क्या 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई पेमेंट पर लगेगा शुल्क?

यूपीआई से पेमेंट करती महिला
इमेज कैप्शन, पीएम मोदी के मुताबिक़ जुलाई में भारत का यूपीआई से लेनदेन 23.66 अरब के साथ अपने सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है.
प्रकाशित
पढ़ने का समय: 7 मिनट

संसद में मंगलवार को पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट में प्रस्तावित संशोधन पेश किए गए.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक ये यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफ़ेस (यूपीआई) के ज़रिए होने वाले लेनदेन पर मर्चेंट फ़ीस दोबारा लागू करने की दिशा में उठाया गया एक क़दम है.

हालांकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यह स्पष्ट किया है कि यूपीआई पर एमडीआर लागू करने को लेकर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है.

मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) वह फ़ीस है, जो डिजिटल भुगतान की प्रक्रिया पूरी करने के बदले कारोबारी, बैंक और पेमेंट सेवा देने वाले कंपनियों को देते हैं.

सीतारमण ने कहा, "एमडीआर केवल व्यापारियों (मर्चेंट्स) पर लागू होता है, आम उपभोक्ताओं पर नहीं. इससे बैंक और फिनटेक कंपनियां इंफ्रास्ट्रक्चर, इनोवेशन और सुरक्षा पर अधिक निवेश कर सकेंगी, जिसका लाभ सभी यूपीआई यूज़र्स को मिलेगा."

उन्होंने कहा कि इस पर निर्णय एनसीपीआई की यूपीआई एवं सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी करेगी और यह प्रक्रिया तभी आगे बढ़ेगी, जब संसद टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित करेगी.

इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का लंबे समय से कहना रहा है कि डिजिटल भुगतान का विस्तार बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि पेमेंट कंपनियों को यूपीआई लेनदेन पर कोई फ़ीस नहीं मिलती.

इससे पहले रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से लिखा था कि "इसके तहत डिजिटल भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू करने की अनुमति दी जा सकती है. यह संशोधन एमडीआर वसूलने का कानूनी आधार तैयार करता है. हालांकि, अभी यह तय नहीं किया गया है कि फ़ीस कितनी होगी या किन लेनदेन पर लागू होगी."

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
दिनभर
Dinbhar: आवाज़ वही, अंदाज़ नया

देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां.

एपिसोड

समाप्त

भारत में आमतौर पर क्रेडिट कार्ड से भुगतान पर लगभग 1.5% एमडीआर लगता है, जबकि डेबिट कार्ड पर यह 0.9% तक होता है. फिलहाल यूपीआई से होने वाले भुगतान पर कारोबारियों से कोई एमडीआर नहीं लिया जाता.

भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बुधवार को संकेत दिए थे कि यूपीआई ट्रांज़ैक्शन के लिए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) फ्रेमवर्क में किसी भी संभावित बदलाव पर कमेंट करना अभी जल्दबाज़ी होगी, लेकिन देश के तेज़ी से बढ़ते डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम को एक सस्टेनेबल फंडिंग सिस्टम की ज़रूरत होगी क्योंकि ट्रांज़ैक्शन वॉल्यूम लगातार बढ़ रहा है.

जनवरी 2020 से रुपे डेबिट कार्ड और यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर नहीं लगाया जा रहा था.

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, यह संशोधन अमेज़न और फ़्लिपकार्ट जैसे बड़े व्यवसायों को किए जाने वाले यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड भुगतानों पर एमडीआर शुल्क लागू करने की दिशा में आधार तैयार करता है.

बिल पेश होने से एक दिन पहले बीते सोमवार को ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यालय ने अपने एक्स हैंडल पर लिखा कि 'जुलाई माह में भारत का यूपीआई से लेनदेन 23.66 अरब के साथ अपने सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गया.'

कांग्रेस ने इस संभावित कदम पर निशाना साधते हुए कहा, "मोदी ने आपकी जेब काटने का प्लान बना लिया है. जल्द ही आपसे 2,000 रुपये से ज़्यादा के यूपीआई पेमेंट पर वसूली की जा सकती है. लोग पहले ही महंगाई से परेशान हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी को उससे फर्क नहीं पड़ता. वो नए-नए प्लान लाकर आपकी पाई-पाई निचोड़ लेना चाहते हैं. मोदी का फंडा साफ है- जनता मरती रहे, वसूली चलती रहे."

बीजेपी सांसद ने क्या कहा?

प्रवीण खंडेलवाल
इमेज कैप्शन, बीजेपी सांसद और कॉन्फेडरेशन ऑफ़ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल का कहना है कि व्यापारी शुल्क का भुगतान करने के ख़िलफ़ नहीं हैं, बशर्ते कारोबार करना आसान हो.

