हिमंत बिस्वा सरमा फिर सत्ता की ओर, असम में सियासी दिग्गजों को कैसे छोड़ा पीछे

    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट
हिमंत बिस्वा सरमा ने असम में बीजेपी को ऐतिहासिक जीत दिलाई है (फ़ाइल फ़ोटो)
इमेज कैप्शन, हिमंत बिस्वा सरमा ने असम में बीजेपी को ऐतिहासिक जीत दिलाई है (फ़ाइल फ़ोटो)

असम विधानसभा चुनाव में बीजेपी बड़ी जीत की ओर बढ़ती हुई दिख रही है. 126 विधानसभा सीटों वाले असम राज्य में बीजेपी अपने दम पर पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाती नज़र आ रही है.

राज्य में इन चुनावों में सबसे बड़ा नुक़सान एआईयूडीएफ़ को हुआ है और इसका सीधा फ़ायदा बीजेपी को मिला है.

माना जा रहा है कि इस जीत के पीछे असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की बड़ी भूमिका रही है. हिमंत बिस्वा सरमा साल 2015 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए थे.

महज़ दस साल में हिमंत बिस्वा सरमा न केवल राज्य में बीजेपी का सबसे बड़ा चेहरा बन गए हैं, बल्कि उन्होंने अपनी राजनीति से असम के कई सियासी खिलाड़ियों को पीछे छोड़ दिया है, वो अक्सर बांग्लादेशी मुसलमानों पर अपने बयानों को लेकर सुर्खियों में रहते हैं.

चुनाव प्रचार के दौरान हेलिकॉप्टर से जनता का अभिवादन करते हुए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा (फ़ाइल फ़ोटो)
इमेज कैप्शन, चुनाव प्रचार के दौरान हेलिकॉप्टर से जनता का अभिवादन करते हुए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा (फ़ाइल फ़ोटो)

जिस वक़्त हिमंत बिस्वा सरमा बीजेपी में शामिल हुए थे, उस समय राज्य की विधानसभा में बीजेपी के पास महज़ 5 विधायक थे, जो साल 2011 के चुनावों में जीत कर आए थे.

असम में लगातार दो बार से बीजेपी की सरकार रही है, और हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में बीजेपी न केवल एंटी इनकंबेंसी से जुड़े सारे सिद्धांतों को पीछे छोड़ दिया है, बल्कि पहली बार दो-तिहाई बहुमत के क़रीब तक पहुँच गई.

माना जाता है कि राज्य सरकार की 'ओरुनोदोई योजना' का बड़ा लाभ बीजेपी को मिला है, जिसके तहत ग़रीब महिलाओं को हर महीने आर्थिक मदद दी जाती है.

इसके अलावा असम में लखपति बैदेउ (दीदी) योजना का भी बीजेपी ने जमकर प्रचार किया. बीजेपी का दावा है कि इस योजना से असम की तीन लाख महिलाएं लखपति बनी हैं.

यही नहीं बीजेपी की राज्य सरकार को केंद्र की कई योजनाओं का भी लाभ मिला, जिनमें सड़कें और पुल जैसी सुविधाएं शामिल हैं.

पर क्या केवल इन योजनाओं के दम पर ही बीजेपी लगातार तीसरी बार असम में सरकार बनाने जा रही है, या फिर इस जीत के पीछे हिमंत बिस्वा सरमा की बड़ी भूमिका है?

हिमंत बिस्वा सरमा ने क्या किया

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वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक समीर पुरकायस्थ बीजेपी की इस बड़ी जीत के पीछे विकास और वेल्फ़ेयर स्कीम्स के अलावा भी दो-तीन बड़ी वजहें देखते हैं.

उनका कहना है, "भूपेन कुमार बोरा जो कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके थे, उन्होंने पार्टी छोड़ दी. चुनावों के ठीक पहले कांग्रेस सांसद प्रद्युत बोरदोलोई बीजेपी में शामिल हो गए. इससे जनता में मैसेज गया कि कांग्रेस सरकार बना पाने की स्थिति में नहीं है."

इसके अलावा भी कांग्रेस में गठबंधन को लेकर अंतिम समय तक कुछ भी स्पष्ट नहीं था, इससे भी चुनावी माहौल में कांग्रेस को लेकर एक भ्रम की स्थिति बनी रही.

हालाँकि समीर पुरकायस्थ मानते हैं कि बीजेपी की इस जीत में असम में वोटों का अत्यधिक सांप्रदायिकरण सबसे बड़ी वजह है.

वो कहते हैं, "मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने जिस तरह की बयानबाज़ी की, उसने वोटों का बहुत ज़्यादा ध्रुवीकरण कर दिया. जब धर्म या जाति के नाम पर वोट बंट जाते हैं तो फिर बाक़ी मुद्दे ख़त्म हो जाते हैं."

उनका कहना है, "इस बार चुनावों में भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा था, जो कि ख़ुद मुख्यमंत्री के क़रीबी परिवार के जुड़ा हुआ था, लेकिन सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के आगे वोटरों ने ऐसे मुद्दों को नज़रअंदाज़ कर दिया."

असम में विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग से कुछ दिन पहले ही कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और उनकी पत्नी के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे.

वहीं मुख्यमंत्री सरमा और उनकी पत्नी ने कांग्रेस के इन आरोपों को ख़ारिज किया और इसे कांग्रेस की हताशा बताया था. मुख्यमंत्री सरमा इस मामले में काफ़ी आक्रामक और ग़ुस्से में दिख रहे थे.

अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार संदीप फुकन कहते हैं, "इस बार असम में आरएसएस के लोग राज्य सरकार के ख़िलाफ़ सक्रिय भी हुए थे. उन्होंने आरोप लगाया था कि राज्य में बीजेपी भी कांग्रेस की तरह होती जा रही है. उन्होंने भ्रष्टाचार का मुद्दा भी उठाया था."

"लेकिन इसके बावजूद भी हिमंत बिस्वा सरमा ने न केवल पार्टी को जीत दिलाई, बल्कि अब तक कि सबसे बड़ी जीत दिलाई."

'ये जीत हिमंत बिस्वा सरमा की'

संदीप फुकन कार्ड

असम में बीजेपी ने साल 2016 और 2021 में भी चुनाव जीतकर अपनी सरकार बनाई थी. लेकिन दोनों ही मौक़ों पर असम में बीजेपी की ओर से मुख्यमंत्री के तौर पर कोई स्पष्ट चेहरा सामने नहीं था.

वरिष्ठ पत्रकार संदीप फुकन ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "हिमंत बिस्वा सरमा साल 2015 में बीजेपी में शामिल हुए थे. उन्होंने अपने नाम, अपने काम और अपने चेहरे पर वोट मांगा. यह पहला मौक़ा था जब उन्होंने असम में मुख्यमंत्री के एक चेहरे को आगे किया."

उनका कहना है, "हिमंत का अपना स्टाइल है कि वो फ्रंट फ़ुट पर खेलते हैं. वो जानते हैं कि एक संवैधानिक पद पर बैठे होने से उनके किसी ख़ास बयान पर विवाद हो सकता है, लेकिन अगर उन्हें लगेगा कि इससे उनके वोटों में एक-दो का भी इज़ाफ़ा होगा तो वो बयान दे देंगे."

साल 2021 में राज्य के मुख्यमंत्री बने हिमंत बिस्वा सरमा ने असम में बंगाली मूल के मुस्लिम बहुल इलाकों में लगातार बेदखली अभियान चलाया. इस तरह हज़ारों बीघा सरकारी ज़मीन ख़ाली करवाई.

हिमंत बिस्वा सरमा अक्सर असम कांग्रेस के नेता गौरव गोगोई के ख़िलाफ़ बयान देते हुए दिखते हैं. उन्होंने गौरव गोगोई पर उनकी पत्नी को लेकर पाकिस्तान से संबंध के आरोप भी लगाए.

हिमंत कभी कांग्रेस नेता प्रियांक खड़गे से भिड़ते हुए दिखे तो कभी कांग्रेस सांसद राहुल गांधी पर उनकी टिप्पणी सुर्खियों में रही.

फ़रवरी महीने में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के आरोपों का जवाब देते हुए गौरव गोगोई (फ़ाइल फ़ोटो)
इमेज कैप्शन, फ़रवरी महीने में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के आरोपों का जवाब देते हुए गौरव गोगोई (फ़ाइल फ़ोटो)

यही नहीं असम में वोटिंग ख़त्म होने के बाद हिमंत बिस्वा सरमा ने एक निजी टीवी चैनल से बातचीत में कहा कि वो हमेशा भगवान से प्रार्थना करते हैं कि भारत और बांग्लादेश के आपसी संबंध बेहतर न हों.

संदीप फुकन कहते हैं, "वो जनता के मूड को समझते हैं और उसी के मुताबिक़ बयान देते हैं. वो ऊर्जा और आक्रामकता के साथ बात करते हैं. अगर बीजेपी चुनाव में हार जाती तो यह हार भी हिमंत की हो होती और जीती है तो यह जीत भी हिमंत की ही है."

हालांकि संदीप फुकन बताते हैं कि असम में बांग्लादेशी मुसलमानों के ख़िलाफ़ तमाम बयानों के बाद भी जो असम के खिलौंजिया (इंडिजिनस) मुस्लिम हैं, उन्हें ओरुनोदोई और अन्य योजनाओं का लाभ मिलता है.

इसके अलावा मुख्यमंत्री की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा को हज तीर्थयात्रियों को यात्रा के लिए विदा करते और उन्हें सम्मानित करते हुए भी देखा जाता है.

संदीप फुकन कहते हैं कि हिमंत बिस्वा सरमा जानते हैं कि असम के ज़्यादातर लोगों के मन में वहां की डेमोग्राफी (आबादी) बदलने का डर है, और हिमंत अपनी राजनीति से इसी डर का फ़ायदा उठाते हैं.

सबसे बड़ा नुक़सान किसे हुआ

असम में साल 2021 के विधानसभा चुनाव परिणाम पर नज़र डालें तो बीजेपी को 60 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि कांग्रेस 29 सीटें हासिल कर पाई थी.

इनके अलावा एआईयूडीएफ़ को 16, एजीपी को 9 और बीओपीएफ़ के खाते में 4 सीटें आई थीं.

यही नहीं साल 2016 के विधानसभा चुनावों में भी नतीजा तक़रीबन ऐसा ही था, जब बीजेपी को 60 और कांग्रेस को 26 सीटें मिली थीं.

वहीं एआईयूडीएफ़ को 13, एजीपी को 14 और बीओपीएफ़ को 12 सीटें मिली थीं.

जबकि इस बार के चुनावों में एआईयूडीएफ़ को सबसे बड़ा नुक़सान होता दिख रहा है. ख़बर लिखे जाने तक उसे महज़ दो सीटों पर बढ़त मिली हुई है. वहीं बीजेपी क़रीब 80 और कांग्रेस 25 सीटों पर आगे है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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