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चीन में प्रदूषण से हर साल 16 लाख मौतें
एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल चीन में वायु प्रदूषण से 16 लाख लोगों की मौत हो जाती है जो कि चीन में कुल मौतों का 17 प्रतिशत है.
बीजिंग और शहर से लगे हबेई में कोयला खनन और स्टील उत्पादन के कारण धुंध इतनी गहरी हो जाती है कि आकाश सलेटी दिखने लगता है और दिन और शाम के बीच फ़र्क ही समझ नहीं आता.
चीन के एक कोने से दूसरे कोने तक धुंध का बादल जैसे लोगों को ढक लेता है, जहां सांस लेना मुश्किल हो जाता है.
सड़कों पर लोग आपको चेहरे पर मास्क लगाए दिखेंगे. यहां आम लोगों को भी पता है कि पीएम 2.5 या 10 क्या होता है.
पीएम 2.5 यानी पार्टिकल का वो अंश जो इतना छोटा होता है जो फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं.
ओज़ोन प्रदूषण की समस्या
इसके अलावा एक और समस्या है ओज़ोन प्रदूषण.
ग्रीनपीस से जुड़ी एक वेबसाइट 'अनअर्थ्ड' के मुताबिक ज़मीन पर ओज़ोन के प्रदूषण के कारण साल 2016 में चीन में 70,000 लोगों की वक्त से पहले मौत हो गई.
अनअर्थ्ड के मुताबिक जहां ओज़ोन अल्ट्रावॉयलट रेडिएशन को रोककर पृथ्वी पर जीवन की सुरक्षा करती है वहीं, ज़मीन पर ओज़ोन का प्रतिशत बढ़ने से सांस संबंधी कई बीमारियां हो जाती हैं. ये वक्त से पहले मौत का कारण बनता है.
नाइट्रोजन ऑक्साइड और वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स के बीच सूरज की रोशनी के रहते केमिकल रिएक्शन के कारण ओज़ोन बनती है.
चीन में स्थानीय लोग बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में सरकार ने प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए कड़े कदम उठाए हैं. शहरों में आपको इलेक्ट्रिक कारें, टैक्सी और बस दौड़ती मिलेंगी.
शहरों मे रहने वाले बताते हैं कि प्रदूषण की मात्रा बढ़ने पर सरकार फ़ैक्ट्रियों को बंद करने में ज़रा सा भी संकोच नहीं दिखाती. कोयले पर निर्भर बिजली बनाने वाली फ़ैक्ट्रियों को बंद किया गया है.
घर-घर में प्यूरिफ़ायर
चीन की समाचार एजेंसी ज़िन्हुआ में पीकिंग यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ के हवाले से एक रिसर्च में कहा गया है कि साल 2013 और 2017 के बीच पीएम 2.5, पीएम 10, सल्फ़र डाई ऑक्साइड के औसत जमाव में क्रमश: 33.3 प्रतिशत, 27.8 प्रतिशत और 54.1 प्रतिशत तक की कमी आई है.
साल 2013 में चीन ने एअर पॉल्युशन एंड कंट्रोल ऐक्शन प्लान की शुरुआत की थी.
इंजीनियर जोहानस लाओसन सालों से इसी धुंध में रह रहे थे. जब उनके घर में एक बेटी ने जन्म लिया तब उन्होंने अपना पहला प्यूरिफ़ायर खरीदा.
प्लास्टिक से बने ये स्थानीय प्यूरिफ़ायर उन्हें पसंद नहीं आए और उन्होंने खुद एअर प्यूरिफ़ायर बनाने का निर्णय किया.
लाओसन कहते हैं, "कई बार प्रदूषण का स्तर इतना ज़्यादा होता था कि हम पूरे हफ़्ते अपनी बेटी के साथ घर के बाहर नहीं निकल पाते थे."
बीज़िंग में किराए पर लिए गए दो कमरे उनका वर्कशॉप कम ऑफ़िस हैं जहां वो खुद शुरुआत से अंत तक प्यूरिफ़ायर बनाकर बेचते हैं. पास ही उनकी छोटी बेटी सादे पन्ने पर लाइनें खींचकर किसी आकृति को जीवंत करने की कोशिश कर रही थी. मेज़ पर रखी एक सफ़ेद रंग की छोटी से मशीन कमरे में प्रदूणष के स्तर में होते हर सेकेंड के उतार-चढ़ाव को रजिस्टर कर रही थी.
