बंदरों के मुंह लग गया 'धान का कटोरा'

    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

दूबर पर दो आषाढ़, कहावत का मतलब समझना हो तो सूखे की मार झेल रहे मुंगेली ज़िले के अचानकमार गांव की फूल बाई से पूछ लीजिए.

अपने धान के खेतों की ओर इशारा करती हुई फूलबाई कहती हैं, "बारिश नहीं होने के कारण इस बार धान की फ़सल बर्बाद हो गई, जो रही सही फ़सल थी, उसे बचाने की लाख कोशिशों के बाद भी बंदर खा जा रहे हैं."

फूलबाई और उनके जैसे खेती-किसानी करने वालों के माथे पर पड़ने वाला बल, अब एक स्थाई भाव बन गया है. इलाक़े में इस बार बारिश नहीं हुई.

गांव के लोग बताते हैं कि ऐसा सूखा कभी नहीं देखा. किसी तरह धान की थोड़ी बहुत फ़सल उगी भी तो अब वह बंदरों के भेंट चढ़ रही है.

फूलबाई

अचानकमार के सरपंच गया राम दोनों हाथों से अभिनय करते हुए बताते हैं, "सैकड़ों की संख्या में बंदर धान के खेतों में आ रहे हैं और दोनों हाथों से धान की बालियों को समेट कर खा जा रहे हैं. लोग दिन-रात खेतों की रखवाली कर रहे हैं लेकिन बंदरों से धान की फ़सल बचाना मुश्किल हो रहा है."

धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में हज़ारों बंदर अब अलग-अलग गांवों और छोटे शहरों में स्थाई रुप से बस गए हैं.

बंदरों के खपरैल वाले मकानों की छतों को तोड़ना और खेती को नुक़सान पहुंचाना एक आम बात है.

गया राम

यही कारण है कि राज्य के कई हिस्सों में किसानों ने मूंगफली और दलहन की फ़सलें उगाना ही बंद कर दिया है.

लेकिन धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में अब बंदरों का धान पर हमला धान के लिए भी मुश्किल का सबब बन सकता है.

मूल रूप से बंदरों पर शोध करने वाले वन्यजीव विशेषज्ञ डॉक्टर प्रबल सरकार का कहना है कि धान की फ़सल को अगर बंदर निशाना बना रहे हैं तो इसका मतलब साफ़ है कि जंगल में इस बार उनके लिए भोजन की कमी हो गई है.

बंदर

प्रबल कहते हैं, "बंदर अब अगर धान खाने लगे हैं तो इसे बंदरों के स्वभाव में आए एक परिवर्तन की तरह देखा जाना चाहिए. संकट ये है कि अगर बंदरों को इस बार धान की लत लग गई है तो वे पोषक, स्वादिष्ट और आसानी से उपलब्ध होने वाले धान की फ़सल के लिए अगली बार और बड़ी संख्या में पहुंचेंगे."

मुंगेली ज़िले के एक वन अधिकारी मानते हैं कि इस बार बारिश नहीं होने के कारण जंगल के इलाक़े में खाने-पीने की समस्या हो गई है.

लेकिन वे छूटते ही कहते हैं, "असल में इस पर एक विस्तृत कार्ययोजना बनाए जाने की ज़रूरत है. क्योंकि बंदरों की समस्या केवल मुंगेली ज़िले भर की नहीं है और इस बार तो धान ख़तरे में है."

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