वो विमान जो पीछे की ओर भी उड़ता है

    • Author, स्टीफ़न डॉलिंग
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
  • प्रकाशित

अप्रैल के शुरू में उत्तर कोरियाई मीडिया ने अपने सबसे महत्वपूर्ण सैन्य विमान से जुड़ी योजना के बारे में जानकारी को सार्वजनिक किया.

उत्तर कोरिया के शीर्ष नेता किम जॉन्ग-उन ख़ुद भी टीवी पर इस विमान से जुड़े फुटेज में दिखाई दिए.

ये कोई चमकीला और फुर्तीला लड़ाकू जेट नहीं है – बल्कि यह 1940 के दशक का बाइप्लेन है जो देखने में ऐसा लगता था मानो ट्रैक्टर में किसी ने पंख लगा दिए हैं.

उत्तरी कोरिया का ए-एन-2 एक ऐसा विमान है जिसे दक्षिण कोरियाई सीमा पर कमांडो को उतारने के लिए कम ऊंचाई पर कम गति से उड़ाया जा सकता है- इतनी कम ऊंचाई पर कि इसका रेडार की पकड़ में आना भी मुश्किल है.

एंटोनोव ए-एन-2 जिसका उत्तरी कोरिया ने बहुत गर्व से प्रदर्शन किया, उसके ऊपरी हिस्से को अब हरे रंग से और निचले हिस्से को नीले रंग से रंग दिया गया है. यह रंग ऐसा है कि इसे ऊपर उड़ान भर रहे विमान से देखना मुश्किल होता है और जमीन से भी इस पर नज़र नहीं रखी जा सकती.

पर सवाल उठता है कि वर्ष 2015 में उत्तरी कोरियाई एक ऐसा विमान क्यों इस्तेमाल करेगा जो इंडियाना जोन्स के दौर (यानी 1980-90 के दशक) की फिल्म का विमान लगता है न कि युद्ध के मैदान की अग्रिम पंक्ति का.

पीछे उड़ने की क्या ज़रूरत?

एंटोव ए-एन-2 ने पहली बार 1947 में उस समय उड़ान भरी जब द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ पुनर्निर्माण में जुटा था. अपनी पहली उड़ान पर भी यह विमान पुराना लग रहा था; उस समय तक विमानन क्षेत्र जेट युग में प्रवेश कर चुका था.

लेकिन ए-एन-2 का डिज़ाइन बहुत ही पुख़्ता था – हज़ारों की संख्या में ये विमान बनाए गए थे और दुनिया के हर हिस्से में इनका निर्यात किया गया था. ये उत्पादन की शुरूआत के 70 साल बाद भी सेवा में है. और इस विमान की एक ख़ासियत है – छोटी ‘टेक ऑफ’ और ‘लैंडिंग’ के अलावा एक असंभव सी खूबी - यह पीछे की ओर भी उड़ सकता है.

ए-एन-2 को इस तरह डिजाइन किया गया था ताकि वह रूसी वन मंत्रालय की ज़रूरतों को पूरा कर सके – फसलों से भूसा उड़ा सके और यात्रियों को भी ढो सके.

इसके डिज़ाइनर ओलेग एंटोनोव ने एक बड़ा, एकल-इंजन बाइप्लेन बनाया था जिससे एक कॉकपिट जुड़ा था और 12 लोगों के बैठने की जगह इसमें थी या इसकी जगह वह एक टन से थोड़ा अधिक तक माल ढो सकता था.

ए-एन-2 को बहुत ही ऊबड़-खाबड़ वायु क्षेत्र से उड़ानें भरनी थीं जो ज़मीन धूल से भरी थी. उसे रूस के ऐसे जंगलों से उड़ान भरनी थी जहां बस्तियाँ कम थीं. ऐसी परिस्थितियों के लिए एक ऐसे साधारण और मजबूत विमान चाहिए था जो कि कभी भी ज़रूरत पड़ने पर संकरी जगह पर भी उतर सके या वहां से उड़ान भर सके – और वह ऐसा विमान हो जिसका रख रखाव जटिल हेलिकॉप्टरों से भी आसान हो.

