फ़िलहाल मुख्य अतिथि बनकर न जाएं लालू के बेटे

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    • Author, उत्तम सेनगुप्ता
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

बिहार में नीतीश सरकार को दो महीने होने जा रहे हैं और इस नई सरकार में जिन दो मंत्रियों पर नज़रें सबसे ज़्यादा हैं वे हैं लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी (26) और तेजप्रताप यादव (27).

26 वर्षीय तेजस्वी भारत के सबसे युवा उपमुख्यमंत्री भी हैं, जिन्हें खुद को अनुभवहीन होने वालों को करारा जवाब देने के लिए भी जाना जा रहा है कि जिल्द देखकर किताब के बारे में राय नहीं बनानी चाहिए.

इस चतुर जवाब से अंदाज़ा लगता है कि उनका दिमाग़ तेज़ है जिसकी लोगों को उम्मीद नहीं थी. लग रहा है कि ज़्यादातर राजनीतिक पर्यवेक्षक सांस रोके इंतज़ार कर रहे हैं दोनों भाई अपनी बातों या हरकतों से सरकार को शर्मिंदा करने वाली कोई चूक करें.

नीतीश कुमार

भारत के संविधान में उपमुख्यमंत्री या उपप्रधानमंत्री के पद की कोई चर्चा नहीं है. यह पद केवल राजनीतिक ज़रूरत को ध्यान में रखकर ज़्यादा राजनीतिक हैसियत पाने के लिए बनाया गया है.

इसलिए जब पूर्व क्रिकेटर (या कहें असफ़ल क्रिकेटर?) तेजस्वी यादव 26 साल की उम्र में 20 नवंबर को उपमुख्यमंत्री बने, तो इससे उस समझौते का राजनैतिक संकेत मिला जो जेडीयू और आरजेडी के बीच हुआ था.

आरजेडी और जेडीयू ने विधानसभा चुनावों में बराबर सीटों पर चुनाव लड़ा था. इसमें आरजेडी को जेडीयू के मुक़ाबले ज़्यादा सफ़लता मिली और वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी.

हालांकि चुनाव पूर्व गठबंधन में आमतौर पर पारंपरिक रूप से सबसे बड़ी पार्टी का नेता ही मुख्यमंत्री पद की शपथ लेता है लेकिन यहां पहले से तय नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने. बदले में आरजेडी को उपमुख्यमंत्री का पद मिला.

लालू प्रसाद यादव ने ही फ़ैसला लिया था कि पार्टी का कोई और बड़ा नेता नहीं, बल्कि उनका बेटा ही विधायक दल का नेता और उपमुख्यमंत्री बनेगा.

जब मंत्रालयों के बंटवारे का समय आया तो फिर राजनीतिक मोलभाव की स्थिति बनी. ज़ाहिरन मंत्रालयों के बंटवारे के लिए भी कोई योग्यता तय नहीं. फ़िर भी ज़्यादा अहम मंत्रालय पारंपरिक रूप से वरिष्ठ मंत्रियों को दिए जाते हैं.

लेकिन इस बार बिहार में तेजस्वी यादव को सड़क, भवन निर्माण, पीडब्लूडी, और पिछड़ा कल्याण जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय दिए गए. जबकि उनके बड़े भाई तेज प्रताप यादव को स्वास्थ्य, जल संसाधन, वन और पर्यावरण विभाग सौंपे गए.

नीतीश कुमार ने गृह मंत्रालय अपने पास रखा जबकि अति महत्वपूर्ण वित्त मंत्रालय आरजेडी के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीक़ी को मिला.

लालू, राबड़ी देवी
इमेज कैप्शन, माना जाता है कि राबड़ी देवी के मुख्यमंत्रित्व काल में फ़ैसले लालू प्रसाद यादव ही लेते थे.

यह दलील दी जाती रही है कि सचिव और वरिष्ठ नौकरशाह ही वास्तव में विभाग चलाते हैं. इसलिए मंत्रियों की योग्यता या अनुभव से काम पर ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता.

इसलिए आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव के भरोसेमंद दो आईएएस अधिकारियों को दोनों भाइयों को मिले विभागों की ज़िम्मेदारी सौंपी गई.

संकेत यह है कि मूल रूप से कमान आरजेडी प्रमुख के हाथ में ही है जैसा उन्होंने राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाने के समय किया था. इस दौरान दोनों ही भाइयों के पास सीखने और ज़रूरी अनुभव हासिल करने का अवसर है.

