली आ रही लापरवाहियों का नतीजा हैं."

बुलडोज़र कार्रवाइयां

यमुना से सटे कई इलाक़ों में डीडीए ने ध्वस्तीकरण कार्रवाइयां की हैं

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इमेज कैप्शन, यमुना से सटे कई इलाक़ों में डीडीए ने ध्वस्तीकरण कार्रवाइयां की हैं

यमुना बाज़ार में अपने टूटे पुश्तैनी मकान के सामने खड़ीं प्रभा शर्मा की आंखों में आंसू और आवाज़ में दर्द था. वो चीखते हुए कहती हैं, "बिना ऑर्डर के तोड़ दिया... बिना ऑर्डर के."

पास खड़े परिवार के लोग उन्हें संभालने की कोशिश करते हैं. थोड़ी दूर एक और महिला अपने भविष्य को लेकर चिंता जताते हुए कहती हैं, "हमें सिर्फ़ इतना कहा गया कि जाकर रैन बसेरे में रह लो. हमें कुछ नहीं मिला. हम परिवार वाले लोग हैं. क्या हम अपनी बेटियों को लेकर रैन बसेरों में रहें? जो इंसान यहां सालों से रह रहा है, जिसकी पीढ़ियां निकल गईं, वह कहां चला जाए?"

उनका परिवार यमुना घाट पर होने वाले धार्मिक कर्मकांडों से जुड़ा रहा है. वो कहती हैं, "यहीं पिंडदान होते हैं, यहीं हमारी रोज़ी-रोटी थी. सब छीन लिया."

बिलखते हुए लोग

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इमेज कैप्शन, बुलडोज़र कार्रवाई में कई लोगों के घरों को भी ढहाया गया है

लेकिन ध्वस्तीकरण के इन अभियानों से सिर्फ़ यमुना से बिलकुल सटे इलाक़ों में बसे लोग ही चिंतित नहीं है बल्कि यमुना किनारे दशकों पहले आबाद हुई बस्तियों और गांवों के बाशिंदे भी इससे आशंका में हैं.

उत्तरी दिल्ली के जगतपुर गांव से लेकर दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के मदनपुर खादर तक कई इलाकों में जगह-जगह नए लगाए गए ज़ोन ओ के बोर्ड और टूटे हुए घर नज़र आते हैं.

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा है कि किसी भी पुराने निर्माण को नहीं तोड़ा जाएगा. दक्षिणी दिल्ली से सांसद रामवीर सिंह बिधूड़ी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि पुरानी आबादी और बस्तियों को ज़ोन ओ के दायरे से बाहर रखा जाएगा.

बावजूद इसके, एक सवाल हर जगह सुनाई देता है, 'क्या अगला नंबर उनका है?'

उत्तरी दिल्ली के जगतपुर गांव के रहने वाले सुशील चौधरी कहते हैं कि यह गांव दशकों पुराना है, गांव में पुराने मंदिर हैं, चौपाल है, सरकारी स्कूल हैं. उनके मुताबिक यहां रहने वाले लोगों के मन में अब डर बैठ गया है.

सुशील चौधरी कहते हैं, "सत्तर साल पहले सरकार ने इस गांव को बसाया था. आज अगर इसी गांव में ज़ोन ओ के नाम पर बुलडोज़र पहुंचे हैं तो लोगों में दहशत होना स्वाभाविक है."

बाबूराम

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इमेज कैप्शन, बाबूराम अपनी पेंशन की कमाई से घर बना रहे थे जिसे तोड़ दिया गया

यमुना के तटबंध के किनारे बसे इस गांव में रहने वाले लोगों का कहना है कि जिस ज़मीन पर वे रहते हैं, वे उनकी पुश्तैनी ज़मीन है. उनका दावा है कि कई बार बाढ़ आने के बाद गांव को सरकार ने ही दूसरी जगह बसाया था.

बुज़ुर्ग महिला चंद्रकला का परिवार नया घर बना रहा था. कुछ दिन पहले निर्माणाधीन इमारत पर बुलडोज़र चल गया.

