पाकिस्तान तालिबान से परेशान इमरान सरकार पहुँची अफ़ग़ान तालिबान के पास

इमरान ख़ान
प्रकाशित
पढ़ने का समय: 4 मिनट

पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के शासन को लेकर भले ही गर्मजोशी दिखाई हो लेकिन सत्ता बदलने के बाद से उसे एक फ़िक्र भी परेशान कर रही है.

पाकिस्तान के गृह मंत्री शेख रशीद अहमद ने सोमवार को इसका ज़िक्र करते हुए बताया कि उनकी सरकार इसे लेकर अफ़ग़ान तालिबान के संपर्क में है.

पाकिस्तान सरकार की चिंता 'तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान' यानी टीटीपी को लेकर है. टीटीपी पर पाकिस्तान में चरमपंथ की कई घटनाओं को अंजाम देने का आरोप है.

इस संगठन को पाकिस्तान तालिबान के तौर पर भी पहचाना जाता है और ये पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान के सरहदी इलाकों में सक्रिय है.

सरहदी इलाका

ये दावा भी किया जाता है कि टीटीपी के चरमपंथी पाकिस्तान में हमलों के लिए अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल करते हैं.

संयुक्त राष्ट्र की जुलाई में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक अफ़ग़ानिस्तान में तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान के छह हज़ार से ज़्यादा प्रशिक्षित लड़ाके हैं.

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टीटीपी के अफ़ग़ान तालिबान से गहरे रिश्ते बताए जाते हैं. अफ़ग़ानिस्तान की अमेरिका के समर्थन वाली पूर्व सरकार से अफ़ग़ान तालिबान के संघर्ष के दौरान टीटीपी ने उनका समर्थन और सहयोग किया.

शेख रशीद

क्यों बढ़ी चिंता?

पाकिस्तान मीडिया में आई रिपोर्टों के मुताबिक काबुल पर तालिबान के नियंत्रण स्थापित होने के बाद अफ़ग़ानिस्तान में 'तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान' के कई चरमपंथियों को रिहा कर दिया गया है.

पाकिस्तान के गृह मंत्री शेख रशीद अहमद ने बताया कि इमरान ख़ान सरकार ने इसे लेकर अफ़ग़ान तालिबान से संपर्क किया है और तालिबान ने भरोसा दिलाया है कि वो टीटीपी के चरमपंथियों को पाकिस्तान के ख़िलाफ़ अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन इस्तेमाल नहीं करने देंगे.

गृह मंत्री शेख रशीद अहमद ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया, "इस मामले से जुड़े (अफ़गानिस्तान के) अधिकारियों से कहा गया है कि जिन लोगों ने पाकिस्तान में आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दिया हैं, उन पर नियंत्रण रखा जाए. अफ़ग़ान तालिबान ने (हमें) भरोसा दिया है कि टीटीपी को किसी सूरत में अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन इस्तेमाल नहीं करने दी जाएगी. "

पाकिस्तान के गृह मंत्री का बयान आने के पहले मीडिया में आई रिपोर्टों में दावा किया गया था कि पाकिस्तान ने टीटीपी से जुडे 'मोस्ट वांटेड आतंकवादियों' की एक लिस्ट अफ़ग़ान तालिबान को सौंपी है. बताया जाता है कि इस लिस्ट में उन चरमपंथियों के नाम शामिल हैं, जो फिलहाल अफ़ग़ानिस्तान में सक्रिय हैं.

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'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' ने इस बारे में अपनी रिपोर्ट में बताया है कि अफ़ग़ान तालिबान के काबुल पर कब्ज़ा करने के बाद ये लिस्ट उन्हें सौंपी गई.

हिब्तुल्लाह अख़ुंदज़ादा

जांच आयोग

अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में पाकिस्तान के एक अधिकारी के हवाले से बताया, "हमने (अफ़ग़ान तालिबान के सामने) इस मुद्दे को उठाया है. हमने टीटीपी के अफ़ग़ानिस्तान से गतिविधियां चला रहे वांटेड आतंकवादियों की एक लिस्ट उन्हें दी है. " रिपोर्ट में इस अधिकारी के नाम की जानकारी नहीं दी गई है.

