भाजपा का पीछा करेगा 'गुप्त हत्या' का भूत?

राज्य पार्टी प्रमुख सर्वानंद सोनोवाल घुसपैठ ख़त्म करने की बात कहते हैं.
इमेज कैप्शन, राज्य पार्टी प्रमुख सर्वानंद सोनोवाल घुसपैठ ख़त्म करने की बात कहते हैं.
    • Author, रविशंकर रवि
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

असम में चार और ग्यारह अप्रैल के बीच दो चरणों में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर भाजपा उत्साहित है.

भाजपा के उत्साहित होने की वजह है. उसने कांग्रेस विरोधी मतों का विभाजन रोकने का इंतज़ाम कर लिया है.

एजीपी यानी असम गण परिषद के साथ चुनावी गठबंधन से भाजपा कांग्रेस विरोधी मतों का विभाजन रोकेगी, लेकिन उसे अंदरूनी कलह का असर देखना होगा.

लेकिन एक बात साफ़ है कि मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित होने के बाद केंद्रीय मंत्री और असम प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सर्वानंद सोनोवाल का राजनीतिक क़द बढ़ गया है. वो भाजपा के सबसे चर्चित नेता बन गए हैं. सुबह से शाम तक उनके चारों तरफ भीड़ रहती है. टिकट चाहने वाले उन्हें घेरे रहते हैं.

पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंता की एजीपी पहले भी बीजेपी के साथ रह चुकी है.
इमेज कैप्शन, पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंता की एजीपी पहले भी बीजेपी के साथ रह चुकी है.

स्वभाव से विनम्र सर्वानंद कहते हैं कि जनता की कसौटी पर खरा उतरना है और असम को अवैध नागरिकों से मुक्त कराना उनकी पहली प्राथमिकता है.

असम गण परिषद और भाजपा के बीच चुनावी गठबंधन से असम की राजनीति में एक नया समीकरण बना है, क्योंकि आम धारणा यही है कि इस राजनीतिक पहल से कांग्रेस विरोधी मतों का विभाजन रुकेगा और इसका लाभ कांग्रेस विरोधी गठबंधन को होगा.

सत्ता में आने के लिए भाजपा ज्यादा से ज्यादा दलों और संगठनों को अपने साथ लाने का प्रयास कर रही है. ताकि 126 सदस्यीय विधानसभा में चौंसठ के आंकड़े के करीब पहुंचकर दिसपुर की सत्ता हासिल की जा सके. इसी रणनीति के तहत उसने हाग्रामा मोहिलारी नेतृत्व वाले बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ गठबंधन किया.

हाग्रामा के साथ आने से भाजपा को कम से कम पंद्रह सीटों पर बढ़त मिलने की उम्मीद है. जबकि उसे एजीपी से भी लगभग इतनी ही सीटें पाने का अनुमान है, जबकि भाजपा अपने बलबूते पर तीस-पैंतीस सीट मिलने की उम्मीद लगाए बैठी है.

इसलिए जनजातीय मतदाताओं का समर्थन पाने के लिए छह जनजातियों को एसटी का दर्जा देने के लिए उसने विशेष समिति का गठन कर दिया है. यानी भाजपा को लगता है कि बीपीएफ़ और एजीपी के साथ गठबंधन करने से वह सत्ता हासिल कर लेगी. इस नज़रिए से देखा जाए तो भाजपा का दिसपुर पर कब्ज़ा संभव है.

भाजपा अध्यक्ष और मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार सर्वानंद सोनोवाल का मानना है कि भाजपा अब एजीपी और बीपीएफ़ के साथ मिलकर सरकार बना सकती है. हालांकि वे पार्टी में विद्रोह की आशंका को देखते हुए कार्यकर्ताओं से एकजुट रहने की अपील भी कर रहे हैं.

गठबंधन से एजीपी अध्यक्ष अतुल बोरा भी संतुष्ट हैं. उन्होंने कहा कि असम को अवैध नागरिकों से मुक्त करने के लिए एजीपी-भाजपा गठबंधन की सरकार है. कांग्रेस अवैध घुसपैठियों को पनाह देती रही है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस विरोधी ताकतों का एकजुट होना समय की मांग है.