हो सकता है कि ये सबसे अच्छी व्यवस्था न हो और जनहित में भी न हो. सामान्य समझ तो यही कहती है कि मंत्रियों को विभाग विषय की उनकी जानकारी, दूरदृष्टि और जुनून देखकर दिए जाते हैं.

लेकिन इस बात के कोई सबूत नहीं जिनसे यह पता चले कि ये दोनों भाई उन विभागों में विशेष रुचि ले रहे हैं जिनकी ज़िम्मेदारी उन्हें सौंपी गई है.

नीतीश कुमार, तेज प्रताप यादव

न दोनों को जो काम दिए गए हैं, उसके लिए उनके पास कोई विशेष योग्यता या अनुभव है.

लेकिन ईमानदारी की बात तो यह है कि ऐसे सवाल बिहार या केंद्र के दूसरे मंत्रियों के मामले में भी उठाए जा सकते हैं. यह बड़ा सवाल है कि जब कई राज्य पंचायत चुनाव के लिए न्यूनतम योग्यता निर्धारित कर रहे हैं, तो मंत्रियों के लिए भी कुछ योग्यता और अनुभव की ज़रूरत होनी चाहिए.

अब तक हमारे पास ऐसा कोई पैमाना भी नहीं है कि हम मंत्रियों के कामकाज का आकलन कर सकें. आदर्श रूप से मंत्रियों का काम विचार, योजना या परिकल्पना का होता है.

इस मामले में राजीव गांधी और उनके मानव संसाधन विकास मंत्री नरसिम्हा राव का नाम लिया जा सकता है, जिन्हें नवोदय विद्यालय की अवधारणा का श्रेय दिया जा सकता है. ये आवासीय विद्यालय की पूरी श्रृंखला है, जिसे ग्रामीण इलाक़ों के प्रतिभाशाली बच्चों के लिए खोला गया है.

तेज प्रताप यादव

लेकिन मीडिया आमतौर पर किसी मंत्री को उसकी सार्वजनिक छवि या जनता के बीच उसके व्यवहार से आंकता है.

कोई मंत्री कैसा वक्ता है और अपने अधिकारियों, कर्मचारियों या सहयोगियों के साथ उसका संबंध कैसा है. हम अक्सर मंत्रियों को कभी-कभार होने वाली घटनाओं के वक़्त भी आंकते हैं- जैसे रेल हादसा, पुल गिरना या फिर मिड डे मिल में छिपकली का मिलना.

या फिर हम मंत्रियों को उनके किए वादों और सपने बेच पाने की उनकी क्षमता के आधार पर भी आंकते हैं.

हालांकि अभी से बिहार में दोनों भाइयों के प्रदर्शन को आंकना ज़ल्दबाज़ी होगी. किसी भी तरह का दर्जा तय करने के लिए एक महीना काफ़ी कम वक़्त है. बहरहाल दोनों भाई अभी चकाचौंध से दूर हैं और सार्वजनिक रूप से बोलने से भी बच रहे हैं.

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शायद उन्होंने वो पुरानी कहावत सुनी है कि मुँह खोलकर अटकलें ख़त्म करने से अच्छा है कि दूसरों को यह सोचने दो आप किसी काम के नहीं. वैसे अब तक दोनों ने संभलकर सही बयान भी दिए हैं. सरकार कोई भी भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करेगी या डॉक्टरों को स्वास्थ्य केंद्रों में जाना ही होगा, जैसी बातें करना हमेशा सुरक्षित होता है.

दोनों ही भाइयों के लिए अपने आलोचकों को ग़लत साबित करना अव्यवहारिक है. दोनों के लिए अच्छा होगा कि अगले कुछ महीने तक जानकारों और लोगों की बात सुनें, विशेष मुद्दों पर कार्यशालाएं करें और ऐसी योजनाएं बनाएं जिन्हें वो पूरा कर सकते हैं.

उनके लिए छोटे-मोटे कार्यक्रमों का उद्घाटन या उनमें मुख्य अतिथि बनकर जाने से बचने की सलाह भी कारगर होगी.

लालू, तेजस्वी, तेज प्रताप

लालू प्रसाद यादव के बेटे होने की बदौलत चूंकि वह चुनाव जीत चुके हैं और मंत्री भी बन चुके हैं. तो अब उन्हें बिहार की जनता, अपने परिवार और सबसे बढ़कर खुद को साबित करना होगा और अपने लिए एक जगह बनानी होगी. अगर वो नाकाम होते हैं तो इसके लिए वो सिर्फ़ खुद को दोष दे सकते हैं.

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