केंद्र सरकार के यूपीआई भुगतान से जुड़े विधेयक पर बीजेपी सांसद और कॉन्फेडरेशन ऑफ़ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा, "पहले विधेयक आने दीजिए. अगर सरकार इसे ला रही है तो उसके पीछे निश्चित रूप से कुछ तार्किक कारण होंगे."

"भारत ने बहुत तेज़ी से डिजिटल भुगतान को अपनाया है और यूपीआई लेनदेन का पैमाना वैश्विक रिकॉर्ड है. जब विधेयक के प्रावधान सामने आएंगे, तब स्थिति स्पष्ट होगी, लेकिन मेरा मानना है कि इससे डिजिटल भुगतान उपयोगकर्ताओं को और अधिक सुविधा मिलेगी."

एक निश्चित सीमा से ऊपर शुल्क लगाए जाने के सवाल पर उन्होंने कहा, "जब भी किसी सेवा का उपयोग किया जाता है, तो उसके लिए शुल्क लगता है. 2,000 रुपये तक के लेनदेन को इसलिए छूट दी गई है ताकि आम लोगों पर कोई बोझ न पड़े."

"अगर अतिरिक्त सुविधाएं दी जाती हैं, तो मामूली शुल्क स्वीकार्य हैं, ठीक वैसे ही जैसे बैंकिंग सेवाओं पर शुल्क लगता है."

उन्होंने आगे कहा, "व्यापारी भुगतान करने के खिलाफ नहीं हैं, बशर्ते कारोबार करना आसान हो और लोगों के जीवन में सुविधा बनी रहे."

सोशल मीडिया पर क्या कहा जा रहा है?

यूपीआई
इमेज कैप्शन, कुछ यूज़र सोशल मीडिया पर यूपीआई पर संभावित शुल्क लगाने की योजना की आलोचना कर रहे हैं.

सोशल मीडिया पर भी लोग इस आशंका को लेकर अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त कर रहे हैं.

एक यूज़र सतीश कुमार ने एक्स पर लिखा, "क्या शानदार कदम है. अगर आप पांच बार से अधिक नकदी निकालेंगे (एटीएम से) तो शुल्क लगेगा. अगर आप यूपीआई से 2000 रुपये से अधिक भुगतान करते हैं तो शुल्क लगेगा. अब आगे क्या?"

यूपीएससी परीक्षाओं के लिए टीचिंग करने वाले सौरभ त्रिपाठी ने पूछा कि अगर दुनिया की सबसे बेहतरीन डिजिटल सार्वजनिक भुगतान प्रणाली का इस्तेमाल करने पर आपसे शुल्क लिया जाने लगे तो क्या होगा?

उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, "भले ही एमडीआर केवल व्यापारियों पर लगाया जाए, लेकिन उनमें से कई ग्राहक को नकद भुगतान की ओर प्रेरित करेंगे या इसकी लागत क़ीमतों में जोड़ देंगे. इससे वह प्रोत्साहन व्यवस्था कमज़ोर होगी, जिसने यूपीआई लोकप्रिय बनाया."

उन्होंने पूछा, "यूपीआई से कमाई करने की दिशा में आगे बढ़ने से पहले यह सवाल ज़रूर पूछा जाना चाहिए कि क्या कुछ हज़ार करोड़ रुपये के एमडीआर के लिए भारत के सबसे सफल सार्वजनिक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों में से एक की मूल भावना को कमज़ोर करना उचित होगा?"

वरिष्ठ पत्रकार सुशांत सिंह ने एक्स पर लिखा, "अगर आप यूपीआई और रुपे कार्ड पर व्यवसायों से शुल्क लेंगे तो अंत में भार उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा."

एक अन्य एक्स यूज़र ऋषि बागरी ने अपनी पोस्ट में लिखा है, "एनपीसीआई हर साल यूपीआई सिस्टम को बनाए रखने पर लगभग 500 करोड़ रुपये खर्च करता है. वहीं, इससे सरकार को कम क़ीमत के नोट छापने और व्यापारी शुल्क से जुड़े खर्चों में लगभग 1,500 करोड़ रुपये की बचत हुई है. इसी वजह से मोदी सरकार यूपीआई को किसी भी तरह के शुल्क से मुक्त रखना चाहती है."

वाईएसआर कांग्रेस के पूर्व सांसद वी विजयसाई रेड्डी ने सरकार से यूपीआई लेनदेन पर किसी भी प्रकार का शुल्क न लगाने की अपील की है.

