ये हैं 'लॉयंस क्वीन ऑफ़ इंडिया'

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भारत के गुजरात में स्थित गीर अभयारण्य में एशियाई शेरों को बचाने की क़वायद में महिला वन सुरक्षाकर्मियों का एक दल मुस्तैदी से तैनात है.

पूरे दिन ये सुरक्षाकर्मी सिर्फ़ इन शेरों की सुरक्षा पर ध्यान देती है. गीर अभयारण्य के दौरे में बीबीसी संवाददाता गीता पांडे ने इनमें से कुछ महिलाओं से मुलाक़ात की.

गीर अभयारण्य में 2007 में वन सुरक्षाकर्मियों की महिला इकाई की स्थापना की गई थी.

गुजरात के उस समय के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गीर में महिलाओं के लिए 33 फ़ीसदी आरक्षण का आदेश दिया था.

2007 में वन विभाग की ओर से चुनी गई महिलाओं के पहले बैच में रासिला वाधेर शामिल हैं.

उनका कहना है, "उस वक़्त मैं वन विभाग, जानवरों या गीर के बारे में कुछ नहीं जानती थी."

2007 में जब उनको गीर में होने वाली नियुक्तियों के बारे में पता चला तो वो अपने भाई को लेकर पहुंच गई.

वाधेर को अन्य महिला वन सुरक्षाकर्मियों के साथ डिस्कवरी चैनल की सिरीज़ 'द लायन क्वीन्स ऑफ़ इंडिया' में दिखाया गया है.

वाधेर की पिछले साल शादी हुई है. वो बताती है कि उन्होंने अपने पति को शादी से पहले आगाह किया था.

उन्होंने अपने होने वाले पति से कहा, "मेरा यह काम चौबीस घंटे का है. मुझे भोर के तीन बजे भी बुलाया जा सकता है. और मुझे मर्दों के साथ काम करना होगा."

वो बताती है कि मेरे पति इससे सहमत थे. वो समझते हैं और कोई समस्या नहीं है.

दर्शना कगादा आठ बहनों वाले परिवार से आती है. उनका कोई भाई नहीं है.

वो बताती हैं, "मैं एक राजपूत परिवार से आती हूं जो कि रूढ़िवादी है. हमारे परिवार में महिलाओं और लड़कियों को कमतर आंका जाता है. हमें सिर्फ़ शादी करके परिवार की देखभाल करने के लायक समझा जाता है और कोई लड़कियों के करियर के बारे में नहीं सोचता."

मेरे पिता की सोच भी ऐसी ही थी.

वो बताती हैं, "मैंने 2011 में अपनी 12वीं की पढ़ाई ख़त्म की थी. मुझे उस वक़्त वन विभाग में होने वाली नियुक्ति के बारे में पता चला तो मैं अपनी बहन के घर पहुंच गई और उसके पति से परीक्षा दिलवाने ले जाने को कहा.

आज कगादा गीर में तैनात उन 48 महिला सुरक्षाकर्मियों में से एक है जो शेरों और तेंदुओं को बचा रही हैं.

गीता रतादीया हमेशा से ही वन सुरक्षाकर्मी बनना चाहती थीं.

वो कहती हैं, "मेरा जन्म गीर में हुआ है. मेरे दादा और मेरे पिता दोनों गीर में वन सुरक्षाकर्मी के रूप में काम करते थे."

वाधेर और कगादा ने गीर आने से पहले कभी शेरों को नहीं देखा था लेकिन रतादीया का चार साल की उम्र में ही शेरों और तेंदुओं से पाला पड़ गया था.

वो हंसते हुए बताती है, "मेरे पिता अक्सर मुझे अपने साथ जंगल ले आते थे. एक दिन मैंने उन्हें शेरों के नज़दीक देखा और डरकर चिल्लाने लगी. मुझे लगा कि शेर मेरे पिता पर हमला कर देंगे."

इसके बाद भी उन्होंने अपने पिता के साथ जंगल जाना नहीं छोड़ा. वो बताती है कि धीरे-धीरे उनका डर भी जाता रहा.

छह सालों से वन सुरक्षाकर्मी के रूप में काम करते हुए रतादीया कई बचाव कार्यों में शामिल रही हैं और राहत केंद्र पर शेरों की देखभाल की है.

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