नन्हे शिशु के दिमाग की उथल पुथल को कैसे समझें?

बच्चों का दिमाग, रिसर्च, विज्ञान, मेडिकल रिसर्च, टेक्नॉलॉजी, बच्चे
    • Author, सोफी हार्डक
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
  • प्रकाशित

छोटे बच्चों की अपनी दुनिया होती है. अपना ग़ुस्सा, खुशी, दुख तकलीफ़ बताने का उनका अपना तरीक़ा होता है. उनके कुछ इशारे तो हम समझ लेते हैं और उनकी कैफ़ियत का अंदाज़ा लगा लेते हैं. लेकिन ये अंदाज़े हमेशा सटीक नहीं बैठते.

नतीजा ये कि बच्चों का रोना और तेज़ हो जाता है. वो बार-बार ग़ुस्सा करने लगते हैं.

अक्सर बच्चों की ज़िद, फ़रमाइशें और रोना-धोना सुनकर हम सोचते हैं कि काश हम इन बच्चों की अनकही बातें समझ पाते.

अब साइंस आपकी मदद करने की कोशिश कर रही है, ताकि आप अपने बच्चों की बातों और इशारों को अच्छे से समझ सकें.

कई देशों में बच्चों का मिज़ाज समझने के लिए बेबीलैब खुल गई हैं. जहां उन बच्चों पर रिसर्च की जा रही है, जिन्होंने बोलना नहीं सीखा है. जो सिर्फ़ रोना, हंसना या इशारे करना जानते हैं.

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बच्चों के दिमाग में क्या चल रहा है?

ब्रिटेन के ब्रिकबेक कॉलेज में भी ऐसी ही एक बेबी लैब चल रही है. जहां पर बच्चों का मिज़ाज समझने के लिए एक ख़ास क़िस्म की तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है.

'फंक्शनल नियर इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी'. इसे एफ.एन.आर.एस के नाम से भी जाना जाता है. इस तकनीक के ज़रिए ये पता लगाने की कोशिश हो रही है कि जब बच्चा किसी चीज़ को देखता है, तो उसका दिमाग कैसे काम करता है.

इस तकनीक की मदद से बच्चों के लिए एक कैप तैयार की गयी है, जिसमें कई तरह के उपकरण और लाइट्स लगी हैं. देखने में ये कैप स्विमिंग कैप की तरह लगती है.

तजुर्बे के दौरान ये कैप बच्चे को पहना दी जाती है. इसमें लगी लाइट्स की तरंगें हड्डियों के ज़रिए से बच्चे के दिमाग में जाती हैं और बच्चे के खून में घुल जाती हैं. कैप का डिज़ाइन बच्चे के आराम को ज़हन में रखकर तैयार किया गया है. इसे पहनने से बच्चे को तकलीफ़ नहीं होती.

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क्या बच्चों को जज़्बाती तकलीफ़ होती है?

बच्चों की अनजानी दुनिया के रहस्य जानने के लिए लंबे समय से कई तरह की रिसर्च की जा रही हैं. यहां तक की चार्ल्स डार्विन भी इंसानी विकास की थ्योरी पर काम करने की प्रेरणा का स्रोत अपने बेटे को मानते थे, जो उस वक़्त महज़ महज़ 66 दिन का था.

डार्विन ने अपने बच्चे की हर हरकत को नोट करना शुरू कर दिया. बाद में डार्विन ने इसे 'डायरी ऑफ़ ऑब्ज़र्वेशन' नाम की किताब की शक्ल में छपवाया भी.

हालांकि ये किताब बच्चों के ज़हन को समझने के लिए बहुत मददगार नहीं है, क्योंकि इसमें कई ऐसी बातें हैं, जो बहुत से बच्चों के बर्ताव पर सही नहीं बैठतीं. लेकिन इस किताब ने बच्चों के ज़हन के काम करने के तरीक़े पर रिसर्च का रास्ता हमवार किया.

हरेक रिसर्च एक क़दम आगे बेहतरी की ओर बढ़ी. हालांकि अभी तक कोई भी रिसर्च आख़िरी पड़ाव पर पहुंचने का दावा करने वाली साबित नहीं हुई है.

मिसाल के लिए उन्नीसवीं और बीसवीं सदी तक वैज्ञानिक यही मानते थे कि बच्चों को जज़्बाती तकलीफ़ नहीं होती. क्योंकि उनका ज़हन इतना विकसित नहीं होता कि वो इसे महसूस कर सकें.

जबकि मॉडर्न रिसर्च बताती हैं कि बच्चे बहुत समझदार, संवेदनशील और भावुक होते हैं.

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बच्चों के सोचने का न्यूरल कनेक्शन

रिसर्च के अनुसार बच्चे के दिमाग में हर सेकेंड में दस लाख से भी ज़्यादा नए न्यूरल कनेक्शन बनते रहते हैं. यानी बच्चे का दिमाग़ हर समय व्यस्त रहता है. लेकिन व्यस्त दिमाग़ का ये हिस्सा छिपा रहता है. बच्चे के दिमाग़ के काम का तरीक़ा फ़िलॉसफ़ी और साइंस का मिक्सचर है.

