कैसे रहें मन के अंदर की आवाज़ों के साथ?

अंदर की आवाज़ें
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दुनिया में बहुत से लोग हैं, जो ये दावा करते हैं कि वो अपने अंदर कई आवाज़ें सुनते हैं. उनके मुताबिक़ ये आवाज़ें उनके दिल-दिमाग़ से आती हैं. कई बार ये उन्हें मशविरे देती हैं. तो कई बार कोसती भी हैं.

अक़्सर, लोग इसे दिमाग़ी ख़लल या पागलपन कहकर ख़ारिज़ करते हैं. मगर, दुनिया में बहुत से ऐसे मनोवैज्ञानिक हैं, जानकार हैं, जो अपने भीतर की आवाज़ सुनने वाले लोगों की बात पर यक़ीन करते हैं. उनकी परेशानी समझने की कोशिश करते हैं. उनकी मुश्किल दूर करने का प्रयास करते हैं.

ऐसे ही कुछ लोग अभी हाल में ब्रिटेन की डरहम यूनिवर्सिटी में इकट्ठे हुए थे. अपने अंदर की आवाज़ सुनाने वाले इन तमाम लोगों को एक ख़ास मेहमान जैकी डिलन ने इकट्ठा किया था. वो 'हियरिंग वॉयस नेटवर्क' नाम के अंतरराष्ट्रीय आंदोलन की ब्रिटेन में अगुवा हैं.

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इस बैठक में तमाम लोगों ने अपने तजुर्बे साझा किये. कुछ लोग अपने भीतर की आवाज़ सुन-सुनकर परेशान हैं. वहीं कुछ लोग कहते हैं कि उनके अंदर की आवाज़ें बड़ी मज़ेदार होती हैं.

हाल के दिनों में अंदर की आवाज़ सुनने का आंदोलन ज़ोर पकड़ रहा है. कई देशों में इस तरह की आवाज़ें सुनने वालों की बैठकें हो रही हैं. ताकि लोग अपने अनुभव बांटें और उनकी मुश्किलें हल की जा सकें.

अंतरात्मा की इन आवाज़ों को पहले-पहल गंभीरता से लिया था स्विस मनोवैज्ञानिक कार्ल जंग ने. कार्ल जंग से पहले हर मनोवैज्ञानिक अंतर्मन की आवाज़ को ख़ारिज करते थे. दिमाग़ी कचरा कहा करते थे.

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इस परेशानी की शिकार रहीं ब्रिटिश महिला एलेनोर लॉन्गडेन ने इस बारे में अपने तजुर्बे एक क़िताब में बांटे हैं. उनकी क़िताब का नाम है,'वॉयसेज़ इन माई हेड'.

एलेनॉर ने पहले-पहले अपने भीतर की जो आवाज़ सुनी थी, वो असल में उनके हर काम को दोहराती थी. मसलन, 'अब उसने दरवाज़ा खोला'. 'अब उसने आईने में ख़ुद को देखा'. जब एलेनॉर ने अपने अनुभव अपनी एक दोस्त को बताए.

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एलेनॉर की दोस्त ने उन्हें एक मनोवैज्ञानिक के पास भेज दिया. वहां से एलेनॉर की मुसीबतें शुरू हो गईं. उन्हें स्किटज़ोफ्रेनिया नाम की दिमाग़ी बीमारी का शिकार बता दिया गया. एक डॉक्टर ने तो यहां तक कह दिया कि इस दिमाग़ी ख़लल से तो अच्छा था कि उन्हें कैंसर हो जाता.

बहुत जगह की ठोकरें खाने के बाद एलेनॉर की मुलाक़ात मशहूर ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक पैट ब्रैकेन से हुई. जिन्होंने पहले तो उनकी परेशानी समझी. ये जाना कि बचपन में एलेनॉर, यौन शोषण का शिकार हुई थीं. तब से ही उनकी परेशानी दिमाग़ के किसी कोने में दबी हुई थी. जो कॉलेज आने के बाद उभरकर सामने आई.

पैट ब्रैकेन की मदद से एलेनॉर ने अपने भीतर की इन आवाज़ों को सुनना और समझना सीखा. आज वो अंदर की आवाज़ें सुनने-समझने वाली एक्सपर्ट बन गई हैं.

इस काम में एलेनॉर के मददगार, हॉलैंड के मनोवैज्ञानिक मॉरिस रॉम भी बने. जिन्होंने ये बताया कि लोगों को अपने भीतर की जो आवाज़ें सुनाई देती हैं, वो आपकी किसी पुरानी परेशानी को बयां कर रही होती हैं जिन्हें समझकर उसे दूर किया जाना ज़रूरी है.

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जैसे एलेनॉर के केस में ये पता चला कि बचपन में वो जो यौन शोषण का शिकार हुई थीं. उसका उनके दिल दिमाग़ पर गहरा असर पड़ा था. अंदर की जो आवाज़ें वो सुनती थीं. वो उसी बुरे तजुर्बे की वजह से थी.

आज अपने भीतर की आवाज़ों से परेशान लोगों के लिए एलेनॉर एक ही सलाह देती हैं. वो कहती हैं कि उनसे ये नहीं पूछा जाना चाहिए कि आपकी परेशानी क्या है? बल्कि, ये पूछा जाना चाहिए कि आपकी कहानी क्या है?