उन्होंने निर्मला सीतारमण को टैग करते हुए एक्स पर लिखा, "मैं सरकार से आग्रह करता हूं कि यूपीआई लेनदेन पर किसी भी प्रकार का शुल्क लगाने की अनुमति न दी जाए. यूपीआई पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू करना डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में सालों की प्रगति को पीछे धकेल देगा. लेनदेन पर मामूली शुल्क भी कई उपभोक्ताओं और व्यापारियों को फिर से नकद भुगतान की ओर ले जा सकता है. आइए, भारत की डिजिटल भुगतान क्रांति को सुरक्षित रखें."

क्या आरबीआई यूपीआई को फ़ंड कर सकता है?

आरबीआई

छह अगस्त को द हिंदू में एक रिपोर्ट छपी है- 'आरबीआई के पास पर्याप्त फ़ंड है कि वो यूपीआई यूज़ का भुगतान कर सके.'

इस लेख में सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि बैंकों को एमडीआर लगाने की अनुमति देने का प्रस्ताव फिलहाल केवल सीमित श्रेणी के व्यापारियों तक सीमित है. इसमें 1 से 1.5 करोड़ रुपये वार्षिक कारोबार वाले व्यापारी और 2,000 रुपये से अधिक मूल्य के लेनदेन शामिल हैं.

"हालांकि, विधेयक की भाषा भविष्य में इस शुल्क को अधिक व्यापक लेनदेन पर लागू करने का रास्ता भी खोलती है. बैंकिंग उद्योग के अधिकारियों के मुताबिक, यूपीआई सिस्टम को चलाने और बनाए रखने की लागत फिलहाल लगभग 0.4 से 1 रुपये प्रति लेनदेन है."

लेख के अनुसार, आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 में 24,161.69 करोड़ यूपीआई लेनदेन किए गए. इस आधार पर इसे चलाने की सालाना लागत लगभग 9,664 करोड़ रुपये से 24,161 करोड़ रुपये के बीच बैठती है.

इसमें कहा गया है, "भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने 2025-26 में लगभग 4.3 लाख करोड़ रुपये की कमाई की. इसमें से लगभग 2.9 लाख करोड़ रुपये सरप्लस के रूप में केंद्र सरकार को ट्रांसफ़र किए गए. उसी साल यूपीआई सिस्टम को चलाने की लागत इस सरप्लस का लगभग 3 प्रतिशत से 8.5 प्रतिशत तक होती. आरबीआई का सरप्लस ट्रांसफ़र 2021-22 में 30,307.45 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में लगभग 2.9 लाख करोड़ रुपये हो गए, यानी लगभग 857 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी."

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने छह अगस्त को 'फ़्री यूपीआई, फॉरएवर' (निःशुल्क यूपीआई, हमेशा के लिए) शीर्षक से एक संपादकीय लिखा है.

संपादकीय में कहा गया है, "यूपीआई को भारत की सबसे बड़ी सफलताओं में गिना जा सकता है. यह दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम भुगतान मंच है. वैश्विक स्तर पर होने वाले ऐसे लगभग आधे भुगतान इसी मंच पर होते हैं. 2025-26 में 24,000 करोड़ से अधिक यूपीआई लेनदेन हुए, जिनका कुल मूल्य 314 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा था. तुलना के लिए देखें तो पिछले वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी 346.4 लाख करोड़ रुपये था."

"यूपीआई इतना बड़ा कैसे बना? इसके कई कारण हैं, लेकिन जिस फैसले ने इसकी वृद्धि को सबसे अधिक गति दी, वह था एमडीआर को हटाना."

संपदायकीय में आगे कहा गया है, "2025-26 में भारतीय रिज़र्व बैंक ने लगभग 1,700 करोड़ खराब नोट नष्ट किए और नई मुद्रा छापने पर 4,875 करोड़ रुपये खर्च किए. यदि UPI नहीं होता, तो नकदी की मांग पूरी करने के लिए यह खर्च कितना अधिक होता? बैंकों को यह भी सोचना चाहिए कि UPI ने उन्हें अतिरिक्त शाखाओं, एटीएम, कर्मचारियों और नकदी प्रबंधन पर कितने हज़ार करोड़ रुपये बचाए होंगे."

संपदायकी में अंत में कहा गया है, "मुफ्त यूपीआई देश के लिए लगातार लाभ देने वाली व्यवस्था साबित हुई है. सरकार को इस बड़े आर्थिक लाभ को ध्यान में रखते हुए उसकी लागत की भरपाई के लिए अन्य रास्ते तलाशने चाहिए, न कि ऐसे शुल्क लगाने चाहिए जो डिजिटल भुगतान के प्रसार को धीमा कर सकते हैं."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें

BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह

कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.