'अछूतों का अलग वर्ग, हिंदू धर्म पर कलंक'

महात्मा गांधी
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30 जनवरी को गांधीजी की हत्या हुई थी. उनकी मौत के बाद भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में आज़ादी के बाद चल रहे सांप्रदायिक दंगे थम गए थे.

आज़ादी के 69 साल बाद आज भी मुसलमानों और दलितों के बारे में गांधी के शब्द प्रासंगिक बने हुए हैं.

यहां पेश हैं समय-समय पर प्रकट किए गए इन दो समुदायों को लेकर महात्मा गांधी के विचार. ये विचार <link type="page"><caption> संपूर्ण गांधी वाड़्मय</caption><url href="https://www.gandhiheritageportal.org/" platform="highweb"/></link> में प्रकाशित हैं.

महात्मा गांधी

दुख की बात तो है, लेकिन अभी दो-चार दिन तक मुझे पूछना ही पड़ेगा कि कुरान की आयत पढ़ने के बारे में किसी की तरफ से शिकायत तो न होगी. अगर होगी तो उसमें न आपका फ़ायदा है, न धर्म का. जैसे अनेक नाम होने पर भी ईश्वर एक ही है, वैसे ही अनेक नाम होते हुए धर्म एक ही है, क्योंकि सारे धर्म ईश्वर से आए हैं. जो धर्म ईश्वर का नहीं है, वह शैतान का है और वह किसी काम का नहीं हो सकता. इसलिए आप समझ लें कि जैसा तीन दिन से होता रहा है वैसा ही चलेगा तो धर्म का नाश हो जाएगा.

अगर मैं हिंदू हूं तो कुरान क्यों नहीं पढ़ सकता, 'ज़ेंद अवेस्ता' क्यों नहीं पढ़ सकता? और हिंदू की प्रार्थना में भी तो भेद कम नहीं हैं. कोई कहेगा, वेद नहीं उपनिषद् कहो, उपनिषद् नहीं 'गीता' कहो, 'यजुर्वेद' नहीं 'अथर्ववेद' कहो. यानी सभी अपने-अपने ढंग की प्रार्थना करने के हकदार हैं. अगर आप मुझे रोकना चाहें तो मैं आज भी खुद हार मानकर आपको जिताने को तैयार हूं. अगर आपमें से कोई चाहें तो मुझे वह ज़हर का प्याला दे सकते हैं. कोई देगा तो मैं उसे खुशी-खुशी पीना चाहूंगा और आप भी उसे सहन कीजिए. आपको पीना नहीं है, पर आप उसके साक्षी बनें. आप गुस्सा न करें. और अपने दिल में समझें कि यह बुड्ढा जो गम खा रहा है वह ठीक ही कर रहा है.

प्रार्थना सभा में आते ही गांधीजी ने सबसे पहले श्रीमती उमा देवी के बारे में पूछा कि क्या वे आई हैं? वे वहां थी. बापूजी के कहने पर उन्हें मंच पर उनके पास बैठाया गया. श्रीमती विभावरी बाई देशपांडे को भी गांधीजी ने अपने पास बुलाया और कहा कि इन दोनों बहनों ने 'कुरान-शरीफ' की आयतें पढ़ने का विरोध किया है. बीस आदमियों के दस्तख़त वाले उस पत्र का जिसमें लिखा था कि दो-एक आदमियों के विरोध करने पर सारी प्रार्थना रोकी नहीं जानी चाहिए, उल्लेख करते हुए गांधीजी ने कहा:

ऐसा कहने वाले 20 ही आदमी थोड़े ही हैं! मैं तो समझता हूं कि आप सब लोग जो विरोध नहीं करते और खामोशी के साथ रोज यहां बैठते हैं उन सभी के मन की बात यही है, जो इन बीस आदमियों के दस्तखत वाली चिट्ठी में लिखी हुई है.

इस चिट्टी में जो लिखा है, उसमें हिंदू-धर्म का ज्ञान नहीं है, कोरा अज्ञान भरा है. इस तरह धर्म को बचाने की जो चेष्टा की है वह वास्तव में धर्म के पतन की चेष्टा है. मैं सभी हिंदू और सभी सिख भाइयों से कहना चाहता हूं कि वे ऐसे गलत रास्ते को न अपनाएं. मैं एक-एक करके इस बहन के प्रश्नों का उत्तर दूंगा.