साल 2000 की शुरुआत में बच्चों की आंख की पुतली घूमने पर रिसर्च की गई. इस रिसर्च से पता चला कि बच्चों का दिमाग़ समझने के लिए अभी बहुत काम करना बाकी है. उनकी सोच आसनी से नहीं समझी जा सकती.

बच्चे जिस वक्त ख़ामोशी से कोई बात सुन रहे होते हैं, उस वक़्त भी उनका दिमाग़ लगातार काम करता रहता है. खास तौर से कान के पीछे वाला हिस्सा उस समय सबसे ज़्यादा सक्रिय हो जाता है. दिमाग के इस हिस्से को 'सोशल ब्रेन' कहते हैं.

वयस्कों में दिमाग़ के इस हिस्से पर सबसे ज़्यादा रिसर्च की गई है लेकिन बच्चों को लेकर वैज्ञानिकों को अभी कामयाबी नहीं मिली है.

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रिसर्च से मां-बाप का रोल कम हो जाएगा?

रिसर्चर ये जानने का भी प्रयास कर रहे हैं कि हर बच्चे में दिमाग़ का विकास एक जैसा क्यों नहीं होता. अपने माहौल से वो कौन सी चीज़ें सबसे पहले सीखते हैं. वो ये कैसे तय करते हैं कि कौन सी चीज़ उन्हें कब और क्यों ज़ाहिर करनी है.

जानकार कहते हैं कि बच्चे अपने आस-पास के माहौल से सबसे ज़्यादा सीखते हैं. लेकिन उनके आसपास के लोग कब कैसा व्यवहार करेंगे कहना मुश्किल है. इससे बच्चों के सीखने के अमल पर भी बुरा असर पड़ता है.

रिसर्चर अपनी रिसर्च के दौरान बच्चों के मां-बाप को बहुत सी हिदायतें देते हैं. पर, उससे भी बहुत मदद नहीं मिल पाती. इसीलिए ऐसी तकनीक और उपकरण बनाने पर काम चल रहा है जिसकी मदद से रिसर्च में आसानी हो और बच्चे पर की जा रही रिसर्च में मां-बाप का रोल कमतर हो जाए.

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चार से छह महीने तक ऑटिज़्म का डर

रिसर्च बताती हैं कि पैदा होने के एक दिन बाद ही बच्चे का सोशल दिमाग काम करना शुरू कर देता है. और चार से छह महीने के बच्चे में ऑटिज़्म की बीमारी होने डर ज़्यादा होता है.

हालांकि जब तक बच्चे दो या तीन साल के नहीं हो जाते, कह पाना मुश्किल होता है कि वो ऑटिज़्म का शिकार हैं या नहीं. क्योंकि इस उम्र के बाद ही उनके बर्ताव से इशारे मिलने शुरू होते हैं कि वो दूसरे बच्चों से अलग क्यों हैं.

बच्चों का दिमाग समझने के लिए एमआरआई स्कैनर का भी सहारा लिया जाता है. लेकिन एनआईआरएस ज़्यादा बेहतर और सस्ती तकनीक है. सस्ती होने की वजह से ग़रीब देशों में भी रिसर्च के लिए इस तकनीक का सहारा लिया जा सकता है.

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रिसर्च की वर्तमान स्थिति क्या है?

एनआईआरएस उपकरण के ज़रिए अफ्रीका के गैम्बिया जैसे देशों ने भी इस क्षेत्र में रिसर्च शुरू कर दी है. ज़्यादा देशों में रिसर्च होने की वजह से नतीजे भी बेहतर हो सकते हैं और बड़े पैमाने पर रिसर्च की जा सकती है.

एनआईआरएस उपकरण बनने से पहले रिसर्च का दायरा बहुत सीमित था क्योंकि हरेक देश रिसर्च का ख़र्च नहीं उठा सकता.

बच्चों में होने वाला कुपोषण भी अब रिसर्च का हिस्सा बन चुका है. एनआईआरएस से होने वाली रिसर्च से ही पता चला है कि गैम्बिया के बच्चों के दिमाग का विकास कम और धीमी गति से हो रहा है. क्योंकि, इस देश में बच्चे बहुत बुरी तरह कुपोषण का शिकार हैं.

तसल्लीबख़्श नतीजे हासिल करने के लिए अब रिसर्चर टॉडलर लैब बनाने की बात कर रहे हैं. इस में वर्चुअल रियलिटी केव होंगी. उम्मीद की जा रही है इस वर्चुअल लैब से बेहतर नतीजे सामने आएंगे. और हम बच्चों के बारे में अपनी समझ बेहतर कर सकेंगे.

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