फ़रीदा ख़ानम का वो ‘हाय’, जो रूह से आता था

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

जब 70 के दशक में फ़रीदा ख़ानम ने 'आज जाने की ज़िद न करो' को पहली बार गाया, तो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के संगीत प्रेमी मंत्रमुग्ध रह गए.

लेकिन आश्चर्य इस बात पर हुआ कि फ़रीदा ख़ानम का नाम तो सबकी ज़ुबान पर चढ़ गय़ा लेकिन इसके रचयिता फ़ैयाज़ हाशमी को लगभग भुला दिया गया.

भारत और पाकिस्तान की कला और संस्कृति पर ख़ासा शोध करने वाले प्राण नेविल कहते हैं, "फ़ैयाज़ हाशमी मेरी नज़रों में भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे महान गीतकार कवियों में से एक हैं. लेकिन अफ़सोस ये होता है कि न तो भारत में उनकी क़दर हुई और न ही पाकिस्तान में. दोनों ही मुल्कों में उन्हें भुला दिया गया."

फ़ैयाज़ हाशमी
इमेज कैप्शन, आज जाने की ज़िद न करो ग़ज़ल फ़ैयाज़ हाशमी ने लिखी है.

प्राण कहते हैं, "चौदह साल की उम्र में उन्होंने ग़ज़ल लिखी, जिसे कमला झरिया ने गाया..."

"मस्तों के जो उसूल हैं उनको निभा के पी

कल के लिए तू एक बूंद न बचा के पी

फ़ैयाज तू नया है अभी बात मान ले

कड़वी बहुत शराब है, पानी मिला के पी."

वो बताते हैं, "उन्होंने आगे चल कर जो लिखा, तस्वीर तेरी मेरा दिल बहला न सकेगी…..जिसने तलत महमूद जैसे गायक का करियर लॉन्च किया वह साधारण कवि तो नहीं ही हो सकता है."

प्राण नेविल कहते हैं, "पिछले साल मैंने कुंदनलाल सहगल की याद में एक प्रोग्राम किया था. मशहूर ग़ज़ल गायिका राधिका चोपड़ा गा रही थीं. एकदम से लोग कहने लगे कि आप जाने की ज़िद न करो सुनाइए."

"मैंने माइक ले कर कहा कि आज सहगल का प्रोग्राम है लेकिन मैं फिर भी राधिका को बोलूंगा, अगर आप में से कोई शख़्स ये बता दे कि ये गीत लिखा किसने था. वहाँ मौजूद तीन चार सौ लोगों में से एक भी शक्स ये नहीं बता पाया कि इस गीत के लेखक कौन थे. गीत याद है लेकिन गीत लिखने वाला याद नहीं है."

प्राण नेविल
इमेज कैप्शन, प्राण नेविल बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ.

फ़ैयाज़ हाशमी वही शख़्स थे जिन्होंने पंकज मलिक की गाई मशहूर ग़ज़ल, 'ये मौसम, ये हंसना हंसाना' लिखी थी. उनके ही लिखे गीत 'तस्वीर तेरी दिल मेरा बहला न सकेगी', ने तलत महमूद को पहचान दी.

फ़रीदा ख़ानम से भी पहले इस गीत को पाकिस्तान के मशहूर गायक हबीब वली मोहम्मद ने पाकिस्तानी फ़िल्म बादल और बिजली के लिए गाया था.

फ़रीदा ख़ानम याद करती हैं, "ये गाना तो शुरू से ही ज़हन में था, जब पहली बार इसे हबीब वली मोहम्मद से गाते सुना था. अल्फ़ाज़ बहुत अच्छे थे. धुन बहुत अच्छी थी.. यमन कल्याण में. मैं सोच रही थी कि गाऊं या न गाऊं, क्योंकि मैं सोच रही थी फ़िल्म का गाना है."

"एक दिन मैं हारमोनियम पर कुछ सुर देख रही थी, तो मेरे बच्चे कहने लगे कि आप क्यों नहीं इसे गातीं. मैं सोचने लगी कि अच्छा भी गा सकूँगी या नहीं. दो तीन साल हो गए थे उस गाने को ऑन एयर आए हुए. कम ही आता था रेडियो पर."

हबीब वली मोहम्मद
इमेज कैप्शन, इस ग़ज़ल को पहली बार हबीब वली मोहम्मद ने गाया था.

"फिर मैंने इस गाने को याद किया और गाया. पहले थोड़ा सा हल्का रहा, क्योंकि स्टाइल मैं पूरी तरह अपना नहीं सकी. फिर मैंने इसे अपने अंदाज़ में गाया."

इस गाने की ख़ासियत है इसका अपने आप बहना. इसमें फ़रीदा ख़ानम का जो मनुहार या इसरार करने का जो अंदाज़ है, उससे हर एक को लगता है कि ये गीत उसके लिए ही गाया जा रहा है.

