याद रखें, 'मौत आपको भी आएगी'

डेथ फोटोगाफ
    • Author, बेथन बेल
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़
  • प्रकाशित

अपनों की मौत के बाद उनकी तस्वीर लेना आधुनिक युग में संवेदनहीन माना जा सकता है. लेकिन इंग्लैंड में विक्टोरियन काल में मौत को यादगार बनाने और दुख को कम करने के लिए ऐसा किया जाता था.

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ये तस्वीरें परेशान करने वाली और मार्मिक भी होते थे, परिवार वाले मृत व्यक्ति के साथ पोज़ करते थे, बच्चे ऐसे लगते थे मानों सो रहे हों, और मृत युवा महिलाएं तस्वीरों में सुंदर ढंग से झुकीं, मानों बीमारी ने ना केवल उनकी जान ले ली, मगर उनकी ख़ूबसूरती भी बढ़ा दी हो.

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विक्टोरियन काल में कम उम्र में या बीमारी से मौतें आम थीं. महामारी, जैसे डिप्थेरिया, टाइफ़स और हैज़ा ने पूरे देश में दहशत फैला दिया था. लेकिन 1861 से शोकसन्तप्त महारानी ने मातम मनाने को मानो फैशनेबल बना दिया. तस्वीरें मानों ये बताती थीं कि, "याद रखना कि तुम्हें मरना है."

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मरने के बाद भी याद रखने का रिवाज विक्टोरियन काल से भी पहले से भी कई रूप में चली आ रही थी.

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मृतकों के बाल काटकर उन्हें लॉकेट और अंगूठियों में पहना जाता था. मोम से तैयार डेथ मास्क बनाए जाते थे, और तस्वीरों और मूर्तियों में मृतकों की छवि और चिह्न दिखाई देते थे. मध्य 1800वीं में फोटोग्राफी लोकप्रिय हो रही थी और पहले की तुलना में ये कम ख़र्चीला हो गया था.

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पहली बार सफ़ल फोटोग्राफी, चमकती चांदी पर छोटी, अत्यधिक विस्तृत छवि वाली तस्वीरें विलासिता में गिनी जाती थी. लेकिन फिर भी ये पोट्रेट बनवाने जितना मंहगी नहीं थी. पहले के ज़माने में किसी की यादों को संजोने की लिए पोट्रेट बनवाना ही इकलौता तरीक़ा था.

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जैसे-जैसे फोटोग्राफरों की तादात बढ़ी, फोटोग्राफ़ी सस्ती होती गई. 1850 के दौरान कम क़ीमत वाले फोटोग्राफी के तरीक़ो का इजाद हुआ, जैसे पतले धातु का इस्तेमाल, और चांदी की जगह कांच या कागज़ का उपयोग.

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मरने के बाद की तस्वीरें खूब लोकप्रिय हुईं. विक्टोरियन काल में ख़सरा, डिप्थीरिया, स्कार्लेट बुख़ार, रूबेला जैसी बीमारियां फ़ैलती थीं. ये सभी जानलेवा थीं. ऐसे में परिवारों ने इस तरीके़ के फोटोग्राफी को बढ़ावा दिया. उनके लिए ये आखि़री मौक़ा होता था अपने प्यारे बच्चे की याद को हमेशा अपने पास सनजोकर रखने का.

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लेकिन जैसे स्वास्थ्य सेवा बेहतर हुई, बच्चों के जीवित रहने की उम्मीद भी बढ़ी और डेथ फोटोग्राफी की मांग घटी. स्नैपशॉट्स के आने से इस कला को और नुक़सान पहुंचा. ज्यादातर परिवार जीवित रहते हुए तस्वीरें खिंचाना चाहते थे.

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अब पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की ऐसी तस्वीरें, जिसमें वो अपने दुख को छुपा रहे हैं, ताकि मृतक की तस्वीरे से उनके चेहरे के भाव मेल खा सके . अपने नाम के ही मुताबिक़ अपना किरदार निभा रहे हैं.

याद रखिए, आपको भी मरना है.

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