औरत या मर्द होने का एहसास बचपन से?

औरत हैं या मर्द?
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आप औरत हैं या मर्द? आप कहेंगे कि भला ये कैसा सवाल हुआ?

बचपन से ही आपको अपने बारे में ये एहसास रहता है कि आप लड़का हैं या लड़की.

लेकिन, हमेशा ऐसा नहीं होता. आपने ऐसे बहुत से लोगों के बारे में सुना होगा, जो लड़की होते हुए मर्द होने का एहसास करते थे.

वहीं बहुत से मर्द ऐसे भी होते हैं जो अपने अंदर लड़कियों वाले गुण महसूस करते हैं.

ऐसे कई लोगों ने ऑपरेशन करा कर अपना लिंग भी बदला है.

जो लोग ऐसा नहीं करते, वो कभी चोरी-छुपे और कभी खुलकर अपने एहसास को बयां करते हैं. कभी बर्ताव से और कभी अपने पहनावे में हेर-फेर करके.

औरत हैं या मर्द?

दुनिया में कई ऐसे लोग भी होते हैं जो न औरत होते हैं और न ही मर्द. सेक्स को लेकर उनके एहसास एकदम अलग ही होते हैं.

दुनिया ऐसे ही तमाम तरह के लोगों से बनी है. इसलिए इसे सिर्फ़ औरत या मर्द के खांचे में बांटकर देखना सही नहीं.

सवाल ये है कि लड़की या लड़का, औरत या मर्द होने का एहसास कैसे पैदा होता है? कहां से आती है ये फ़ीलिंग?

इस बारे में बरसों से बहस चल रही है. सत्तर के दशक में महिलावादी आंदोलन में शामिल औरतों ने बराबरी दिखाने के लिए लड़कों को लड़कियों जैसे कपड़े पहनाए.

वहीं लड़कियों को लड़कों वाले खिलौनों से खेलने को कहा. हालांकि ऐसा ज़्यादा दिन नहीं चल सका.

नब्बे के दशक में लोग, इस फ़र्क़ की जड़ औरतों और मर्दों के दिमाग़ में तलाशने लगे.

वहां भी वैज्ञानिकों को निराशा ही हाथ लगी. क्योंकि कुछ ख़ास उदाहरणों को छोड़ दें तो औरत और मर्द के दिमाग़ में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं होता.

अगर आपको एक दिमाग़ दे दिया जाए तो आप ये नहीं बता पाएंगे कि वो मर्द का है या औरत का. यहां तक कि ट्रांसजेंडर्स के दिमाग़ भी आम इंसानों जैसे ही होते हैं.

औरत हैं या मर्द?

स्पेन की मैड्रिड यूनिवर्सिटी के एंतोनियो गिलामॉन ने इस बारे में काफ़ी पड़ताल की है.

वो बताते हैं कि मर्दों जैसे महसूस करने वाली औरतों के दिमाग़ में मर्दों वाले कुछ लक्षण देखने को मिलते हैं.

वहीं औरतों जैसे महसूस करने वाले मर्दों के दिमाग़ में भी मामूली हेर-फेर देखा गया.

मगर ये बदलाव इतना बड़ा नहीं था कि ये कहा जाए कि औरत और मर्द होने का एहसास इंसान के दिमाग़ में पैदा होता है.

वैज्ञानिक ये भी कहते हैं कि हमारे दिमाग़ में ख़ुद को वक़्त, हालात और ज़रूरत के हिसाब से ढाल लेने की ताक़त होती है.

ऐसे में ये भी हो सकता है कि जिन मर्दों ने औरतों जैसा महसूस करना शुरू किया, उनके दिमाग़ में भी उसी के बाद बदलाव आया.

आख़िर इन्हीं एहसासों की बदौलत उनका बर्ताव, उनका माहौल, उनके साथी तय होते हैं.

तो दिमाग़ इन संकेतों को समझकर अपने अंदर ज़रूरी बदलाव कर लेता है.

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जैसे कि ट्रांसजेंडर अपनी ज़िंदगी के शुरुआती दौर में अपना यौन झुकाव नहीं समझ पाते.

वो बाद में ऐसा महसूस करते हैं. इसके बाद उनकी चाल-ढाल में बदलाव आना शुरू हो जाता है.

जब ये बदलाव आता है तो दिमाग़ भी ज़रूरी बदलाव कर लेता होगा.

अब दिमाग़ के मोर्चे पर भी मात मिल चुकी है तो आख़िर कैसे पता चले कि लड़का या लड़की होने का एहसास हमारे अंदर कहां से आता है? कब इसकी शुरुआत होती है.

जीव विज्ञान के नज़रिए से देखें तो मर्दों के शुक्राणु में एक्स और वाई क्रोमोज़ोम होते हैं.

