जापान सैन्य ताकत बढ़ाने को लेकर क्यों फंसा है असमंजस में?

युद्ध बाद प्रशांत केंद्रित नीति को लेकर प्रतिबद्धता पर जापान में बहस तेज हो रही है
इमेज कैप्शन, युद्ध बाद प्रशांत केंद्रित नीति को छोड़ सैन्यीकरण की ओर बढ़ने को लेकर जापान में बहस तेज हो गई है
    • Author, टेसा वॉन्ग
    • पदनाम, एशिया डिजिटल संवाददाता, बीबीसी
  • प्रकाशित

तोशियुकी मिमाकी को आज भी वो दिन याद है जब हिरोशिमा पर परमाणु बम हमला हुआ था.

उस समय वो महज तीन साल के थे, लेकिन उन्हें याद है कि ग्रामीण इलाके में स्थित उनके घर से होकर घबराए और जले हुए लोग भागे जा रहे थे.

उन्हें ये भी याद है हर तरफ फैले मलबे में अपने पिता को खोजने के लिए वो अपने परिवार के साथ शहर गए थे.

सालों से वो इन टुकड़े टुकड़े लेकिन जीवंत यादों को स्कूली बच्चों, पत्रकारों या हिबाकुशा (बच गए लोग) के हालात को दर्ज करने वाले किसी भी व्यक्ति या परमाणु बम से बचे लोगों से साझा करते आए हैं.

अब ऐसे लोगों की संख्या कम है और लगातार घटती जा रही है.

हिरोशिमा पीस मेमोरियल पार्क में बैठे मिमाकी कहते हैं, "हम जैसे कुछ ही लोग बचे हैं जिन्होंने युद्ध और परमाणु बम का दंश झेला है. हम मर रहे हैं."

यहीं पर जी-7 सम्मेलन आयोजित है जिसमें दुनिया के नेता हिस्सा लेने आ रहे हैं.

वो कहते हैं, "देर सबेर एक भी हिबाकुशा नहीं बचेगा. तब जापान कैसे बदलेगा?"

ये चिंता पूरे जापान में सुनी जा सकती है. दुनिया काफ़ी कुछ बदल चुकी है. जापान खुद बूढ़ा हो चुका है और युद्ध के बाद अर्थव्यवस्था का चमत्कार फीका और चीन के बाज़ार और ताक़त के सामने बौना पड़ गया है.

इन हालात से बेचैन जापानी जनता, दहलीज पर आ खड़े ख़तरे से सुरक्षा चाहती है.

सैन्यवाद के ख़िलाफ़ वोटरों में गहरी भावना ने जिस सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) के हाथ लंबे समय से बांध रखे थे उसे अचानक इस बंधन के ढीले होने का अहसास होने लगा है.

प्रधानमंत्री फूमियो किशिदा की सरकार दशकों बाद रक्षा खर्च में विशाल बढ़ोत्तरी कर रही है और अपने सशस्त्र बलों का विस्तार करना चाहती है.

सैन्यीकरण की ओर हर कदम जापान को इसके पैसेफ़िज़्म या प्रशांत केंद्रित नीति को लेकर अधिक विभाजित कर रहा है.

मिमाकी कहते हैं, "इस समय दुनिया उथल पुथल के दौर से होकर गुजर रही है. हाल ही में पीएम किशिदा ने रक्षा बजट बढ़ाने की बात शुरू की है. मैं सोचता हूं- क्या आप कोई जंग शुरू करने जा रहे हैं?"

तोशियुकी मिमाकी
इमेज कैप्शन, जब हिरोशिमा पर परमाणु बम हमला हुआ तो तोशियुकी मिमाकी तीन साल के थे.

संविधान का वो अनुच्छेद जो सेना रखने से रोकता है

हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम के इस्तेमाल से जापान को घुटनों पर ला दिया गया और इसके बाद महज कुछ सालों में ही वो एक साम्राज्यवादी ताक़त से प्रशांत केंद्रित देश बन गया.

युद्ध के बाद इसके संविधान ने इस संक्रमण को और मजबूत किया. साल 1947 में संविधान स्वीकार किया गया और कब्ज़े वाली अमेरिकी सेना ने इसे लागू कराया.