मुआवज़े की मांग करते हुए चंद्रकला कहती हैं, "यह गांव कम से कम चौथी बार बसा है. पहले तीन बार यमुना में कट गया. फिर सरकार ने नक्शा बनाकर यहां बसाया. अब हमारा घर तोड़ दिया, सरकार हमें मुआवज़ा दे."

वो सवाल करती हैं, "इतने लोगों को सरकार कहां बसाएगी? क्या सरकार नई ज़मीन पैदा कर देगी?"

एक स्थानीय निवासी कहते हैं, "अगर हमारे गांव का कोई मकान सचमुच फ्लड एरिया में आता है तो उसे गिरा दीजिए. लेकिन जो हमारी पुश्तैनी ज़मीन है, जहां हमें सरकार ने बसाया, उसे कैसे छोड़ दें?"

बाबूराम ने अपनी पेंशन की कमाई से नया घर बनाना शुरू किया था. दो मंज़िल पर छत पड़ चुकी थी. आंखों में आंसुओं को किसी तरह थामते हुए वो कहते हैं, "18-20 लाख रुपये लगा दिए थे, बच्चों के लिए घर बना रहा था, प्रशासन अचानक आ गया और सब तोड़ दिया. जब बन रहा था तब कोई रोकने नहीं आया."

अपने मकान के मलबे को देखते हुए बाबूराम कहते हैं, "बुलडोज़र से सिर्फ़ हमारा घर नहीं टूटा है बल्कि साख़ भी ख़त्म हो गई है. ऐसा लग रहा है कि हम ही अवैध हों, अब कौन हमारे बच्चों के लिए रिश्ता भेजेगा? लोगों को तो यही लगेगा कि हम कोई ग़लत काम करते हैं."

पनपता भ्रष्टाचार

मदनपुर खादर इलाक़े में एक तोड़ दी गई बिल्डिंग

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इमेज कैप्शन, मदनपुर खादर इलाक़े में ढहाई गई एक बिल्डिंग

दक्षिण पूर्वी दिल्ली के मदनपुर खादर के कई हिस्सों में कुछ साल पहले तक जहां खेत थे, अब वहां बहुमंज़िला इमारतें दिखाई देती हैं.

कई इमारतों पर हाल में बुलडोज़र चल चुका है. कुछ अधूरी खड़ी हैं. कुछ के सिर्फ़ ढांचे बचे हैं.

यहीं सबसे बड़ा सवाल सामने आता है. पर्यावरण की दृष्टि से इतने संवेदनशील इलाक़े में इतने बड़े पैमाने पर निर्माण आख़िर होने कैसे दिए गए?

स्थानीय लोगों का कहना है कि ज़मीन की ख़रीद-फ़रोख़्त खुलेआम होती रही. इमारतें बनती रहीं. बिजली, पानी और दूसरी सुविधाएं भी धीरे-धीरे पहुंचती गईं.

यमुना खादर के मक्की मस्जिद इलाक़े में एक प्रॉपर्टी डीलर अपना नाम ज़ाहिर न करते हुए कहते हैं, "पता सबको था कि यह सब अवैध है लेकिन प्रॉपर्टी और निर्माण के इस खेल में पैसा इतना ज़्यादा था कि सबकी आंखें बंद हो गईं. जो मकान ख़रीद रहे थे, उन्हें पूरी जानकारी नहीं थी, उनका पैसा फंस गया, कुछ का तो डूब गया."

मदनपुर खादर के रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता गगनदीप ज़ैलदार सवाल करते हैं, "अगर यह सब नियमों के ख़िलाफ़ था, तो ज़िम्मेदार एजेंसियां इतने सालों तक क्या करती रहीं?"