अगर औरत के अंडाणु से वाई क्रोमोज़ोम मिलता है तो लड़का होता है. एक्स क्रोमोज़ोम के मां के अंडाणु से मिलने से लड़की होती है.

ऐसा टेस्टोस्टेरॉन नाम के हारमोन की वजह से होता है, जो वाई क्रोमोज़ोम की मदद से लड़के के भ्रूण का विकास करते हैं.

ये तो हुआ जीव वैज्ञानिक बंटवारा. लेकिन मनोवैज्ञानिक एहसास की शुरुआत बच्चा होने के बाद भी शुरुआती दौर में नहीं होती. सारे नवजात बच्चे एक जैसे ही होते हैं.

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उनके अंदर लड़की या लड़के वाले एहसास, समाज का माहौल डालता है.

लेकिन, एम्सटर्डम के वैज्ञानिक डिक स्वाब इस ख़्याल को भी ग़लत मानते हैं.

वो डेविड रीमर नाम के एक शख़्स की मिसाल देते हैं. रीमर जब आठ महीने के थे तो एक ग़लत ऑपरेशन की वजह से उनका पेनिस कट गया था.

इसके बाद डॉक्टरों ने सोचा कि बेहतर होगा कि उनकी परवरिश लड़की जैसे हो.

17 महीने की उम्र में उनके अंडकोश या टेस्टिकिल भी ऑपरेशन से हटा दिए गए.

रीमर का नाम ब्रेंडा रख कर उनकी परवरिश लड़कियों जैसे होने लगी.

मासिक धर्म शुरू होने पर उन्हें महिलाओं के हारमोन दिए गए. लेकिन, ब्रेंडा को कभी लड़की होने का एहसास ही नहीं हुआ.

बड़े होने पर उसने ऑपरेशन करके ख़ुद को मर्द बना लिया.

इससे साफ़ है कि औरत या मर्द होने का एहसास बहुत बचपन में ही आ जाता है.

अब बच्चों से तो पूछा नहीं जा सकता कि वो क्या महसूस करते हैं?

इसलिए उनके बर्ताव की निगरानी करके सेक्स को लेकर उनके एहसास का पता लगाने की कोशिश होती है.

औरत हैं या मर्द?

कई बार उनके खिलौनों की पसंद देखकर हम पता लगा लेते हैं कि लड़का है या लड़की.

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की मेलिसा हाइन्स कहती हैं कि बच्चों के खिलौनों की पसंद हमें उनके एहसास का अच्छा संकेत देती है.

लड़के अक्सर ट्रक जैसे खिलौनों से खेलना पसंद करते हैं. वहीं लड़कियों को गुड़िया पसंद आती हैं. यहां तक कि बंदरों के बच्चों में भी ये ख़ूबी देखी गई है.

वैज्ञानिक मानते हैं कि इंसान जब मां के गर्भ में होता है, तभी हार्मोन का बहाव उसके लड़की या लड़का होने के एहसास को तय कर देता है.

एक ख़ास बीमारी, जिसमें कुछ लड़कियां मां के पेट में थीं, तो उनके गर्भाशय में टेस्टोस्टेरॉन नाम के हारमोन का बहाव ज़्यादा हो गया.

आगे चलकर इन बच्चियों के अंदर मर्दों वाले एहसास आ गए थे.

बहुत से लोगों को अपनी ज़िंदगी में इस बात का कनफ्यूज़न होता है कि वो औरत हैं या मर्द.

कई बार वो हार्मोन लेकर अपने एहसास से मेल करने की कोशिश करते हैं.

और कई बार उनकी कोशिश कामयाब होती हैं और कई बार वो ज़िंदगी भर अपने असली किरदार को तलाशते रहते हैं.

इसकी शुरुआत कई बार मां के गर्भ से हो जाती है. तो, कई बार माहौल, खान-पान से भी औरत या मर्द होने के हमारे एहसास पर असर पड़ता है.

तो कुल मिलाकर, हमारे अंदर मर्द या औरत होने का एहसास पैदा करने की कई वजहें होती हैं.

पहली वजह, मां के पेट का माहौल और हार्मोन हैं. दूसरी वजह हमारा दिमाग़ है. और तीसरी वजह, वो माहौल जहां हमारी परवरिश होती है.

फिर भी अभी इस सवाल का ठोस जवाब मिलना बाक़ी है कि हमारे अंदर, लड़का या लड़की होने का एहसास कब-कहां से आता है?

वैज्ञानिक इस सवाल का जवाब तलाशने में जुटे हैं.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href=" http://www.bbc.com/future/story/20160620-the-complex-circumstances-that-defined-your-gender" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी फ्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)

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