इसमें एक शर्त है जिसे आर्टिकल 9 के तौर पर जाना जाता हैः इसका पहला पैराग्राफ़ युद्ध से दूर रहने की बात करता है जबकि दूसरे में कभी भी सेना न रखने का वादा किया गया है.

जापान की प्रशांत केंद्रित नीति में आर्टिकल 9 वो मुख्य वजह है जिसकी वजह से देश अपनी रक्षा ज़रूरतों और शांति की चाहत के बीच संतुलन बनाने में संघर्ष कर रहा है.

कुछ लोग मानते हैं कि इस अनुच्छेद ने जापान को कमज़ोर कर दिया है लेकिन कुछ लोगों का तर्क है कि इसे बदलने का मतलब प्रशांत केंद्रित नीति को त्याग देना और इतिहास के दर्दनाक सबक़ को भूल जाना होगा.

जनता की ओर से भारी विरोध के कारण आर्टिकल 9 में संशोधन करने की कोशिश करने वाले कई नेता असफल रहे, लेकिन जैसे जैसे रक्षा चुनौतियां बढ़ीं जापान की सरकार ने इसकी व्याख्या को व्यापक बनाया.

सेना की जगह सेल्फ डिफ़ेंस फ़ोर्सेस (एसडीएफ़) को शीत युद्ध के शुरू होने और कोरियाई युद्ध के दौरान स्थापित किया गया. 1990 में खाड़ी युद्ध के दौरान जापान ने शांति मिशन पर एसडीएफ़ को भेजा. यह पहली बार था जब उसने देश से बाहर अपने सशस्त्र बल भेजे.

जब कुछ साल पहले भूतपूर्व प्रधानमंत्री शिंजो अबे ने चीन से बढ़ते ख़तरे और उत्तर कोरिया के अप्रत्याशित कारनामों से आत्मरक्षा में जापानी सुरक्षा बलों को गठबंधन सेनाओं के साथ मिलकर देश से बाहर लड़ने की इजाज़त दी तो काफ़ी हंगामा मचा.

वीडियो कैप्शन, जी-7 सम्मिट: चीन के बढ़ते असर पर होगी बात?

जापान की युद्ध विरोधी जनता

टेंपल यूनिवर्सिटी जापान में पॉलिटिकल साइंस के एसोसिएट प्रोफ़ेसर जेम्स डी ब्राउन कहते हैं, "प्रशांत केंद्रित नीति जापानी जनता के लिए एक दृढ़ विचार है....वो इसे छोड़ने वाले नहीं."

"इसकी बजाय, प्रशांत केंद्रीय नीति की व्याख्या करने की प्रक्रिया जारी है. पहले इसका मतलब था सैन्य बलों के इस्तेमाल का विरोध, अब इसका मतलब है आक्रामकता का विरोध और बढ़ते ख़तरों के प्रति आत्मरक्षा के नाम पर सेना के इस्तेमाल की स्वीकार्यता."

जापान एक बार फिर नए मोड़ पर खड़ा है. वो अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना कर रहा है जिसे उसके घिर जाने का ख़तरा पैदा हो गया है.

अड़ियल चीन अपनी सेना पर अरबों का खर्च कर रहा है. उसने दक्षिणी चीन सागर में अपनी दुस्साहसिक गतिविधियां बढ़ा दी हैं, ख़ासकर ताइवान के ख़िलाफ़, जो चीन के सुदूर दक्षिणी द्वीपों की ठीक दहलीज पर स्थित है.

इससे जापान की बेचैनी बढ़ गई है क्योंकि अगर ताइवान से जंग छिड़ी है तो अमेरिका और चीन के बीच युद्ध में न केवल जापान घसीटा जाएगा बल्कि गठबंधन का सहयोगी होने के नाते निशाने पर भी आ जाएगा.

जापान में अमेरिकी मिलिटरी बेस हैं और अमेरिका से बाहर उसकी फौजों का सबसे बड़ा जमावड़ा यहीं है.

उत्तर कोरिया हमेशा से ही ख़तरा बना हुआ है. पिछले सालों में उसकी परमाणु हथियारों की महत्वाकांक्षा बढ़ती गई है. उसने रिकॉर्ड संख्या में मिसाइल लांच की हैं और इनमें से अधिकांश जापान से होकर गुजरी हैं.

