यहाँ ज़िंदा है हाथ की कारीगरी

    • Author, प्रीति मान
    • पदनाम, फ़ोटो पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
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हथकरघा वस्त्र और हथकरघा बुनकर भारतीय सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग रहे हैं. भारत में कृषि के बाद हथकरघा एक महत्वपूर्ण लघु उद्योग के रूप में जाना जाता है.

मध्यप्रदेश के खरगोन ज़िले में नर्मदा नदी के किनारे बसा शहर महेश्वर, देवी अहिल्या बाई होल्कर की राजधानी के अलावा अपनी हथकरघा माहेश्वरी साड़ी उद्योग के लिए भी प्रसिद्ध है.

हथकरघा उद्योग (जिसमें कपड़ा हाथ से बुना जाता है) भारत के प्राचीन और समृद्ध उद्योगों में से एक है, लेकिन पावरलूम के आने से इस उद्योग को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा जिसका सीधा असर बुनाई करके आमदनी कमाने वाले बुनकर परिवारों पर पड़ा.

महेश्वर उन गिने-चुने हथकरघा उद्योगों में से है जहां अब तक पावरलूम की दस्तक नहीं हुई है, यहां आज भी घर-घर में हथकरघे पर साड़ी बुनते बुनकरों को देखा जा सकता है.

महेश्वर के रहने वाले अकील अंसारी एक हथकरघा कारीगर हैं. 2015 में अकील को अपनी बेहतरीन कारीगरी के लिए प्रधानमंत्री अवार्ड दिया गया. वो महेश्वर के पहले हथकरघा कारीगर हैं जिन्हें यह पुरस्कार मिला है.

यूं तो अकील एक बुनकर परिवार से आते हैं पर ये सफ़र अकील अंसारी के लिए आसान नहीं था. हालांकि साड़ी बनाना उनका पुश्तैनी काम था पर उन दिनों सरकारी योजनाओं की कमी की वजह से उन्होंने लंबे समय तक संघर्ष किया. बचपन में वो पतंग बनाकर और उसे बेचकर अपने परिवार की आर्थिक मदद करने की कोशिश करते थे.

आगे चलकर उन्होंने साड़ी बनाने के अपने पुश्तैनी काम को अपनाया. 1980 के बाद महेश्वर में सैली रिचर्ड होल्कर आईं जो होल्कर राज परिवार की बहू थीं और एक कुशल टेक्सटाइल डिज़ाइनर भी.

उन्होंने हथकरघा कारीगरों को इकट्ठा कर उनसे सीधे साड़ी ख़रीदना शुरू किया जिससे हथकरघा कारीगरों को बिचौलियों के अत्याचार से राहत मिली.

उस वक़्त अकील के घर में दो हथकरघे हुआ करते थे 1995 के बाद उन्होंने उन्हीं दो हथकरघों से अपना कारोबार शुरू किया और साड़ी बनाकर सरकारी हथकरघा कार्यालय में बेचीं. जल्द ही अकील को अहसास हुआ की इतनी मेहनत से बनी साड़ियों की जो कीमत उन्हें मिलनी चाहिए यह उससे कम है.

2003 में उनके यहां मुंबई से एक कारोबारी साड़ी खरीदने आए, उन्हें अकील की बनी साड़ियां बेहद पसंद आई और उन्होंने अकील को मुंबई बुलाया. तब से उन्होंने साड़ी और दुपट्टे बनाकर मुंबई में बेचना शुरू किया.

2006 में उनकी मुलाकात फिर से सैली होल्कर से हुई जिन्होंने उन्हें कुछ नामचीन फैशन डिज़ाइनरों के लिए साड़ी बनाने का काम दिया. वहां उन्होंने और महेश्वरी कारीगरों के साथ मिलकर माहेश्वरी साड़ी, दुपट्टा और टेपेस्ट्री बनाईं इससे महेश्वरी कारीगरों को काफ़ी आर्थिक मदद मिली.

धीरे-धीरे अकील ने ख़ुद नई डिज़ाइन की साड़ियां बनाना शुरू किया. आज वो अंतरराष्ट्रीय ख्याति के बुनकर के रूप में जाने जाते हैं और माहेश्वरी साड़ी उद्योग को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुँचाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं.

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