रूस-यूक्रेन युद्ध: रूस ने अपना रुख़ बदला या फिर मान ली नाकामी?

युक्रेन के ख़िलाफ़ लड़ाई में क्या रूसी सेना को अपनी योजनाओं में बदलाव करना पड़ रहा है? शायद यूक्रेन को लेकर रूस की महत्वकांक्षा भी थोड़ी कम हो जाए?

शायद ये बताना अभी जल्दबाज़ी होगी, लेकिन निश्चित तौर पर यूक्रेन में युद्ध को लेकर रूस के रुख में बदलाव ज़रूर आए हैं.

रूस के शीर्ष सैन्य अधिकारी सर्गेई रत्स्कॉय ने कहा, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन के ख़िलाफ़ जिस "विशेष सैन्य अभियान" की घोषणा की थी उसका "पहला चरण" लगभग पूरा हो गया है." रत्स्कॉय ने कहा कि अब रूसी सेना "डोनबास क्षेत्र को पूरी तरह आज़ाद कराने" पर अपना ध्यान केंद्रित करेगी.

इसका संभवतः ये अर्थ है कि अब देश के पूर्वी हिस्से में यूक्रेनी सरकार के अधीन आने वाले हिस्सों और रूस समर्थित अलगाववादी दोनेत्स्क और लुहांस्क के 'स्वायत्त गणराज्यों' को अलग करने वाली 'लाइन ऑफ़ कॉन्टेक्ट' को और पीछे धकेलने के लिए अधिक प्रयास किए जाएंगे.

यूक्रेन के अन्य हिस्सों में भी रूसी सेना की आगे बढ़ने की गति अब धीमी पड़ रही है. रूस की सेना को राजधानी कीएव से पीछे धकेल दिया गया है और कहा जा रहा है कि अब रूस के सैनिक डिफ़ेंसिव पोज़िशन यानी बचाव की स्थिति में आ रहे हैं ताकि वो कब्ज़े वाले अन्य क्षेत्र न हारें.

ये कहना शायद जल्दबाज़ी होगी कि रूस कीएव पर कब्ज़े के अपने इरादे से पीछे हट रहा है. लेकिन पश्चिमी मुल्कों के अधिकारियों का कहना है कि रूस को एख के बाद एक लगातार झटकों का सामना करना पड़ रहा है.

शुक्रवार को पश्चिमी देशों के अधिकारियों ने दावा किया कि रूस ने युद्ध में अपने एक और जनरल को खो दिया है और ये उसके सातवें वरिष्ठ सैन्य अधिकारी की मौत है. दावे के मुताबिक़, इससे उसकी कुछ टुकड़ियों का मनोबल टूट चुका है.

पश्चिमी देशों का मानना है कि जनरल सर्गेई रत्स्कॉय की घोषणा इस बात की तरफ इशारा है कि रूस ये मान रहा है कि उसकी युद्ध से पहले की उसकी महत्वकांक्षी रणनीति अब विफल हो चुकी है.

एक अधिकारी ने कहा, "रूस अब ये मान रहा है कि वो एक साथ कई मोर्चों पर अपने अभियान को आगे नहीं बढ़ा सकता है."

अधिकारियों ने कहा कि कम से कम 10 नए रूसी बटालियन टैक्टिकल ग्रुप बनाए जा रहे हैं और ये अब डोनबास की तरफ बढ़ रहे हैं.

पिछले महीने युद्ध शुरू होने से पहले ही, ये आशंका ज़ाहिर की गई थी कि रूस यूक्रेन की सबसे अच्छी सैन्य टुकड़ियों को घेरने लिए अपना पूरा ज़ोर लगा देगा. ये टुकड़ियां "लाइन ऑफ़ कॉन्टैक्ट" पर तैनात ज्वॉइंट फोर्सेज़ ऑपरेशन (जेएफ़ओ) का हिस्सा है.

पीछे हटने का मतलब पिछड़ना नहीं

रूस की रणनीति में बदलाव का एक मकसद शायद ये भी है कि वो दोनेत्स्क और लुहांस्क में तैनात अपने सैन्यबलों को ख़ारकीएव और इज़िम से दक्षिण की तरफ बढ़ रहे सैनिकों से जोड़ सके.

और अगर रूस आख़िर में अज़ोव सागर के पास मौजूद मारियुपोल बंदरगाह पर कब्ज़ा कर सका तो, अन्य सैन्य बलों को जेफ़ओ की घेराबंदी के लिए उत्तर की ओर भेजा जा सकता है.

इनमें से कुछ मकसद अभी भी रूस की पहुंच से बाहर लगते हैं. मारियुपोल की रक्षा में लगे यूक्रेनी सैनिक रूस को कड़ी टक्कर दे रहे हैं. इस क्षेत्र में बीते कई दिनों से भीषण लड़ाई जारी है और रूस युद्ध से पहले के अपने उस मकसद को पूरा नहीं कर पा रहा. वो क्राइमिया से डोनबास तक लैंड ब्रिज बनाना चाहता था और इसके लिए मारियुपोल पर कब्ज़ा अहम था.

लेकिन अगर रूस अब इस निष्कर्ष पर पहुंच गया है कि उसे एक समय में एक ही लक्ष्य हासिल करने के लिए अपनी पूरी कोशिश करनी चाहिए, तो संभव है कि वो अपने हमले बढ़ा दे और खासतौर पर हवाई हमले करने पर ज़ोर दे.

और पहले से अनुशासित और उत्साह से भरी यूक्रेनी सेना को रूस की ओर से बन रहे दबाव का सामना करने के लिए हरसंभव मदद की ज़रूरत होगी.

पश्चिमी देशों के एक अधिकारी कहते हैं, "मुझे उम्मीद है कि पश्चिमी देशों से हो रही हथियारों की आपूर्ति यूक्रेनी सेनाओं के लिए मददगार साबित होगी."

अगर आनेवाले दिनों में रूस का ध्यान डोनबास पर ही केंद्रित होता है, तो इसका ये मतलब नहीं है कि रूस ने अपने बड़े मकसद को पीछे छोड़ दिया है.

एक वरिष्ठ अमेरिकी रक्षा अधिकारी कहते हैं, "हमें नहीं लगता कि ये पूरे आक्रमण की रणनीति का पूनर्मूल्यांकन होगा. "

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