सोवियत संघ में 19,000 से भी अधिक ऐसे विमान बनाए गए और उसके बाद 1991 तक पोलैंड में इनका निर्माण होता रहा, फिर हजारों विमान लाइसेन्स के तहत चीन में बनाए गए.

खूब शोर मचाता है विमान

“ए-एन-2 के अभी तक उड़ान भरते रहने का कारण यह है कि अभी तक ऐसा कोई दूसरा विमान बना ही नहीं.” ऐसा कहना है विमानन विषय पर लिखने वाले बर्नी लेटन का जिन्होंने बेलारूस में ए-एन-2 विमान में यात्रा की है. “अगर आपको एक ऐसा विमान चाहिए जो 10 सैनिकों, यात्रियों या बकरियों को ले जा सके और कहीं से भी उड़ान भर सके, तो इसके लिए या तो ऐसा विमान चाहिए या फिर हेलिकॉप्टर”.

“ए-एन-2 में उड़ान भरना आधुनिक युग में किसी विमान में यात्रा करने से एकदम अलग है. पहला यह कि यह ‘टेल ड्रैगर’ है – मतलब यह कि इसकी पूंछ जमीन की ओर झुकी होती है और एक बार जब आप केबिन में पहुंच जाते हैं तो आपको लगता है कि हर चीज़ पीछे की ओर झुकी हुई है. यह एक बहुत सॉलिड विमान भी है. अगर आप इसमें बैठकर यात्रा करते हैं तो आप एक एक उछाल को महसूस कर सकते हैं. और यह याद रखना जरूरी है कि यह विमान यात्रियों को ले जाने के लिए नहीं बना था,” यह कहना है लेटन का.

“क्या यह विमान बहुत शोर करता है? हां, अगर एकल-इंजन विमान की बात करें तो. छोटी-छोटी खिड़कियों के होने के बावजूद क्या यह अंदर से आश्चर्यजनक रूप से गरम है? हां. लेकिन इन सबके बावजूद एक बार जब आप हवा में उड़ने लगते हैं तो यह काफी मजेदार बन जाता है”.

ए-एन-2 का पुराना डिज़ाइन कुछ लक्ष्य प्राप्त करने के लिए है; इसके बाइप्लेन में लगे इसके दो पंखों का सेट इसे काफी ज़्यादा लिफ़्ट देता है इससे यह बहुत ही छोटे रनवे से उड़ान भर सकता है.

ए-एन-2 की न्यूनतम गति आश्चर्यजनक रूप से काफी धीमी होती है. 40 किलोमीटर (25 मील) प्रति घंटे की गति पर भी पायलट पूरे नियंत्रण से इस विमान को उड़ा सकता है.

औसतन रुप से कोई विमान 50 मील (80 किलोमीटर) प्रति घंटे से नीचे की रफ़्तार पाते ही रुक जाता है. यही वजह है जिससे, ए-एन-2 पैराशूट प्रशिक्षणों और स्काइडाइविंग का प्रशिक्षण देने वाले स्कूलों में काफी लोकप्रिय है और इसका यह भी अर्थ है कि यह विमान हवा में मंडरा सकता है और ए-एन-2 के पायलट एयरशो में अक्सर यह करतब दिखाया करते हैं.

ऐसा करने के लिए पायलट सामने से आ रही हवा में विमान को उड़ाता है और अगर हवा की गति काफी तेज होती है तो इस करतब की वजह से विमान पूरे नियंत्रण में रहते हुए बहुत धीमे-धीमे पीछे की ओर जाने लगता है.

विलक्षण डिजाइन

क्या यह असंभव लगता है? इस बारे में हमने बिल लेयरी से पूछा जो इंग्लैंड ए-एन-2 क्लब के फ्लाइट मैनेजर हैं. ये इंग्लैंड के बेसिंगस्टोक के पास स्थित पोफाम एयरफील्ड से उड़ान भरता है. वह पिछले 14 सालों से हंगरी में बने ए-एन-2 विमान को उड़ा रहे हैं.