लेकिन एजीपी-भाजपा गठबंधन के दूसरे पहलू पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है. इस गठबंधन से भाजपा में अंदरुनी कलह तेज़ हो गई है. भाजपा ने एजीपी के लिए चौबीस सीटें छोड़ने की घोषणा की है. इस सूचना के साथ ही एजीपी के लिए छोड़ी गई सीटों पर विद्रोह की स्थिति पैदा हो गई है.

भाजपा कार्यकर्ता आंदोलन कर रहे हैं, विरोध कर रहे हैं और पार्टी छोड़ रहे हैं. यह भी संभव है कि उनमें से कुछ सीटों पर बाग़ी उम्मीदवार खड़े हो जाएं. इससे एजीपी के लिए परेशानी पैदा होगी. यानी कुल मिलाकर गठबंधन को क्षति होगी. यह भी कहा जा रहा है कि गठबंधन के बाद एजीपी के मत भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में जाते हैं, लेकिन भाजपा समर्थक शायद ही एजीपी उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करें.

शीर्ष स्तर पर भले ही सहमति बन गई हो और बिना किसी भारी गतिरोध के सीटों पर तालमेल हो गया, लेकिन चुनाव घोषित होने से ठीक पहले इस गठबंधन को ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ता और नेता स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि उन्होंने पार्टी का जनाधार तैयार करने के लिए काफी मेहनत की है.

भाजपा के अंदर एजीपी को दी जाने वाली चौबीस सीटों में विद्रोह की स्थिति पैदा हो गई है. जो लोग भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे, उन्हें गहरा झटका लगा है. उनमें से कई उम्मीदवार कांग्रेस के संपर्क में हैं. ऐसे में पंद्रह सीटों का नुकसान भी कांग्रेस के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है.

कुछ विश्लेषक तरुण कुमार गोगोई की हालत कमज़ोर बता रहे हैं.
इमेज कैप्शन, कुछ विश्लेषक तरुण कुमार गोगोई की हालत कमज़ोर बता रहे हैं.

एजीपी-भाजपा के साथ आते ही कांग्रेस ने 'गुप्त हत्या' का मुद्दा फिर से उछाल दिया है. जब केंद्र में वाजपेयी और असम में प्रफुल्ल कुमार महंत की सरकार थी, तब बड़ी संख्या में उल्फा उग्रवादियों के परिवार के लोगों की हत्या हुई थी. उसीके बाद कांग्रेस ने इसे सरकार के संरक्षण में गुप्त हत्या का नाम दिया था.

कांग्रेस ने गुप्त हत्या में शामिल होने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई का आश्वासन दिया था. उसी आरोप की वजह से एजीपी को भारी पराजय का सामना करना पड़ा था. मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का आरोप है कि गुप्त हत्या में एजीपी के साथ भाजपा भी शामिल थी. अब गोगोई का कहना है कि एजीपी-भाजपा का एकसाथ आने से साबित हो गया है कि गुप्त हत्या में ये दोनों दल शामिल थे.

बदरूद्दीन अजमल मुसलमानों के एक वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं.
इमेज कैप्शन, बदरूद्दीन अजमल मुसलमानों के एक वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं.

मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कहते हैं कि कांग्रेस किसी के साथ गठबंधन नहीं करेगी, लेकिन कुछ सीटों पर छोटे-छोटे दलों से मित्रता संभव है. कांग्रेस की 'अकेले चलो' की नीति से मौलाना बदरुद्दीन अजमल हताश हैं, क्योंकि अल्पसंख्यकों का रुझान फिर से कांग्रेस की तरफ जा रहा है. कुल मिलाकर इस चुनाव में कांग्रेस के ख़िलाफ़ भाजपा, एजीपी और बीपीएफ़ एकजुट हो चुकी है और यह चुनाव दिलचस्प हो गया है.

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