मशहूर पत्रकार नजम सेठी और जुगनू मोहसिन के बेटे और पाकिस्तान के उभरते हुए गायक अली सेठी कहते हैं, "फ़रीदा ख़ानम ने इस गीत को रोक कर गाया. उन्होंने इसे दीपचंदी ताल में जो सात मात्रे की ताल होती है, उसमें गाया."

"रोक के गाने से मेरा मतलब ये है कि ये राग यमन कल्याण में उतर आता है. अगर आप इस राग को ज़हन में रख कर गाएं तो उनकी भावनाओं को समझने की गुंजाइश बहुत बढ़ जाती है. अगर आप इसके वादी स्वर गंधार को दबाएं, उसका मज़ा लें, उसको रोकें, उस पर ठहरें तो एक ख़ास सुकून सा तारी हो जाता है गाने में."

अली सेठी, फ़रीदा ख़ानम
इमेज कैप्शन, अली सेठी फ़रीदा ख़ानम के साथ.

"जब वो कहती हैं कि यूं ही पहलू में बैठे रहो, तो वहाँ वो ठहराव पैदा कर देती हैं और क्योंकि मौज़ूं भी उन अल्फ़ाज़ का वैसा ही है. वह दरख़्वास्त कर रही हैं रुकने या ठहरने की... इसके हवाले से इसका असर बहुत बढ़ जाता है."

फ़रीदा ख़ानम याद करती हैं कि फ़ैयाज़ हाशमी से उनकी मुलाकात इस गाने को गाने से कहीं पहले कोलकाता में हुई थी और हाशमी ने उनकी इस समय बहुत हौसला अफ़ज़ाई की थी जब वह मात्र 14 साल की थीं.

"उस समय फ़ैयाज़ ईएमआई में डायरेक्टर थे, जब मैं उनसे जा कर मिली थी. उस समय मेरी उम्र सिर्फ़ 14 साल की थी. मैंने सुन रखा था कि ये बड़े शायर भी हैं और सुर को भी बहुत पसंद करते हैं. बहुत मिलनसार हैं. बड़े अफ़सरों की तरह नहीं मिलते. सादगी से मिलते हैं."

फ़ैयाज़ हाशमी
इमेज कैप्शन, फ़ैयाज़ हाशमी ने इस ग़ज़ल को एक पाकिस्तानी फ़िल्म के लिए लिखा था.

"उस वक्त मेरी इतनी पक्की आवाज़ नहीं थी. उन्होंने मुझसे कहा कि आवाज़ में थोड़ा बचपना सा है. थोड़ा बड़ी हो कर गाओ तो अच्छा रहेगा. लेकिन फिर भी उन्होंने मुझसे एक ग़ज़ल गवाई. लेकिन उसमें आवाज़ की पुख़्तगी जो उम्र के साथ आती है, वो कम थी. लेकिन रेडियो पर वो ग़ज़ल बहुत चली.. 'हंगामे जवानी है'. अपने वक्त में वो बहुत मशहूर हुई."

इस गीत की लोकप्रियता का राज़ है इसके आसान अलफ़ाज़. आज कल के हिंदी उर्दू बोलने वाले इसे आसानी से समझ सकते हैं.

अली सेठी कहते हैं, "एक तो ये आम बोलचाल की ज़ुबान में है. मौज़ूं भी बहुत युनिवर्सल है. फ़रीदा ख़ानम ने फ़ैज़ को गाया है, दाग़ देहलवी को गया है, मिर्ज़ा ग़ालिब को गाया है. अल्लामा इक़बाल को भी गाया है. उसमें उन्होंने पटियाला घराना की अपनी जो ट्रेनिंग है... खटका, मुर्की.. तान सबका बेहतरीन इस्तेमाल किया है."

"लेकिन इस गाने को फ़ैयाज़ हाशमी ने एक कमर्शियल फ़िल्म के लिए लिखा था. इस को आप आधुनिक युग की एक कविता कह सकते हैं. उन्होंने अपनी प्रस्तुति से एक आम कलाम को धनी बनाया है. ये एक ऐसी शायरी है जिसे हम अगर सिर्फ़ पढ़ें तो उसमें उतना मज़ा नहीं मिलेगा."

"अगर आप मिर्ज़ा ग़ालिब या किसी पहुंचे हुए शायर का कलाम पढ़ कर कहें तो उसमें आपको उतना ही मज़ा आएगा. उसकी काव्यात्मक ख़ूबसूरती.. आपको बिना संगीत के भी मिल जाएगी."

फ़रीदा ख़ानम

'आज जाने की ज़िद न करो,' सिर्फ़ फ़रीदा ख़ानम तक ही महदूद नहीं रहा. इसे आशा भोंसले, एआर रहमान और टीना सानी जैसे कितने लोगों ने परफॉर्म किया है. मीरा नायर की फ़िल्म मॉनसून वेडिंग में इसे थीम सॉंग बनाया गया है.