इस विमान के हवा में मंडराने या फिर उचित परिस्थितियों में पीछे की ओर उड़ना – ये दोनों ही बातें इसके पंखों के कारण संभव हो पाती हैं. इसके सामने लचीले पैनल लगे होते हैं जो अमूमन विमान को उतारने के समय काम में लाये जाते हैं क्योंकि ये हवा का प्रतिरोध बढ़ा देते हैं और विमान की गति को कम कर देते हैं.

पंख के पिछले हिस्से में इसी तरह के पैनल फ्लैप्स कहलाते हैं और इनका प्रयोग भी विमान की गति को कम करने में हो सकता है पर ये पंख के आकार को बदल देते हैं जिसके कारण विमान को लिफ्ट मिलती है. ए-एन-2 में ये फ्लैप्स निचले पंख की पूरी लंबाई तक जाते हैं और ऊपरी पंख पर ये इससे भी ज़्यादा दूरी तक जाते हैं और इसकी वजह से विमान को काफी ज्यादा लिफ्ट मिलती है और इसे हास्यास्पद रूप से न्यूनतम गति भी देता है.

“अगर हवा काफी तेज है जैसे कि 15 से 20 नॉट्स, तो आप हवा में विमान को ‘मंडरा’ सकते हैं,” यह कहना है लेयरी का. “आप सभी फ्लैप्स को नीचे कर दें, पंखों के आगे लगे फ्लैप्स को भी नीचे कर दें और विमान को गतिशील हवा में 40 डिग्री पर मोड़ दें तो इससे विमान को काफी शक्ति प्राप्त होती है और आप उसको वहीं पर बनाए रख सकते हैं.”

रोमांच से भरा विमान

लेयरी का कहना है कि ए-एन-2 को उड़ाना एक आनंददायक अनुभव है पर उनका यह भी कहना है कि इस पर काफी ध्यान रखना पड़ता है. यह ‘कंट्रोल स्टिक’ पर होने वाले संचलन के प्रति काफी संवेदनशील होता है – कहें तो यह विमान ‘उड़ना चाहता है’, इसलिए इसे ऊपर की ओर ले जाने के लिए प्रयास करना पड़ता है. पर इस विमान को घुमाने के लिए काफी मशक्कत करने की ज़रूरत पड़ती है.

ए-एन-2 में आधुनिक बोइंग या एयरबस की तरह कोई कंप्यूटर प्रणाली नहीं होती और न ही कोई हाइड्रोलिक कंट्रोल होता है जिसमें कम ताक़त लगाने की ज़रूरत होती है – इसमें सब कुछ मानव प्रयासों पर ही निर्भर रहता है,” यह कहना है लेयरी का. इसके लिए काफी ताकत की ज़रूरत होती है और आपकी मांसपेशियां लोहे की तरह मजबूत होनी चाहिए.

अगर यह ए-एन-2 बर्लिन दीवार के दूसरी ओर बनाया गया होता तो शायद यह ज़्यादा मशहूर होता. “ए-एन-2 आपकी जान तभी लेता है जब आप इसमें पायलट की सीट पर बैठकर कोई ग़लतियां करते हैं,” यह कहना है लेटन का. “धातु से ऊब” (मेटल-फटिग) होना अमूमन सामान्य बात होती है.

अगर ए-एन-2 का इंजन फेल होता है तो आपको इस बात की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है कि विमान को कहां उतारना है. यह बहुत ही आरामदायक विमान भले ही न हो, पर यह बहुत ही सुरक्षित है और पीछे की ओर भागने की इसकी क्षमता तो इसे एक अलग ही वर्ग में स्थापित कर देती है.

<italic><bold>अंग्रेज़ी में <link type="page"><caption> मूल लेख</caption><url href="http://www.bbc.com/future/story/20150415-the-plane-that-can-fly-backwards" platform="highweb"/></link> यहां पढ़ें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी फ़्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.</bold></italic>

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