गगनदीन यमुना किनारे हो रही कार्रवाई को दो धारी तलवार बताते हुए कहते हैं, "एक तरफ़ अवैध निर्माण से भ्रष्टाचार बढ़ रहा है तो दूसरी तरफ़ बुलडोज़र कार्रवाइयों से लोगों का अपना घर होने का सपना टूट रहा है. यमुना को जो नुक़सान होना था हो गया,जो लोग घर बनाने की मंशा रखते थे उनमें ख़ौफ़ है. लोगों में अनिश्चितता है कि उन्हें कभी भी हटाया जा सकता है."

अब भी जारी हैं निर्माण

बीबीसी को संरक्षित ज़ोन ओ इलाक़े में कई जगह निर्माण होते हुए दिखे

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यमुना के बाढ़ क्षेत्र में अवैध निर्माण को रोकने के लिए डीडीए के नेतृत्व में स्पेशल टास्क फ़ोर्स सक्रिय है. इसमें दिल्ली पुलिस, एमसीडी, दिल्ली जल बोर्ड के अलावा कई एजेंसियों के अधिकारी हैं.

इस टॉस्क फ़ोर्स का घोषित उद्देश्य यमुना बाढ़ क्षेत्र में किसी भी तरह के अवैध निर्माण को रोकना है और जानकारी मिलते ही कार्रवाई करना है.

हाई कोर्ट ने अवैध निर्माण पर निगरानी करने के लिए ड्रोन सर्वे का आदेश दिया था. डीडीए ने अदालत को बताया है कि यह सर्वे पूरा कर लिया गया है. हाई कोर्ट ने नए आदेश में दूसरा ड्रोन सर्वे करने और नए निर्माण को चिन्हित करने का आदेश दिया है.

हाई कोर्ट ने बाढ़ क्षेत्र में आने वाले दिल्ली पुलिस के सभी थानों के एसएचओ को भी अवैध निर्माण रोकने का आदेश दिया था.

इन आदेशों के बाद यमुना के किनारे कार्रवाई तेज़ हो गई. लेकिन ज़मीन पर तस्वीर एक जैसी नहीं दिखती.

हमने यमुना के बाढ़ क्षेत्र के कई हिस्सों का दौरा किया. कहीं हाल में गिरे मकानों का मलबा दिखाई दिया, तो कहीं ऐसी इमारतें भी दिखीं जिनका निर्माण अभी जारी था. कहीं सरियों से निकले ढांचे खड़े थे, कहीं मज़दूर काम कर रहे थे.

यही विरोधाभास स्थानीय लोगों के सवालों की वजह भी है.

अगर अदालतें और सरकारी एजेंसियां लगातार कह रही हैं कि फ्लड प्लेन में नया निर्माण नहीं होना चाहिए, तो फिर ऐसे निर्माण हो कैसे रहे हैं?

अगर ये निर्माण अवैध हैं, तो इन्हें बनने से पहले क्यों नहीं रोका गया?

और अगर ये वैध हैं, तो फिर दूसरे इलाक़ों में ध्वस्तीकरण किस आधार पर हो रहा है?

बीबीसी ने डीडीए और एमसीडी से इन सवालों पर प्रतिक्रिया मांगी है, लेकिन ये रिपोर्ट लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला.

यमुना के संरक्षण का सवाल

पर्यावरणविद् प्रोफ़ेसर सीआर बाबू का कहना है कि यदि निर्माण चलता रहा तो यमुना मर जाएगी

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यमुना का बाढ़ क्षेत्र पिछले कुछ दशकों में लगातार सिकुड़ रहा है. जहां कभी खेत थे वहां बस्तियां हैं.

प्रदूषण और अतिक्रमण की मार झेल रही यमुना को बचाने का मुद्दा लंबे समय से उठता रहा है.

2018 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने यमुना मॉनिटरिंग कमेटी बनाई. कमेटी ने 2020 में दी गई अपनी रिपोर्ट में कहा कि नदी को फिर से ज़िंदा करने के लिए केवल अतिक्रमण हटाना काफ़ी नहीं होगा, बाढ़ क्षेत्र की बहाली, सीवर के प्रदूषण पर रोक, पानी के बहाव को बहाल करना और नए निर्माण पर प्रभावी नियंत्रण भी उतना ही ज़रूरी है.