1. मंदिर में कुरान पढ़ने से वह अपवित्र हो जाता है, यह कहना ठीक नहीं है. मंदिर में ईश्वर की स्तुति करना अधर्म कैसे हो सकता है? क्या 'गीता' का अनुवाद कोई अरबी में सुनाए तो वह अधर्म हो जाएगा? ऐसा कोई कहता है तो वह अज्ञानी है. सीमाप्रांत में एक नियम बना था कि 'कुरान' का तर्ज़ुमा नहीं किया जा सकता, किंतु वहां अब डॉक्टर खानसाहब प्रधानमंत्री हैं, जो समझदार हैं. उन्होंने कहा कि कुरान का तर्ज़ुमा करने से तो उसका फैलाव होगा. उसे ज्यादा लोग पढेंगे और समझेंगे.

2. अगर आप कहें कि मुसलमानों ने पाप किया है, तो हिंदुओं ने कौन सा कम पाप किया है? बिहार में जो हिंदुओं ने किया वह आप लोगों को जानना चाहिए. वहां उन्होंने औरतों को मार डाला, बच्चों को मार डाला, उनके मकान जला दिए और उन्हें अपने घरों से भगा दिया. इस पर से अगर कोई मुसलमान आए और कहे कि भगवद्गीता पढ़ने वालों ने पाप किया है तो वह कितनी ग़लत बात होगी.

अछूतों का एक जुदा वर्ग बना देना हिंदू धर्म के माथे पर कलंक है. जात-पात एक बंधन है, पाप नहीं. अछूतपन तो पाप है, सख्त जुर्म है, और अगर हिंदू धर्म इस बड़े सांप को समय रहते नहीं मार डालेगा, तो वह उसको खा जाएगा. अछूतों को अब हिंदू धर्म के बाहर हरगिज न समझना चाहिए. उनके धंधे के मुताबिक वे जिस वर्ण के लायक हों, उसी वर्ण का उन्हें समझना चाहिए.

वर्ण की मेरी की हुई व्याख्या या तारीफ के हिसाब से तो आज हिंदू धर्म में वर्ण-धर्म का अमल होता ही नहीं. ब्राह्मण नाम रखने वाले विद्या पढ़ाना छोड़ बैठे हैं. वे और-और धंधे करने लगे हैं. यही बात थोड़ी-बहुत दूसरे वर्णों के बारे में भी सच है. असल में विदेशी हुकूमत के नीचे होने के कारण हम सब गुलाम है और इस तरह पश्चिमवालों की निगाह में शूद्र से भी हल्के अछूत हैं.

ईश्वर यह अत्याचार क्यों चलने देता है? रावण राक्षस था, पर यह अस्पृश्यता रूपी राक्षसी तो रावण से भी भयंकर है. और इस राक्षसी की धर्म के नाम पर जब हम पूजा करते हैं, तब तो हमारा पाप और भी बढ़ जाता है. इससे हब्शियों की गुलामी भी कहीं अच्छी है. अगर इसे धर्म कहें तो ऐसे धर्म से मुझे घृणा होती है. यह हिंदू धर्म हो ही नहीं सकता. मैंने तो हिंदू धर्म से ही ईसाई धर्म और इस्लाम का आदर करना सीखा है. फिर यह पाप हिंदू धर्म का अंग कैसे हो सकता है? पर क्या किया जाए?

इस पाखंड और अज्ञान के ख़िलाफ़ अगर जरूरत पड़े तो मैं अकेला लड़ूंगा और उसका नाम जपते हुए मरूंगा. शायद ऐसा भी हो कि मैं किसी दिन पागल हो जाऊं और कहने लगूं कि मैंने अस्पृश्यता संबंधी विचारों में भूल की. अस्पृश्यता को हिंदू धर्म का पाप कहकर मैंने पाप किया, तो आप मानना कि मैं डर गया हूं, सामना नहीं कर पाया और हारकर अपने विचार बदल रहा हूं. उस दशा में आप मानना कि मैं बेहोशी में क्या-कुछ बक रहा हूं.

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