मशहूर ग़ज़ल गायक तलत अज़ीज़ की नज़र में ये गीत सभी सीमाओं के परे हो गया है. वो कहते हैं, "इसको न जाने कितने गायकों ने गाया है. मैंने भी गाया है. इसकी ख़ूबसूरती है कि इसमें एक आशिक की गुज़ारिश है."

"आम आदमी इसे तुरंत महसूस कर लेता है. इसको हम अपने ज़माने का सबसे लोकप्रिय गीत कह सकते हैं. "

कुछ पंडित इस गाने में ये कह कर नुख़्स निकालते हैं कि इसमें फ़रीदा ख़ानम ने शास्त्रीय गायन के नियमों का कड़ाई से पालन नहीं किया है.

अली सेठी का मानना है, "गवैये ख़ाँ साहब लोग जब शास्त्रीय से उप शास्त्रीय पर जाते थे तो उसमें रागदारी का असर दिखाना अपना फ़र्ज़ समझते थे. आज कल भी चाहे शफ़कत अमानत अली ख़ाँ साहब हों या राहत फ़तह अली ख़ाँ हों, जिस घराने से आए हों, जिस पृष्ठभूमि से आए हों, उसकी झलक वो ज़रूर दिखाना चाहते हैं."

फ़रीदा ख़ानम

"मेंहदी हसन और ग़ुलाम अली भी जब ग़ज़ल गाते हैं तो उसमें लयकारी का खेल ज़रूर दिखाते हैं. फ़रीदा जी के गाने में ऐसा नहीं है. वहां कुछ और हो रहा है. वहां लय चल रही है अपने हिसाब से... लेकिन वो लय के साथ एक ख़ास टेंशन पैदा कर देती हैं."

"टेंशन से मेरा मतलब है कि वो लय को जानबूझ कर फ़्रसटेट करती हैं. सम आता है और चला जाता है. जहां आपको उम्मीद होती है कि बोल यहां आ कर रुकेगा, तबले के साथ मिलेगा, लेकिन वो वहाँ नहीं मिलता. उससे एक अजीब सी और मज़ेदार किस्म की हलचल पैदा हो जाती है."

"कहीं वो तेज़ कर देती हैं, कहीं उतार देती हैं, कहीं रोक देती हैं. और कहीं न कहीं वो सम पर आ भी जाती हैं, लेकिन जब वो वहां आती हैं वो वहां आपको सरप्राइज़ के तौर पर मिलता है. उसको रोक रोक के जो मज़ा आपको देती हैं उससे उसका कुल मिला कर सुनने का अनुभव बुलंदियों तक पहुंच जाता है."

फ़रीदा ख़ानम

अली सेठी बताते हैं कि एक बार वो और मशहूर गायिका रेखा भारद्वाज इस गीत के बारीक पहलुओं पर बात कर रहे थे. "उन्होंने मुझसे कहा, मैं फ़रीदा जी की आशिक हूं. ये गीत अब गीतकार का न रह कर उनका बन गया है."

अली सेठी आगे बताते हैं, "इस बात में अब कोई दो राय नहीं रही कि जिस तरह से वो गाने को गाती हैं उस तरह से कोई भी उसे नहीं गा सकता. वो जिस तरह से 'हाय' कहती हैं, उनकी अदायगी का सारा राज़ उस हाय को कहने में मिला हुआ है."

"मैंने एक दिन फ़रीदा जी से पूछा कि ये जो हाय है आप कैसे कहती है, मुझे बताएं. मैं अपना बाजा ले गया उनके सामने. कहने लगीं कि देखो ये पंचम का स्वर है, उसको दिखाना है. लेकिन देखो कि इस स्वर की शुरुआत कहाँ से हो रही है? क्या हम गंधार से शुरू कर रहे हैं या मध्यम से शुरू कर रहे हैं ? या कोई शुद्धि है जो हम लगा रहे हैं. उन्होंने तीन चार बार किया."

"मैंने देखा एक तो जब भी वो करती थीं, वो बाजे पर नज़र नहीं आता था. कहने का मतलब ये कि जो जादू है वो उनकी रूह के अंदर है. उनका हाय एक सांस से शुरू होता है और हाय का जो पहला हर्फ़ है- ह, उसे आप लोकेट नहीं कर सकते."

फ़रीदा ख़ानम

"दूसरी बात ये है कि जब वो कहती हैं हाय तो मैं ये नोट कर रहा था कि हर दफ़ा वो अपनी आँखें बंद कर लेती थीं और अपना एक हाथ हवा में ले जा कर एक अंदाज़ से हाय कहती थीं जैसे कि हवा में वो 'हाय' पड़ा है और उसे उन्हें छूना है."

फ़रीदा ख़ानम आज 80 साल की हैं. हमारे ख़ास अनुरोध पर जब उन्होंने टेलिफ़ोन पर इस कालजयी रचना को गुनगुनाया तो रोम रोम में एक सिहरन सी दौड़ गई, आखें अपने आप मुंदती चली गईं और जी यही चाहा कि ये क्षण कभी भी ख़त्म न हो.

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