विशेषज्ञों का तर्क है कि नदी के प्राकृतिक प्रवाह और पर्यावरण की रक्षा के लिए यहां से अवैध निर्माण हटाना ज़रूरी है. अदालतों ने भी समय-समय पर इसी चिंता को दोहराया है.

यमुना और पर्यावरण पर लंबे समय से काम कर रहे प्रोफ़ेसर सी.आर. बाबू कहते हैं कि फ्लड प्लेन यानी बाढ़ क्षेत्र किसी भी नदी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है.

यमुना मॉनिटरिंग कमेटी के सलाहकार रहे प्रोफ़ेसर बाबू चेताते हुए कहते हैं, "ज़ोन ओ में किसी भी तरह का निर्माण रुकना चाहिए. अगर फ्लड प्लेन ख़त्म हो गया तो नदी भी ख़त्म हो जाएगी."

प्रोफ़ेसर सीआर बाबू कहते हैं, "नदी जब उफान पर होती है, तो यही इलाक़ा अतिरिक्त पानी को अपने भीतर समेटता है. यही ज़मीन भूजल को रीचार्ज करती है और नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखती है. अगर इस पर लगातार निर्माण होता रहा तो एक दिन यमुना सूख जाएगी."

बाढ़ का ख़तरा

यमुना नदी

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इमेज कैप्शन, 2023 की बाढ़ के बाद से यमुना के बाढ़ क्षेत्र के संरक्षण का मुद्दा गंभीर हो गया

एक बड़ा ख़तरा बाढ़ का भी है. साल 2023 में दिल्ली में यमुना नदी में बड़े पैमाने पर बाढ़ आई थी, पानी सुप्रीम कोर्ट की इमारत के नज़दीक तक आ पहुंचा था और कई इलाक़े डूब गए थे.

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ अर्बन अफ़ेयर्स से जुड़े शहरी नियोजन विशेषज्ञ दीपिंदर कपूर कहते हैं, "यमुना हिमालय से निकलने वाली नदी है. इसमें कभी भी अचानक बड़े पैमाने पर बाढ़ आने की आशंका बनी रहती है"

कपूर कहते हैं, "अगर फ्लड प्लेन में स्थायी निर्माण हो जाएगा, तो बाढ़ आने पर सबसे पहले वही ख़तरे में होगा. 2023 की बाढ़ में दिल्ली ने इसका असर देखा भी. कई इलाके पानी में डूब गए थे."

उनका कहना है कि शहर की योजना बनाते समय यह तय करना होगा कि किन इलाक़ों को हर हाल में खुला छोड़ना ज़रूरी है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो भविष्य में नुक़सान और बड़ा हो सकता है.

2023 की बाढ़ के बाद से यमुना के बाढ़ क्षेत्र के संरक्षण का मुद्दा और गंभीर हो गया था.

सवाल आवास विकास नीति पर भी

बुलडोज़र कार्रवाइ

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इमेज कैप्शन, विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली का आवास संकट इस पूरे विवाद की एक बड़ी वजह है.

इस पूरे विवाद में एक सवाल यह भी उठ रहा है कि अगर यमुना के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण प्रतिबंधित है तो पिछले कुछ सालों में इतने बड़े पैमाने पर निर्माण क्यों हुए और लोग यहां रहने क्यों आए?

सामाजिक कार्यकर्ता और शहर नियोजन विशेषज्ञ इसके लिए आवास विकास नीति पर सवाल उठाते हैं.

दिल्ली में लंबे समय से बेघर लोगों के लिए काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता इंदु प्रकाश कहते हैं, "आवास भी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा माना गया है. इसलिए अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई करते समय यह भी देखना होगा कि जिन लोगों के घर टूट रहे हैं, उनके पुनर्वास की क्या व्यवस्था है?"

