वर्दियां बदली, ज़िंदगी भी

jharkhand girls
इमेज कैप्शन, भूमिगत आंदोलन से बाहर निकल खुली हवा में सांस लेने की कोशिश.
    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, रांची
  • प्रकाशित

झारखण्ड के नक्सल प्रभावित इलाकों की कई लड़कियां जो कभी माओवादियों के दस्ते का हिस्सा थीं, आज नामी कंपनियों में सुरक्षा गार्ड का काम कर रही हैं.

यह कभी वर्दी पहनकर भूमिगत संघर्ष में शामिल थीं. वर्दी तो उन्होंने आज भी पहन रखी है मगर अब इनका उद्देश्य अलग है.

अब यह क्रांति की बातें नहीं करतीं बल्कि अपने भविष्य और परिवार के भरण-पोषण की चिंता कर रहीं हैं.

आज यह भूमिगत आंदोलन के संघर्ष से बाहर निकलकर खुली हवा में सांस लेने की कोशिश कर रहीं हैं, और, इनकी कोशिश के लिए मदद का हाथ बढ़ाया है, केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल यानि सीआरपीएफ़ और एक ग़ैर सरकारी संगठन 'भारत किसान संघ' ने.

प्रशिक्षण

दोनों संस्थाएं मिलकर झारखण्ड के दूर-दराज़ इलाकों की बालिकाओं को प्रशिक्षित करने का काम कर रही हैं ताकि वह निजी कंपनियों में रोज़गार पा सकें.

प्रशिक्षण के बाद इन लड़कियों में से लगभग 200 ऐसी हैं जो बड़ी कंपनियों में बतौर सुरक्षाकर्मी कार्यरत हैं.

भारत किसान संघ के संजय मिश्र कहते हैं, "इनमे से बहुत सारी लड़कियां नक्सल हिंसा की शिकार हैं जबकि कुछ ऐसी भी हैं जो नक्सलियों के दस्ते में शामिल हुआ करतीं थी. इसका परिणाम यह था कि इनकी ज़िन्दगी एक तरह से ख़त्म हो चुकी थी. मगर आज यह महसूस करतीं हैं कि उनका उन्हें एक नया जीवन मिला है. आज यह सम्मान के साथ ज़िंदगी जी रहीं हैं."

कभी माओवादियों का साथ देने वाली ये लड़कियां आज सुरक्षा गार्ड हैं.
इमेज कैप्शन, कभी माओवादियों का साथ देने वाली ये लड़कियां आज सुरक्षा गार्ड हैं.

अलग अलग अनुभव

इस समूह में शामिल हर लड़की का अपना अनुभव है.

मिसाल के तौर पर नक्सल प्रभावित लातेहार ज़िले की मधु प्रिय बारा को ही ले लीजिये. वह कहतीं हैं कि नक्सली हमेशा उनके गांव आया करते थे और गाँव की लड़कियों को साथ शामिल करने के लिए दबाव डालते थे. मधु कहती हैं, "अगर हम नक्सलियों के साथ जाने से इनकार करते थे तो हमें तो धमकी मिलती ही थी साथ में हमारे परिवार वालों का जीना भी मुश्किल हो जाता था. जब हमें पता चला कि सीआरपीएफ़ की तरफ से गार्ड की ट्रेनिंग कराई जा रही है तो हमने भी आवेदन दिया. आज मैं महिला गार्डों की यूनिट का नेतृत्व कर रही हूँ." रांची ज़िले के चान्हो की रहने वाली रेनू का भी कहना था कि झारखण्ड के सुदूरांचल के गावों में युवा पीढ़ी दहशत के साए में जीने को मजबूर है.

'बच्चे दे दो'

रेनु कहती हैं, "जब कभी माओवादियों का दस्ता हमारे गाँव आता था तो वह कहते कि तुम्हारे पास दो बच्चे हैं, इनमे से एक हमें दे दो. जिसके पास चार बच्चे हैं उनमे से वह दो को ले जाया करते थे. कोई उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं रखता था." संजय मिश्र के अनुसार वह कुछ दिनों पहले एक कार्यशाला में हिस्सा लेने अमरीका गए हुए थे जहां उन्होंने महिलाओं को सुरक्षा की कमान संभालते देखा.

उन्होंने कहा, "उनमें से भी कई महिलाएं मानव तस्करी का शिकार हुई थीं. मगर अब वह निजी कंपनी में बतौर सुरक्षाकर्मी काम कर एक सम्मानजनक ज़िंदगी जी रहीं हैं. यहीं से मेरे दिमाग़ में विचार आया कि हम भी कुछ ऐसा कर सकते हैं." वापस लौट कर भारतीय किसान संघ ने मानव तस्करी की शिकार हुई लड़कियों को प्रशिक्षित करना शुरू किया और उनके लिए रोज़गार भी ढूंढने का प्रयास शुरू किया.

फैसला

इस बीच संघ के कैंप में सीआरपीएफ़ के महानिदेशक पीएम नायर का दौरा हुआ और साथ मिलकर नक्सल प्रभावित लड़कियों को प्रशिक्षित करने का फैसला लिया गया.

केंद्रीय रिज़र्व पुलिस फोर्स नें ट्रेनिंग का ख़र्च उठाने का ज़िम्मा लिया. सीआरपीएफ़ के अलावा राज्य पुलिस के अधिकारी भी इन लोगों को समय-समय पर प्रशिक्षित देने का काम करते हैं.

आज नक्सल प्रभावित इलाकों की लड़कियां नामी कंपनियों में काम कर रही हैं.

सत्यापन नहीं

हालांकि जिन लड़कियों नें अपने अनुभव सुनाये उनकी बात का अलग से सत्यापन नहीं हो पाया है. कुछ जानकारों को ऐसा लगता है कि जो कुछ यह लड़कियां कह रहीं हैं कहीं वह भी 'प्रशिक्षण' का ही एक हिस्सा तो नहीं है? यानि उन्हें ऐसा कहने के लिए प्रेरित किया गया होगा. इस समूह में कई ऐसी भी हैं जो मानव तस्करी का शिकार हुई थीं जिन्हें दिल्ली या अन्य बड़े महानगरों में दलालों के ज़रिये बेच दिया गया था.

आज यह लड़कियां वापस अपने घर लौट आई हैं. मगर अब उनके अपनों ने उनसे किनारा कर लिया है.

ऐसे में उन्हें मिल रहा प्रशिक्षण एक सम्मानजनक ज़िंदगी जीने की राह दिखा रहा है.