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हॉलैंड के मनोवैज्ञानिक मॉरिस रॉम को अंदर की आवाज़ों को गंभीरता से लेने का हौसला उनकी एक मरीज़ पैट्सी हेज से मिला था. जब पैट्सी ने अपनी परेशानी बतायी. तो आम मनोवैज्ञानिक की तरह पैट्सी की आवाज़ को दिमाग़ी कचरा कहकर ख़ारिज़ कर दिया. मगर पैट्सी ने उन्हें समझाया कि ये आवाज़ें बेवजह की नहीं.

ये ठीक उसी तरह हैं जैसे पहले के ज़माने में यूनान के लोग अपने देवताओं से बातें किया करते थे. पैट्सी ने मॉरिस को ये समझाया कि वो भी पहले के दौर की यूनानी नागरिक हैं. देवता, उनसे मन की आवाज़ों के ज़रिए बातें करते हैं.

बाद में मॉरिस और पैट्सी एक टीवी चैनल पर आए. अपना तजुर्बा बांटा और लोगों से अपील की कि अगर वो अपने मन की आवाज़ें सुनते हैं तो सामने आएं. अपने अनुभव उन्हें बताएं. इसके बाद क़रीब डेढ़ सौ लोगों ने मॉरिस से संपर्क साधा. तभी से अंदर की आवाज़ें सुनने वालों को समझने की ये मुहिम तेज़ हुई.

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इसे बीमारी कहकर ख़ारिज करने वालों की तादाद भी कम हुई है. आज मनोवैज्ञानिक ऐसे लोगों की कहानी सुनने की कोशिश करते हैं न कि दिमाग़ी ख़लल कहकर उन्हें ख़ारिज करते हैं.

इस बारे में वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया यूनिवर्सिटी की फ्लैवी वाटर्स ने भी काफ़ी रिसर्च की है. उनके मुताबिक़, मन की ये आवाज़ें हमें तब सुनाई देती हैं, जब कोई इंसान अपनी फालतू की यादों को दिमाग़ से निकाल नहीं पाता.

नतीजा ये होता है कि दिमाग़ में ऐसी बहुत सी बातें इकट्ठी हो जाती हैं, जिनकी हमें ज़रूरत नहीं होती. इन फालतू की बातों का नई यादों से घालमेल हो जाता है. नतीजा, मन की आवाज़ें.

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ऐसा अक्सर तब होता है जब बचपन में किसी के साथ कोई बुरी घटना, कोई ख़राब तजुर्बा होता है. ख़ास तौर से, बचपन में यौन शोषण के शिकार हुए लोग, इस तरह की आवाज़ें अक्सर सुनते हैं. जैसे एलेनॉर लैंगडन.

जानकार कहते हैं कि ऐसी आवाज़ों की मुश्किल दूर करने का सही वक़्त तब होता है जब लोगों के अंदर स्किटज़ोफ्रेनिया के लक्षण दिखाई देने लगें.

ऐसे लोग जो भीतर की आवाज़ें सुनते हैं, उन्हें इस बात का हौसला दिया जाना ज़रूरी है कि वो अपने अंदर से आने वाली इन आवाज़ों की वजह को समझें. याद करें कि उनके साथ कौन सा ऐसा तजुर्बा हुआ था जिसके चलते वो बहुत परेशान हुए.

फिर मनोवैज्ञानिक ऐसे लोगों को बताते हैं कि अंदर की ये बातें सुन-समझकर, उन घटनाओं को भूलकर ही ज़िंदगी में आगे बढ़ना मुमकिन होगा.

अंदर की आवाज़ें

कहने का मतलब ये कि ज़िंदगी के बुरे तजुर्बों को भूलने की जी-तोड़ कोशिश करने के बजाय, उन्हें याद करके उनके साथ जीने की आदत डालना बेहतर होगा.

अंदर की इन आवाज़ों को समझने के लिए जानकार अलग-अलग तरीक़े आज़मा रहे हैं. लोगों को साथ बैठाकर बात करने की कोशिश की जाती है. ऐसे मरीज़ों को इकट्ठे बैठाकर आपस में बात कराई जाती है.

कहीं-कहीं पर मनोवैज्ञानिक ही छुपकर, लोगों के भीतर की आवाज़ बनकर उनकी बातें सुनते-समझते हैं.

इन मामलों की जानकार जैकी डिलन कहती हैं कि हर इंसान के भीतर कई किरदार होते हैं. कई बार उनमें ऐसा तालमेल होता है कि पता तक नहीं चलता. मगर कई बार ऐसा भी होता है कि अपने भीतर के तमाम किरदारों में हम तालमेल नहीं बिठा पाते. फिर दिमाग़ की भूली-बिसरी यादें, इन्हीं किरदारों के हवाले से हमारे अंदर शोर मचाने लगती हैं.

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ख़ुद जैकी डिलन कहती हैं कि वो अपने अंदर सैकड़ों आवाज़ें सुनती हैं. कई बार ये बुरी बातें भी होती हैं. मगर इन्हें सुनना ज़रूरी है. क्योंकि ये हमारी ही भूली-बिसरी यादों को हमारे लिए ताज़ा करने की दिमाग़ की कोशिश होती हैं. इन्हें सुन लेने के बाद हमें बुरे तजुर्बों से छुटकारा पाने में आसानी होगी.

फिर आप अपने भीतर की तमाम आवाज़ों के साथ जीना सीख लेंगे.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.com/future/story/20160506-how-to-heal-a-shattered-mind-broken-in-1000-pieces" platform="highweb"/></link>, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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