यूक्रेन में रूस के हमले और इसमें परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की संभावना को देखते हुए परमाणु युद्ध की आशंका बढ़ गई है. इस पर जी-7 में चर्चा होनी है.

रूस और चीन के बीच मज़बूत होते गठबंधन का ख़तरा भी मंडरा रहा है.

टोक्यो यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल सिक्योरिटी और पॉलिटिकल साइंस के प्रोफ़ेसर कज़ुटो सुज़ुकी के अनुसार, "जापान में ये आम धारणा है कि इस समय हम बहुत उद्दंड पड़ोसियों के साथ रह रहे हैं."

सेना के विस्तार की मांग अल्पसंख्यक कंज़रवेटिव कर रहे हैं, जो राष्ट्रीय स्वाभिमान फिर से हासिल करने का वादा करते हैं, लेकिन हाल ही में हुए सर्वे इस विचार के प्रति अधिक लोगों का झुकाव दिखाते हैं.

सरकारी सर्वे के अनुसार, अधिक से अधिक लोग अब एसडीएफ़ को बड़ा और ताक़तवर देखना चाहते हैं. 2018 में ऐसा मानने वालों की संख्या 29% थी जो पिछले साल 41.5% हो गई है.

जबकि अमेरिका के साथ जापान के रक्षा गठबंधन को लेकर 90% तक समर्थन है. जबकि 51% लोगों का मानना है कि आर्टिकल 9 के दूसरे पैराग्राफ को संशोधित करना चाहिए, जो जापान को सेना रखने से रोकता है.

यहां तक कि हिरोशिमा में भी कुछ लोग इस विचार के हैं.

हिरोशिमा में गेनबाकू गुंबद परमाणु हमले के बाद बची एकमात्र इमारत है.
इमेज कैप्शन, हिरोशिमा में गेनबाकू गुंबद परमाणु हमले के बाद बची एकमात्र इमारत है.

रक्षा गठबंधन को लेकर अमेरिका से दबाव

तनाका नाम की एक महिला ने कहा, "हर बार जब मैं उत्तर कोरिया के मिसाइल की ख़बर सुनती हूं, मैं डर जाती हूं. आज की दुनिया में ऐसे ढेरों मामले में है जब बिना वजह लोगों पर हमले हो जा रहे हैं...मैं सोचती हूं कि क्या अपनी सुरक्षा के लिए सैन्य खर्च बढ़ाया जा सकता है."

एलडीपी तो यही चाहती है. पार्टी का शुरू से ही संविधान संशोधन मुद्दा रहा है और उसने हमेशा ही सैन्यीकरण पर ज़ोर दिया है ख़ासकर अबे सरकार में.

हाल के सालों में सरकार पर अमेरिका के साथ रक्षा गठबंधन को मज़बूत करने के लिए वॉशिंगटन से भी दबाव बढ़ा है, ख़ासकर ट्रंप के कार्यकाल में.

प्रोफ़ेसर ब्राउन कहते हैं, "सरकार हमेशा से ही एसडीएफ़ की क्षमता बढ़ाना चाहती थी. अतीत में जनता इसमें रुकावट थी. अब ये रुकावट भी जाती रही."

किशिदा के नेतृत्व में जापान ने फ़ाइटर जेट, पुराने विमान वाहक पोत ख़रीदे हैं और सैकड़ों टामहॉक मिसाइलों के ऑर्डर दिए हैं. उन्होंने आने वाले सालों में सेना पर 43 ट्रिलियन येन (311 अरब डॉलर) खर्च करने की घोषणा की है.

साल 2027 तक जापान का सैन्य बजट जीडीपी का 2% हो जाएगा जो इस मामले में उसे दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा देश बना देगा.

वीडियो कैप्शन, जापान रॉकेट भेज रहा था, लिफ्टऑफ भी हुआ, लेकिन उसके बाद कहानी बदल गई

एलडीपी ने फिर से संविधान संशोधन पर जोर देना शुरू कर दिया है ताकि एसडीएफ़ के वजूद को स्पष्ट किया जाए और आत्मरक्षा के लिए जापान को सेना रखने की ओर ले जाए.

