अमेरिका और इसराइल भीषण हमलों के बावजूद ईरान की सत्ता क्यों नहीं बदल पाए

21 मार्च को तेहरान में आयोजित अमेरिका-इसराइल विरोधी प्रदर्शन के दौरान नारे लगाती एक महिला
इमेज कैप्शन, 21 मार्च को तेहरान में आयोजित अमेरिका-इसराइल विरोधी प्रदर्शन के दौरान नारे लगाती एक महिला
    • Author, सरबास नाज़री
    • पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंंग
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

अमेरिका और इसराइल के भीषण हमलों के बावजूद ईरान की सत्ता ने आंतरिक सुरक्षा पर अपनी पकड़ ढीली नहीं होने दी है.लोगों के मन में लीडरशिप के प्रति गहरी असंतुष्टि के बावजूद लड़ाई के दौरान बड़े पैमाने पर प्रदर्शन नहीं हुए हैं.

कुछ विशेषज्ञ इसे युद्ध शुरू होने के बाद बने दमनकारी माहौल से जोड़ कर देखते हैं. जनवरी में हुए सरकार विरोधी प्रदर्शनों का ईरानी सत्ता ने जिस तरह से दमन किया उसके बाद से वहां लोगों के बीच डर फैला है.

सरकार ने चेकपोस्ट, भारी सुरक्षा तैनाती और रोज़ाना गिरफ्तारियों के ज़रिये नियंत्रण और कड़ा कर दिया है.

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, असहमति जताने वालों और यहां तक कि उन लोगों को भी निशाना बनाया जा रहा है जिन पर विदेशी मीडिया को युद्ध से जुड़ी तस्वीरें और वीडियो देने का आरोप है.

लगभग पूरी तरह इंटरनेट बंद होने से लोगों की संगठित होने की क्षमता और सीमित हो गई है. कम्युनिकेशन, समन्वय और सूचना के प्रवाह पर रोक लगाकर विरोध आयोजित करने वाले नेटवर्क काफी हद तक टूट गए हैं.

वहीं, सरकार समर्थक लोगों को सीमित कनेक्टिविटी देकर सरकार का नैरेटिव ईरान से बाहर तक पहुंचाया जा रहा है.

नतीजा यह है कि सरकार का विरोध न सिर्फ़ जोखिम भरा है, बल्कि लोगों को संगठित करना भी बेहद मुश्किल हो गया है-ख़ासकर युद्ध के समय, जब लोग अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं.

नैरेटिव को कैसे नियंत्रित किया जा रहा है?

कई बड़े नेताओं और अधिकारियों के मारे जाने के बाद भी ईरान में सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ
इमेज कैप्शन, कई बड़े नेताओं और अधिकारियों के मारे जाने के बाद भी ईरान में सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ

इन सभी तरीक़ों के साथ-साथ सरकार युद्ध की धारणा को भी प्रभावित करने की कोशिश कर रही है. अधिकारियों ने इस संघर्ष को इस्लामिक रिपब्लिक के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि ईरान की संप्रभुता पर हमला बताया है.

यह फ़र्क अहम है. सरकार से असंतुष्ट लोग भी बाहरी हमले के समय राष्ट्रवादी भावनाओं से प्रभावित हो सकते हैं. इसे अक्सर 'रैली-अराउंड-द-फ़्लैग' प्रभाव कहा जाता है-जो जून 2025 के 12 दिनों के युद्ध में भी देखा गया था.

इससे फ़िलहाल सरकार-विरोधी लामबंदी की संभावना कम होती दिखती है.

सरकारी मीडिया इस नैरेटिव को लगातार मज़बूत कर रहा है-नागरिकों की मौत पर ज़ोर देते हुए और अपने हमलों को डिफ़ेंसिव (रक्षात्मक) बताकर.

साथ ही, सरकार समर्थक रैलियां और प्रदर्शन 'नियंत्रण, स्थिरता और मज़बूती' की इमेज पेश करते हैं.

झटके झेलने के लिए बना सिस्टम

लड़ाई में लोगों के उत्साह को बनाए रखने के लिए अधिकारी लगातार सरकार समर्थक प्रदर्शन आयोजित करवा रहे हैं
इमेज कैप्शन, लड़ाई में लोगों के उत्साह को बनाए रखने के लिए अधिकारी लगातार सरकार समर्थक प्रदर्शन आयोजित करवा रहे हैं

टॉप लीडरशिप पर हमलों के बावजूद व्यवस्था के न ढहने की वजह इसकी संरचना है. ईरान का सिस्टम किसी एक व्यक्ति पर आधारित नहीं, बल्कि धार्मिक, सैन्य, राजनीतिक और आर्थिक संस्थाओं के नेटवर्क पर टिका है.

सत्ता कई संस्थाओं में बंटी है- जैसे सेना, धार्मिक नेतृत्व और सुरक्षा एजेंसियां, जिससे किसी शीर्ष नेता के हटने पर भी सिस्टम चलता रहता है.

