नादिया के 'सपनों का पाकिस्तान'

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- Author, शाज़ेब जिलानी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
- प्रकाशित
लाहौर की रहने वाली 18 वर्षीय नादिया अली यूनिवर्सिटी में पढ़ती हैं, पर अभी वे परिवार के साथ इस्लामाबाद की सड़कों पर तंबू गाड़े हुए हैं.
वे उन प्रदर्शनकारियों में शामिल हैं जो एक महीने से प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को सत्ता से बेदख़ल करने के लिए राजधानी की सड़कों पर डटे हैं.
भारी उमस और बारिश के बीच वो पाकिस्तान की संसद के सामने लगाए गए एक तंबू में रह रही हैं.
दूसरी तरफ़ सरकार झुकने को तैयार नहीं है.
शाज़ेब जिलानी का विश्लेषण
जब अगस्त के आख़िरी हफ़्ते में <link type="page"><caption> पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसा भड़की</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/08/140831_pak_protest_clash_situation_vs.shtml" platform="highweb"/></link>, तब नादिया उन महिला स्वयंसेवियों की टीम का हिस्सा थी, जो अपने घायल साथियों की मदद कर रहे थे.
प्रधानमंत्री आवास में घुसने की कोशिश कर रहे प्रदर्शनकारियों को पीछे धकेलने के लिए दंगारोधी पुलिस ने आँसू गैस के गोले छोड़े और रबड़ की गोलियां दागी थी.
भीड़ ने पुलिस के ख़िलाफ़ लाठी-डंडों और पत्थरों का इस्तेमाल किया. इन हिंसक घटनाओं में कम से कम तीन लोग मारे गए और पुलिसकर्मियों और पत्रकारों समेत लगभग 500 लोग घायल हो गए थे.
पहले क्रांति, फिर पढ़ाई
मैंने नादिया से पूछा, "आपने काफ़ी कुछ किया. क्या अब आपको यूनिवर्सिटी नहीं लौट जाना चाहिए?"

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बेहद गंभीर दिख रही नादिया ने कहा, "अभी नहीं, क्रांति पहले, उसके बाद पढ़ाई."
इसके बाद उन्होंने मुझसे सवाल किया, "ऐसी व्यवस्था में यूनिवर्सिटी की डिग्री हासिल करने का क्या मतलब है, जहां मेरे जैसे लोगों को अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी, क्योंकि मेरे पास घूस देने के लिए पैसे नहीं हैं और न ही राजनीतिक कनेक्शन? हमें पहले व्यवस्था बदलनी होगी."

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पाकिस्तान की मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था में अविश्वास जताने वाली नादिया इकलौती नहीं हैं, बल्कि इनकी तादाद लाखों में है. देशभर में भ्रमण के दौरान मैं इस तरह की आवाज़ें सुनता रहता हूं.
राजनेताओं और आम जनता के बीच बढ़ती खाई के चलते ये ग़ुस्सा और तेज़ी से बढ़ा है.
इससे नादिया जैसे युवाओं को यह सवाल उठाने का मौक़ा मिला है कि देश में ऐसे लोकतंत्र का क्या मतलब है जहां ज़्यादातर पार्टियां अमीर और ताक़तवर परिवार चला रहे हैं... जहां अपराध और राजनीति की रेखा बहुत धुंधली है.. जहां पुलिस, अदालतें और नौकरशाही प्रमुख रूप से उच्च वर्ग की सेवा में लगी रहती हैं...सब कुछ लोकतंत्र के नाम पर!
दोषपूर्ण चुनाव प्रक्रिया
इसमें कोई दोमत नहीं है कि <link type="page"><caption> पाकिस्तान की चुनावी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/03/130316_pakistan_ahmed_rashid_da.shtml" platform="highweb"/></link> प्रक्रिया में कई दोष हैं.

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मैंने अस्सी के दशक से इसे बहुत नजदीक से देखा है और मैं आपको बता सकता हूं कि जिस तरह से चुनाव होते हैं, वोटों की गिनती होती है, उस प्रक्रिया में निष्पक्षता, विश्वसनीयता की कमी है.
अपनी पसंद के चुनावकर्मियों की तैनाती, फर्ज़ी मतदान, बूथ पर कब्जा और हिंसा यहां चुनाव का हिस्सा हैं.
परंपरागत पार्टियों ने इन सबमें इस कदर महारत हासिल कर ली है कि जनसमर्थन के बिना नई पार्टियों को इस व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़े होने का मौका तक नहीं मिलता.
नादिया जैसा नाराज़ प्रदर्शनकारी शायद यह याद करने के लिए अभी बहुत छोटे हैं कि पाकिस्तान पहले भी इस राह पर चल चुका है.
म्यूजिकल चेयर्स का खेल
1990 के दशक को तो अक्सर 'गंवाए गए दशक' के रूप में याद किया जाता है, जब कुल चार सरकारें बनीं और गिरीं यानी हर दो साल बाद नई सरकार.

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ये म्यूजिकल चेयर्स के खेल की तरह था. जिसमें बेनज़ीर भुट्टो और नवाज़ शरीफ़ बारी-बारी से एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार और कुशासन का आरोप लगाते हुए कुर्सी पर बैठे.
राजनेताओं के इस खेल ने सेना को प्रेरित किया. सेना पाकिस्तानियों को ये यकीन दिलाना चाहती थी कि ये देश लोकतंत्र के लिए फ़िट नहीं है.
जिस तरह से राजनेताओं का बर्ताव रहा, कई लोग भी लोकतंत्र की इस व्यवस्था से उकता गए.
अब भी, पाकिस्तान और इसके राजनेताओं को विकसित होना है.
'एकजुट राजनेता'

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मौजूदा संकट में विपक्षी पार्टियों समेत पूरी संसद ने प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ सरकार के रुख़ का समर्थन किया है.
लेकिन नादिया जैसे प्रदर्शनकारियों के लिए यह भ्रष्ट उच्च वर्ग का एक-दूसरे को बचाने का एक और प्रयास भर है.
लोगों के बीच एक और धारणा बनती जा रही है कि भले ही राजनेताओं की अपना काम करने की हालत दयनीय है और उनमें बदलाव लाने की इच्छाशक्ति की कमी है, फिर भी उन्हें कमज़ोर करने या जबरन हटाने के लिए ये पर्याप्त वजह नहीं है.
प्रदर्शन पर संदेह

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कई बार सैन्य तख्तापलट और पृष्ठभूमि से जनरल की हुकूमत चलने जैसी मान्यता वाले देश के लिए यह सोच एक बड़ी छलांग है.
यही वजह है कि इस्लामाबाद में हुए सरकार विरोधी प्रदर्शनों को कई पाकिस्तानी संदेह की नज़रों से देखते हैं.
इन धरना प्रदर्शनों का संदेश तो लोकप्रिय है और नादिया जैसे लोगों को अपनी ओर खींचता है.
लेकिन अंत में, आयोजकों की उम्मीदों के मुताबिक लोग नहीं जुट पाते हैं.
कहां है राह

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तो यह पाकिस्तान को कहां छोड़ रहा है?
संभवतः पाकिस्तानी इमरान ख़ान और धर्मगुरु ताहिरुल क़ादरी के क्रांतिकारी विचारों को लेकर बहुत उत्साहित नहीं है.
शायद वे इस देश में ज़्यादा उथल-पुथल नहीं चाहते हुए अपनी ज़िंदगी जीना चाहते हैं. शायद पाकिस्तानियों के पास आधे-अधूरे लोकतंत्र में होने वाले धीमे बदलावों के लिए बहुत ज़्यादा धैर्य है.
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