कुछ रिपोर्टों में ये भी दावा किया गया है कि अफ़ग़ान तालिबान के प्रमुख हिब्तुल्लाह अख़ुंदज़ादा ने तीन सदस्यीय आयोग बनाया है जो पाकिस्तान की शिकायत पर गौर करेगा और पता लगाएगा कि क्या टीटीपी सीमा के पार चरमपंथी हमलों के लिए अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल कर रहा है?

सांकेतिक चित्र

कौन हैं पाकिस्तान तालिबान?

तहरीक-ए-तालिबान यानी पाकिस्तान तालिबान की स्थापना दिसंबर 2007 में 13 चरमपंथी गुटों ने मिलकर की थी. टीटीपी का मक़सद पाकिस्तान में शरिया पर आधारित एक कट्टरपंथी इस्लामी शासन कायम करना है.

पाकिस्तान तालिबान का पाकिस्तान की सेना से टकराव बना रहता है. कुछ वक़्त पहले संगठन के प्रभाव वाले इलाक़े में पेट्रोलिंग कर रहे एक पुलिसकर्मी को बुरी तरह पीटने की ख़बर सामने आई थी.

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साल 2014 में पेशावर में एक आर्मी स्कूल पर हुई गोलीबारी में करीब 200 लोगों की जान चली गई थी जिनमें ज़्यादातर छात्र थे. इस घटना के लिए टीटीपी को ज़िम्मेदार बताया जाता है.

पाकिस्तान साल 2014 से टीटीपी के ठिकानों को ध्वस्त करता रहा है. लेकिन पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर मौजूद इलाक़ों में टीटीपी का ख़ासा प्रभाव है.

ये माना जाता है कि टीटीपी के ज़्यादातर सदस्य अफ़ग़ानिस्तान में हैं और वहीं से सीमापार हमलों की योजना बनाते हैं.

तालिबान लड़ाके

क्या है संभावना?

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की जुलाई की एक रिपोर्ट के मुताबिक अफ़गानिस्तान में टीटीपी के करीब छह हज़ार प्रशिक्षित लड़ाके हैं. अफ़ग़ान तालिबान के साथ भी उनके रिश्ते हैं. अफ़ग़ान तालिबान के अफ़ग़ानिस्तान की पूर्व सरकार के साथ संघर्ष में भी टीटीपी के लड़ाकों ने उनकी मदद की थी.

अफ़ग़ानिस्तान में जब तालिबान मजबूत हो रहे थे तब भी पाकिस्तान में टीटीपी को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे.

पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हारून रशीद ने जून में बीबीसी हिंदी की संवाददाता कमलेश मठेनी से बातचीत में कहा था कि इस मामले में पाकिस्तान की चिंता जायज़ है. ऐसे आसार बहुत कम हैं कि अफ़ग़ान तालिबान पूरी तरह से टीटीपी के ख़िलाफ़ हो जाएगा.

हारून रशीद के मुताबिक, "जब अफ़ग़ानिस्तान में पहले तालिबान सरकार थी तब पाकिस्तान तालिबान का वजूद नहीं था. ऐसे में अभी ये कहना मुश्किल होगा कि पाकिस्तान तालिबान के लिए उनका रवैया क्या होगा. ऐसा कोई ऑपरेशन नहीं दिखता कि अफ़ग़ान तालिबान पाकिस्तान तालिबान के ख़िलाफ़ लड़कर उनको ज़बरदस्ती रोकने की कोशिश करेंगे. दोनों की विचारधारा एक ही है और उनमें समानता भी है तो पाकिस्तान पर इसका दुष्प्रभाव पड़ना लाज़िमी है."

हालांकि, फिलहाल पाकिस्तान सरकार दावा कर रही है कि अफ़ग़ान तालिबान ने कहा है कि वो उनकी चिंता से वाकिफ हैं और टीटीपी को पाकिस्तान के ख़िलाफ़ अपनी ज़मीन का इस्तेमाल नहीं करने देंगे.

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