जोहासन लाओसन कहते हैं, "हमने ऐसा प्यूरिफ़ायर बनाया जो 100 से 150 स्क्वेयर मीटर घर को साफ़ रखे. कमरों में हवा के बहाव को मैनेज करके हम कमरों का तापमान स्थिर रख सकते हैं. हमारे एअर प्यूरीफ़ायर में किसी और प्यूरिफ़ायर से ज़्यादा सेंसर्स हैं. इसके भीतर एक कंप्यूटर है जो प्यूरिफ़ायर को मैनेज कर रहा है."
हालत ये है कि बीजिंग के घरों, दफ़्तरों, स्कूलों, कॉलेजों, गाड़ियों के भीतर, हर जगह आपको एअर प्यूरिफ़ायर मिल जाएंगे.
लाओसन बताते हैं, "मुझे याद नहीं कि मैं किसी के घर गया हूँ और मुझे हवा साफ़ करने के लिए प्यूरिफ़ायर ना मिला हो. कुछ लोग पंखे तक में फ़िल्टर लगा लेते हैं ताकि हवा साफ़ रहे. कुछ ना करने के बजाय ये बेहतर है कि एक या दो कदम लिए जाएं."
दुनिया भर में जाती इन तस्वीरों और लोगों के स्वास्थ्य पर बढ़ते प्रभाव के कारण सरकार ने प्रदूषण से निपटने के लिए कड़े कदम उठाए हैं.
प्रदू्षण कम करने की कोशिश
लाओसन बताते हैं, "पिछले दो सालों में इलेक्ट्रिक कार, ट्रक और बसों की बाढ़ आ गई है. अगर प्रदूषण ज़्यादा होता है तो फैक्ट्रियों को बंद कर दिया जाता है. बिजली की गाड़ियों को चार्ज करने के लिए चार्जर आपको रेज़िडेंशयल सोसाइटीज़, शॉपिंग मॉल हर जगह मिल जाएंगे. ठंड में कोयला जलाने संबंधी नियम को भी सख़्ती से लागू किया जाता है."
कड़ाके की ठंड में कोयला जलाने को चीन में प्रदूषण का एक बड़ा कारण माना जाता है.
बच्चों पर प्रदूषण के बढ़ते प्रभाव के कारण एजुकेशन कंसल्टेंट क्रिस्टोफ़र डॉबिंग ने चीन में एक मास्क कंपनी की स्थापना की.
वो कहते हैं, "मैंने देखा कि बच्चों ने आसमान को नीले रंग के बजाय सलेटी रंग से रंगना शुरू कर दिया था."
क्रिस्टोफ़र बताते हैं, "जब हवा प्रदूषण का स्तर ऐंबर एलर्ट स्तर पर पहुंच जाता है तो बीज़िंग के निकट की फ़ैक्ट्रियों पर कुछ प्रतिबंध के अलावा सरकारी गाड़ियों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है, लाल स्तर के एलर्ट पर सड़कों पर ऑड ईवन नंबर प्लेट वाली गाड़ियां चलती हैं. बड़े शिखर सम्मेलनों के दौरान स्कूल और फ़ैक्ट्रियों को बंद कर दिया जाता है, सड़कों पर कारें नज़र नहीं आतीं, जिससे प्रदूषण कम हो जाता है."
लेकिन बिजली पर चलने वाली इन कारों का ईंधन कोयले को जला कर ही पैदा किया जाता है.
बीजिंग में भारतीय पत्रकार सैबल दासगुप्ता के मुताबिक, "आप शहरों में प्रदूषण कम करने के लिए बिजली की कारों का इस्तेमाल करते हैं लेकिन बिजली पैदा करने के लिए 65 प्रतिशत कोयले का इस्तेमाल करते हैं और चीन का कोयला बहुत ज़्यादा धुंआ पैदा करता है क्योंकि वो निचली गुणवत्ता का होता है. इसलिए चीन इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया से कोयला मंगाकर उसमें कोक मिलाकर धुंआ कम करने की कोशिश कर रहा है. चीन ने वॉशरीज़ भी लगाए हैं."
चीन में दुनिया की सबसे बड़ी सोलर पैनल इंडस्ट्री है, सबसे ज़्यादा हाइट्रोइलेक्ट्रिसिटी के डैम हैं, यहां बैटरी ऑपरेटड गाड़ियां चल रही हैं, चीनी कंपनियां बैटरी ऑपरेटड गाड़ियां बना रही हैं, जगह-जगह पर बैटरी रिचार्ज स्टेशन हैं, कोयले को साफ़ करने के लिए प्लांट डाले गए हैं लेकिन प्रदूषण से निजात पाने के लिए चीन को कोयले पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी और इस दूरी को तय करने में लंबा समय लगेगा.
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