देसी मुर्गों के सौदागर

प्रतिमा कोसरे
    • Author, पुरुषोत्तम ठाकुर
    • पदनाम, धमतरी, छत्तीसगढ़ से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 70 किमी दूर बस्तर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर 30 पर स्थित है धमतरी शहर.

यहाँ के इतवारी बाज़ार में हमारी मुलाकात 50 साल की प्रतिमा कोसरे से हुई जो इतवार की दोपहर तक करीब 15 हज़ार रुपए के देसी मुर्गे बेच चुकी थीं.

प्रतिमा कोसरे बताती हैं, ''गोलबाज़ार में जब 20-25 लोग मुर्गा बेचते थे, तब मेरी माँ भी उनमें से एक थी. माँ के साथ मैं 11 साल की उम्र से यह काम कर रही हूँ. तब मुर्गा किलो के तराजू में नहीं बल्कि एक नग 4-5 रुपए में बेचते थे. हम नगरी क्षेत्र में गाँव-गाँव जाकर मुर्गी खरीदकर लाते थे पर अब बस्तर क्षेत्र के केशकाल के व्यापारी को फोन करते हैं तो वह बस में भेज देते हैं.''

देसी मुर्गा बेचती महिला

आज प्रतिमा के अलावा लक्ष्मी सोनकर और 3 महिलाएँ और हैं जो देशी मुर्गे का धंधा कर अपने परिवार का पेट पाल रही हैं.

प्रतिमा कहती हैं, ''अगर मर्द बैठते हैं तो वह कमाई का कुछ हिस्सा तो शराब में ही उड़ा देते हैं. इस धंधे में मेरी माँ थी, मेरी मौसी और मेरी सास भी थी और मैं भी हूँ. हाँ, मुर्गे की सफाई और कटाई का काम पति या बेटा ही करते हैं. लेकिन मुर्गी को मंगाने से लेकर बेचना, तौलना और पैसा रखने का काम हम ही करते हैं.''

सिर्फ देसी चिकन

देसी मुर्गा

धमतरी और आसपास के क्षेत्र में देसी मुर्गा खाने वालों की जुबान पर एक और नाम चढ़ा रहता है और वह है अब्दुल्ला होटल, जहां बोर्ड पर साफ-साफ लिखा है, ''यहाँ सिर्फ देसी चिकन मिलता है.''

अब्दुल्ला होटल

होटल मालिक शेख अब्दुल्ला कहते हैं, ''हमारा होटल 40 साल पुराना है और यह पूरे छत्तीसगढ़ में देसी चिकन की बिरयानी, मसाला और करी बेचने वाला एकमात्र होटल है.''

देसी मुर्गा

लेकिन सिर्फ देसी मुर्गा ही क्यों, इस सवाल पर वे कहते हैं, ''मुझे सफ़ेद मुर्गा पसंद नहीं, मैं देसी खाता हूँ इसलिए ग्राहकों को भी देसी खिलाता हूँ. हमारे यहाँ जगदलपुर, रायपुर, ओड़िशा और मुम्बई से भी लोग देसी चिकन खाने आते हैं.''

शेख अब्दुल्ला बताते हैं कि वो वर्ष 1963-64 में तमिलनाडु से आए थे और रायपुर के मद्रासी होटल में प्लेट धोते थे. इसके बाद अब्दुल्ला धमतरी चले आए और अब्दुल्ला बिरयानी होटल की शुरुआत की. होटल पहले किराए का था. बाद में उन्होंने होटल ख़रीद लिया.

तीज-त्यौहारों में देसी मुर्गा

देसी मुर्गा

छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल में तीज-त्यौहारों में देसी मुर्गे की मांग बहुत बढ़ जाती है. बाज़ारों में इसके लिए भीड़ उमड़ती है.

यहां के अंदरूनी इलाकों के बाज़ारों में आज भी आदिवासी देसी मुर्गे बेचने के लिए लाते हैं.

देसी मुर्गा

वहीं बस्तर और बस्तर से सटे आदिवासी अंचलों के साप्ताहिक हाटों में देसी मुर्गे की लड़ाई आकर्षण का केंद्र होती है.

धमतरी के रुद्री में भी मुर्गों की लड़ाई होती है और उसके लिए भी युवकों को गोलबाज़ार से मुर्गा ख़रीदते हुए देखा जा सकता है.

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