विडंबना है कि किशिदा एलडीपी में शांतिप्रिय शख़्सियत माने जाते हैं. हिरोशिमा से उनका पुराना नाता रहा है. परमाणु बम हमले में उनके रिश्तेदारों की जानें जा चुकी हैं और वो परमाणु बम मुक्त दुनिया के प्रवक्ता रहे हैं. उन्होंने तो इस पर एक किताब भी लिखी है.

जी-7 की बैठक के लिए हिरोशिमा को चुनना, सोचा समझा लगता है क्योंकि वो अपने इलाक़े में परमाणु प्रसार विरोधी रणनीति की महत्ता को जताना चाहते हैं.

किशिदा का तर्क है कि एशिया में शांति बनाए रखने के लिए जापान को अपने रक्षा क्षेत्र में आमूल चूल परिवर्तन लाना होगा.

लेकिन कुछ विश्लेषक मानते हैं कि उनकी छवि उनकी सरकार को सैन्यीकरण की ओर बढ़ने में राजनीतिक रूप से मददगार है.

प्रोफ़ेसर ब्राउन कहते हैं, "शांतिप्रिय छवि के कारण लोग उनके कदमों पर संदेह नहीं करते."

पूर्व पीएम शिंजो अबे और मौजूदा पीएम किशिदा ने सैन्यीकरण को आगे बढ़ाने की कोशिशें की हैं.
इमेज कैप्शन, पूर्व पीएम शिंजो अबे और मौजूदा पीएम किशिदा ने सैन्यीकरण को आगे बढ़ाने की कोशिशें की हैं.

ख़तरे की रेखा पार करना

लेकिन जापान के सैन्यीकरण के समर्थक भी परमाणु हथियार रखने की बात नहीं करते.

इसमें ताज्जुब नहीं है कि परमाणु हमले की शिकार दुनिया के एकमात्र देश में यह मुद्दा वर्जित बना हुआ है.

हालांकि पहले अबे और इसके बाद किशिदा के नेतृत्व में जापान ने रक्षा के क्षेत्र में जो कुछ किया है उसे कुछ लोग 'लाल रेखा को पार' करना मानते हैं.

देश के अंदर और चीन जैसे पड़ोसियों में भी इस बात को लेकर चिंता है कि अब आगे जापान कौन से टैबू तोड़ने वाला है.

इस समय एक बहस जारी है कि क्या जापान को घातक हथियार यूक्रेन भेजने चाहिए?

हाल ही में किशिदा ने वहां का दौरा किया था और वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की को मदद का वादा किया था. जापान पहले ही यूक्रेन को ग़ैर घातक उपकरण दे चुका है.

ये ताइवान के लिए भी एक टेस्ट केस होगा. पहले से ही इस पर बहस हो रही है कि चीन के साथ संघर्ष में जापान अमेरिका की कितनी मदद करेगा.

पिछले साल अबे ने जापान में अमेरिकी परमाणु हथियारों की तैनाती का प्रस्ताव जब रखा था तो हंगामा मच गया था. परमाणु साझेदारी के इस प्रस्ताव पर जनता का बहुत कम समर्थन है और किशिदा ने भी इसे ख़ारिज़ कर दिया था और कहा था कि ये जापान के पक्ष के विपरीत है.

एक्सपर्ट का कहना है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में जापान अपना मन बदल भी सकता है.

जैसे कि दक्षिण कोरिया ने चीन और रूस की ओर से बढ़ते ख़तरे या अगर रूस यूक्रेन में परमाणु हमला करता है, तो उसने परमाणु हथियार रखे हुए हैं.

वीडियो कैप्शन, जापान की राजनीति में पुरुषों को चुनौती दे रही ये महिला

जब भी जापान नई लाल रेखा पार करता है या इसकी कोशिश करता है, इसकी युद्ध बाद वाली पहचान और प्रशांत केंद्रित नीति के प्रति प्रतिबद्धता को लेकर बहस छिड़ जाती है.

कुछ लोग तर्क करते हैं कि सैन्यीकरण की कोशिश के बावजूद जापान अपने सिद्धांत से डिगा नहीं है.

