पाकिस्तान: कब्रों के लिए भी सिफ़ारिश

इस्लामाबाद में कैपिटल डेवलपमेंट की कब्रगाह.
इमेज कैप्शन, इस्लामाबाद में एक सरकारी कब्रगाह.
    • Author, अहमद रज़ा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
  • प्रकाशित

इस्लामाबाद निवासी कामरान अतहर के सामने कुछ सप्ताह पहले अपने चाचा की मौत के बाद कब्र के लिए दो गज़ ज़मीन की तलाश एक समस्या बन गई.

उनके चाचा सरकारी बैंक के बड़े अफ़सर थे और कुछ साल पहले ही क़्वेटा से इस्लामाबाद आ बसे थे.

कामरान अतहर ख़ुद भी सरकारी बैंक में अफ़सर हैं. उन्होंने बताया कि इस्लामाबाद के दोनों सरकारी क़ब्रिस्तानों में उन्हें कब्र के लिए जगह नहीं मिल सकी.

सरकारी कब्रिस्तान के कर्मचारियों ने कहा, "आपके पहचान पत्र पर क़्वेटा का पता दर्ज है, इसलिए यहां पर आपको जगह नहीं मिल सकती क्योंकि यहां केवल इस्लामाबाद वालों को ही दफ़न होने की अनुमति दी जाती है. "

राजधानी में जो बाकी कब्रिस्तान हैं वो या तो ख़ास समुदायों जैसे शिया और इस्माइली मुसलमानों के हैं या स्थानीय गांव वालों के हैं.

दो गज़ ज़मीन की मुश्किलें

कामरान अख़्तर

अतहर को बाद में चाचा के ही पड़ोसी के पहचान पत्र पर शहर के एक दूसरे कब्रिस्तान में कब्र की जगह मिली जो उनके घर से 28 किलोमीटर दूर है.

अतहर कहते हैं, "हमारे चाचा के पुराने मकान मालिक के कोई रिश्तेदार थे, जिन्होंने हम पर ये मेहरबानी की और कब्र की जगह दिलवाई."

कैपिटल डेपलपमेंट अथॉरिटी कहती है कि समस्या कुछ और है जिसकी वजह से उसे देखना पड़ता है कि दफन होने वाला कौन है.

सीडीए चेयरमैन मारूफ़ अफ़जल
इमेज कैप्शन, सीडीए चेयरमैन मारूफ़ अफ़जल के मुताबिक़ इस्लामाबाद की कब्रगाहों में जगह कम है.

सीडीए के चैयरमैन मारूफ़ अफ़जल कहते हैं "हम लोगों से दस्तावेज़ मांगते हैं तो वह इसलिए कि यहां क़ब्रिस्तानों में जगह कम है."

अफ़जल आगे कहते हैं, “यह कब्रिस्तान डेवलपमेंट क्षेत्र के अंदर हैं, तो हमें यह देखना पड़ता है कि लोग यहाँ पर किस कारण से रह रहे हैं."

इस्लामाबाद में मुसलमानों के लिए दो सरकारी कब्रिस्तान हैं.

एक में जगह ख़त्म हो चुकी है. दूसरा जो सटे हुए शहर रावलपिंडी के पास है, वहाँ क़ब्रिस्तानों में जगह की भारी कमी है.

नक़्शे पर कब्रिस्तान

इस्लामाबाद की हाउसिंग सोसायटी

बलूचिस्तान, ख़ैबर पख़्तूनख्वा या कबाइली इलाकों से यहाँ आ कर जो लोग बस गए हैं, उनके लिए परिवार वालों की ख़ातिर क्रब की जगह ढूँढना मुश्किल हो गया है.

राजधानी के कई इलाकों में निजी हाउसिंग सोसाइटीज़ हैं. इन इलाक़ों के नक्शों में तो कब्रिस्तान है लेकिन ज़मीन पर नहीं.

फ़ेडरेशन ऑफ़ इम्प्लाइज़ सहकारी सोसायटी के अध्यक्ष अरमान अज़ीज़ ने बताया कि उनके अपने इलाक़े के नक्शे में भी कब्रिस्तान मौजूद था, मगर बाद में इस जगह पर दुकानें बना दी गईं.

अज़ीज़ कहते हैं, "यह बिना सरकारी अधिकारियों और सोसायटी के पदाधिकारियों की मिलीभगत के नहीं हो सकता था."

सिफारिश का सहारा

कब्रिस्तान

अज़ीज़ बताते हैं, "अगर निजी आवासीय इलाक़ों में कोई मर जाता है तो उसे दफ़नाने की जगह नहीं मिलती. लोग सिफारिशों या बाकी तरीकों से कब्रें खरीदते हैं. "

इस्लामाबाद के इमरान उल मुल्क ने भी बीबीसी उर्दू को अपना क़िस्सा बताया. कुछ समय पहले उनके क़रीबी रिश्तेदार की मौत हो गई तो वो कब्रिस्तान गए.

इमरान बोले "हमें कहा गया कि अगर हम यह बताएंगे कि हम कब्रिस्तान के नज़दीक नहीं रहते हैं तो हमें सरकारी कब्रिस्तान में जगह नहीं मिलेगी."

इसलिए उन्होंने अपने रिश्तेदार के किसी पुराने ग़लत कार्ड पर कब्र के लिए जगह ली.

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