उत्तराधिकार की औपचारिक और अनौपचारिक व्यवस्थाएं भी निरंतरता बनाए रखने में मदद करती हैं.

इस मज़बूती के केंद्र में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) है. यह सिर्फ़ सेना नहीं, बल्कि राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा ताकत भी है, जिसकी देशभर में गहरी पकड़ है.

वरिष्ठ कमांडरों के मारे जाने के बावजूद यह संगठन काम करता रहा है और अंदर-बाहर दोनों मोर्चों पर चीज़ों को, लोगों की प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित कर रहा है.

सबसे अहम बात-अब तक सेना या सुरक्षा तंत्र में किसी बड़े पैमाने पर टूट या बग़ावत के संकेत नहीं मिले हैं, जो आमतौर पर किसी शासन के गिरने का बड़ा संकेत होता है.

युद्ध में 'बचे रहना' ही रणनीति

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वीडियो कैप्शन, डील के लिए बेताब है ईरान- ट्रंप

ईरान इस युद्ध में पारंपरिक जीत हासिल करने की कोशिश नहीं कर रहा, बल्कि अपनी एक अलग ही रणनीति अपना रहा है- यानी दुश्मन की लागत बढ़ाना और संघर्ष को लंबा खींचना.

ईरानी नेतृत्व के लिए 'जीत' का मतलब युद्ध के बाद भी सत्ता का कायम रहना है. इसी के तहत वह अपनी ताक़त, खासकर होर्मुज़ स्ट्रेट का इस्तेमाल कर ग्लोबल एनर्जी मार्केट पर दबाव बना रहा है.

इससे युद्ध सिर्फ़ सैन्य टकराव नहीं, बल्कि वो लड़ाई बन गया है जहां टिके रहना ही जीत है. जो थकेगा वो हारेगा.

साथ ही, विचारधारा भी अहम भूमिका निभाती है. शिया परंपरा से जुड़ी 'प्रतिरोध, बलिदान और शहादत' की सोच को लगातार मज़बूत किया जा रहा है.

इस ढांचे में सैनिकों की मौत को हार नहीं, बल्कि बहादुरी के रूप में पेश किया जाता है-जैसा 1980 के दशक के ईरान-इराक़ युद्ध में देखा गया था.

विपक्ष कहां है?

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वीडियो कैप्शन, इन देशों के लिए खुला होर्मुज़ स्ट्रेट

ईरान में असंतोष तो व्यापक है, लेकिन उसे संगठित राजनीतिक चुनौती में बदलने वाला कोई एकजुट नेतृत्व नहीं है.

विपक्ष बंटा हुआ है, कई नेता देश से बाहर हैं, और जो अंदर हैं वे जेल में हैं.

इतिहास बताता है कि सिर्फ असंतोष से सत्ता परिवर्तन नहीं होता-इसके लिए संगठन, नेतृत्व और वैकल्पिक योजना भी ज़रूरी होती है.

अगर बाहरी दबाव से सिस्टम कमज़ोर भी पड़े, तब भी आगे क्या होगा-यह अनिश्चित है.

लीबिया और इराक़ जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि बिना तैयार विकल्प के देश में अराजकता और लंबे वक़्त तक अस्थिरता का ख़तरा पैदा हो जाता है.

क्या ईरान की यह मज़बूती हमेशा क़ायम रहेगी?

पूर्व सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनेई की मौत के बाद अमेरिका और इसराइल विरोधी प्रदर्शनों के दौरान महिलाएं (तस्वीर: 1 मार्च 2026)
इमेज कैप्शन, पूर्व सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनेई की मौत के बाद अमेरिका और इसराइल विरोधी प्रदर्शनों के दौरान महिलाएं (तस्वीर: 1 मार्च 2026)

फिलहाल ईरान की व्यवस्था टिकती दिख रही है-संस्थागत मज़बूती, दमन क्षमता, रणनीतिक लचीलापन और जियो-पॉलिटिकल स्थिति के कारण, लेकिन इसकी कीमत भी हो सकती है.

लोगों पर ज़रूरत से ज़्यादा नियंत्रण बैकफ़ायर भी हो सकता है और सूचना पर निर्भर सिस्टम समय के साथ कमज़ोर हो सकते हैं, जिससे भविष्य में बड़े झटकों का ख़तरा बढ़ जाता है.

आखिरकार, ईरान का भविष्य बाहरी हमलों से कम और आंतरिक कारकों-जैसे सत्ता का एकजुट रहना, सामाजिक संगठन, आर्थिक संकट और नियंत्रण बनाम दबाव के संतुलन पर ज़्यादा निर्भर करेगा.

इसी वजह से सरकार सड़कों पर भी एक समानांतर लड़ाई लड़ रही है-ताकि किसी भी संभावित विद्रोह को, जनता के आक्रोश को शुरुआत में ही दबाया जा सके.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.