पैसेफ़िज़्म पर एक्सपर्ट दाइसुके अकिमोतो का कहना है, "प्रशांत केंद्रित नीति सालों से अस्थिर रही है, लेकिन परमाणु विरोधी और युद्ध विरोधी भावना अभी भी ज़िंदा है."

टोक्यों में होसेई यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले डॉ. अकिमोतो के अनुसार, "जापान अपनी रक्षा नीति में जो बदलाव कर रहा है वो बदलते रणनीतिक माहौल की वजह से है."

अतीत को याद रखना ज़रूरी

हिरोशिमा आए एक स्टूडेंट सारा ओगुरा का कहना है, "जिस तरह सरकार काम कर रही है वो ग़लत है. वे इस तरह समझा रहे हैं जैसे सैन्य इस्तेमाल का दरवाजा खुलना स्वाभाविक है. इसी वजह से मुझे उनपर भरोसा नहीं होता."

परमाणु हथियार विरोधी एक्टिविस्ट युना ओकोजिमा का कहना है, "हालांकि सरकार कह रही है कि उसकी मंशा अभी जंग की नहीं है लेकिन ये ऐसा ही है कि वो वक़्त आने पर जंग में जाने की तैयारी कर रहे हैं."

कुछ लोगों का मानना है कि सैन्यीकरण की चाहत, जापान के अपने ग़लत कृत्यों को भूलने से पैदा हुई है.

परमाणु हथियार विरोधी एक्टिविस्ट युना ओकोजिमा
इमेज कैप्शन, परमाणु हथियार विरोधी एक्टिविस्ट युना ओकोजिमा

जापान के स्कूलों में अभी भी अनिवार्य 'शांति पाठ' पढ़ाया जाता है जिसमें प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध शामिल है, लेकिन आक्रमणकारी के रूप में जापान की भूमिका और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इसके द्वारा किए गए अत्याचार को अक्सर दबा दिया जाता है.

ग्रेजुएट स्टूडेंट मिसुज़ू केंडा का मानना है कि परमाणु हथियार मुद्दे की आड़ में जापान के नकारात्मक इतिहास को ढक दिया जाता है.

वो कहती हैं, "मेरा जन्म हिरोशिमा प्रीफ़ेक्चर में हुआ. किताबों में अधिकांश हिरोशिमा और नागासाकी के नज़रिए से पढ़ाई होती है कि हमने क्या क्या झेला, लेकिन दूसरी तरफ़ जब हम शांति के बारे में सोचते हैं, तो सोचना चाहिए कि हमने दूसरे देशों के साथ क्या किया था."

उनकी दोस्त ओकोतिमा भी सहमत दिखती हैं, "मुझे लगता है कि ये सबूत है कि जापानी सरकार इस इतिहास का सामना नहीं करना चाह रही. इसलिए वे इसे छोटे बच्चों को नहीं पढ़ाते."

वीडियो कैप्शन, नेताजी के हिटलर से मिलने और जापान जाने की कहानी. Vivechana

वो कहती हैं, "अगर हम अपने इतिहास को एक आक्रमणकारी के रूप में नहीं देखेंगे तो ये ग़लती दोहराने की संभावना अधिक है."

परमाणु बम से तबाह हो चुका हिरोशिमा आज बिल्कुल नया खड़ा है, पहाड़ों के बीच खूबसूरत वादी में. परमाणु हमले का कोई चिह्न नहीं बचा है सिवाय गेनबाकू गुंबद के.

चमचमाती नदी के पार पीस मेमोरियल पार्क में उन लोगों के लिए स्मारक बना है जो परमाणु हमले में मारे गए. एक पत्थर पर लिखा है, "सभी आत्माओं को यहां शांति से रहने दो, हम ये बुराई नहीं दोहराएंगे."

मिमाकी स्मारक को देखते हुए कहते हैं, "हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम अंत में गिराए गए क्योंकि युद्ध को हमने शुरू किया था. हिरोशिमा और नागासाकी जल कर राख हो गए और ग़लती की थी इम्पीरियल जापानी आर्मी ने."

"हमें दोबारा युद्ध में नहीं जाना चाहिए."

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