वो कहते हैं, "अवैध निर्माण के नाम पर एक बड़ी आबादी को बुलडोज़र की नोक पर रख दिया गया है. लेकिन कमज़ोर तबक़े के लिए घरों की कमी को पूरा नहीं किया जा रहा है. समस्या आवास विकास नीति में है, सवाल मजबूरी में घर बना रहे लोगों पर उठाया जा रहा है."

शहरी नियोजन विशेषज्ञ दीपिंदर कपूर भी मानते हैं कि दिल्ली का आवास संकट इस पूरे विवाद की एक बड़ी वजह है.

दीपिंदर कपूर कहते हैं, "डीडीए की योजनाओं में आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लिए जितने घर बनने चाहिए थे, उतने नहीं बने. नतीजा यह हुआ कि कम आय वाले लोग उन इलाकों में ज़मीन ख़रीदने लगे जहां ज़मीन सस्ती थी."

वो कहते हैं, "लोग जानबूझकर जोख़िम नहीं उठाते. उन्हें रहने के लिए जगह चाहिए. अगर वैध और किफ़ायती विकल्प नहीं मिलेंगे, तो वे वहीं घर बनाएंगे जहां ज़मीन उपलब्ध होगी, भले ही वह इलाक़ा बाढ़ क्षेत्र हो."

अब बुलडोज़र नहीं चलेगा?

मदनपुर खादर में तोड़ दिया गया मकान

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इमेज कैप्शन, दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता का कहना है कि पुराने निर्माण पर बुलडोज़र नहीं चलेगा

9 जून को दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने डीडीए और अन्य एजेंसियों के अधिकारियों से मुलाक़ात के बाद कहा कि ज़ोन ओ में पुराने निर्माण पर बुलडोज़र कार्रवाई नहीं होगी.

ज़ोन ओ को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि आगे क्या होगा. यह बहुत हद तक अदालत के आदेश और सरकार की मंशा पर निर्भर करेगा.

बीजेपी सांसद रामवीर बिधूड़ी कहते हैं, "मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता कह चुकी हैं कि पुराने निर्माण पर बुलडोज़र नहीं चलेगा. लेकिन अगर कोई नया निर्माण कर रहा है तो उस पर तो कार्रवाई होगी ही. सरकार यमुना के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण की अनुमति नहीं दे सकती है, हाई कोर्ट भी सख़्त है."

रामवीर बिधूड़ी कहते हैं, "हमने लोगों से नया निर्माण ना करने की अपील की है. दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार जल्द ही ज़ोन ओ पर फ़ैसला लेगी. जब इसे लेकर अंतिम फ़ैसला हो जाएगा तब लोग अपनी कॉलोनियों में नक्शा पास करवाकर, निर्माण से जुड़े नियमों का पालन करते हुए बिना डर के और बिना किसी को कोई पैसा दिए हुए निर्माण करवा सकेंगे."

हालांकि, प्रोफ़ेसर बाबू कहते हैं कि अब तक जो हो गया वह हो गया लेकिन आगे यमुना के बाढ़ क्षेत्र में किसी भी तरह का निर्माण इस नदी के अस्तित्व के लिए ख़तरा है.

प्रोफ़ेसर बाबू कहते हैं, "जहां भी बाढ़ क्षेत्र है वहां किसी भी तरह का निर्माण नहीं होना चाहिए, चाहे वह झुग्गी हो, इमारत हो या घाट हो."

प्रोफ़ेसर बाबू कहते हैं, "यह इलाका अब सेचुरेशन प्वाइंट तक पहुंच चुका है. अगर आप बचे हुए फ्लड प्लेन भी ख़त्म कर देंगे और भविष्य में बड़ी बाढ़ आई, तो पूरा शहर पानी में डूब सकता है. ऐसा यूरोप के कई देशों में हो चुका है. अगर आप सोचते हैं कि फ्लड प्लेन का जो थोड़ा-बहुत हिस्सा बचा है, उसे भी बस्तियां बसाने के लिए इस्तेमाल कर लिया जाए, तो यह इस शहर के अंत की शुरुआत होगी."

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