'पाक के लिए भारत को घेरने का बेहतरीन मौक़ा'

    • Author, अशोक कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
  • प्रकाशित

पाकिस्तान के मामलों में भारत के कथित दखल और इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठाने की कोशिशें पाकिस्तान के उर्दू मीडिया में छाई हैं.

‘नवा-ए-वक़्त’ लिखता है कि ये भारत पर अंतरराष्ट्रीय पाबंदियां लगवाने का बेहतरीन मौक़ा है.

अख़बार का आरोप है कि 'कश्मीर में भारत के ज़ुल्म' दुनिया के सामने हैं, जबकि ख़ुद भारत में भी 'मुसलमानों और ईसाइयों को जबरन हिंदू बनाने' का नोटिस संयुक्त राष्ट्र पहले ही ले चुका है.

अख़बार की राय है कि ऐसे में, पाकिस्तान राजनयिक मोर्चे पर सक्रिय भूमिका अदा करे तो भारतीय साज़िशों के मददेनज़र उसके (भारत के) ख़िलाफ़ वैश्विक पाबंदिया लगवाने में कामयाबी मिल सकती है.

‘सरकार की सुस्ती’

एमक्यूएम को मदद देने का मुद्दा छाया है पाक प्रेस में

वहीं ‘जंग’ लिखता है कि जहां तक एमक्यूएम के बारे में बीबीसी रिपोर्ट और पाकिस्तान में भारतीय एजेंसियों की दखलंदाजी का मामला है तो इसके सबूत इतने हैं कि उन्हें ख़ारिज करना या झुठलाना मुमकिन नहीं है.

बीबीसी की हाल की एक रिपोर्ट में भारत पर एमक्यूएम की कथित फंडिंग के आरोप लगे थे.

अख़बार के मुताबिक़ बावजूद इसके, अमरीका कहता है कि पाकिस्तान ने भारत की दहशतगर्दी के अभी तक कोई सबूत नहीं दिए हैं.

अख़बार सरकार की सक्रियता पर सवाल उठाते हुए कहता है कि अगर सुस्ती का यही आलम रहा तो फिर भला इसका क्या परिणाम निकलेगा.

'मानवाधिकारों का उल्लंघन'

रोज़नामा पाकिस्तान ने भी भारत की कथित दखलंदाजी का मुद्दा विश्व के हर मंच पर उठाने की पैरवी की है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल

उधर 'एक्सप्रेस' ने अपने संपादकीय में मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल की उस हालिया रिपोर्ट का ज़िक्र किया है जिसमें भारत प्रशासित कश्मीर में भारतीय सेना पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगे हैं.

अख़बार लिखता है कि भारत की मोदी सरकार कश्मीर को स्थायी तौर पर भारत में मिलाने और कश्मीरियों के आज़ादी के संघर्ष को दबाने का हर हथकंडा अपना रही है, लेकिन पिछले दिनों हजारों कश्मीरियों ने पाकिस्तान का झंडा लहरा कर साफ़ कर दिया कि वो कभी भारत का हिस्सा नहीं बनेंगे.

खस्ताहाल रेलवे

रेल हादसे की ख़बर सुर्खियों में

वहीं पाकिस्तानी सैनिकों को लेकर जा रही ट्रेन के एक नहर में गिर जाने पर रोज़नामा ‘दुनिया’ ने रेलवे के ढांचे पर सवाल उठाया है.

अख़बार लिखता है कि पड़ोसी मुल्क भारत में रेलवे का नेटवर्क जहां लगातार फैल रहा है, वहीं पाकिस्तान में हालत ये है कि तीन साल पहले तक न सिर्फ कई मुसाफिर ट्रेनें बंद कर दी गईं, बल्कि 'कमाऊ पूत' कही जाने वाली माल गाड़ियां तक बंद हो गईं.

अख़बार के मुताबिक अब हालत बेहतर हुई है, लेकिन और बेहतरी की उम्मीद है, जिसके लिए मरम्मत ही नहीं निर्माण भी करना होगा.

जनता की जेब पर डाका

‘मशरिक’ का संपादकीय है - गरीब जनता की जेब पर डाका.

अख़बार लिखता है कि जनता पहले ही बिजली की किल्लत से परेशान है, ऊपर से बिजली के बिलों में इज़ाफा मरे में और दो लात मारने के बराबर है.

अख़बार के मुताबिक़ इससे पहले पानी सिर से गुज़रे, सरकार बिल में जुड़ने वाले अलग अलग तरह के टैक्स और सरचार्ज वापस ले.

आधुनिक शिक्षा

मदरसा तालीम का मुद्दा उर्दू मीडिया में

इधर भारत में आधुनिक शिक्षा न देने वाले मदरसों का स्कूल का दर्जा ख़त्म करने के महाराष्ट्र सरकार के फैसले को दिल्ली से छपने वाले ‘हमारा समाज’ ने सही बताया है.

अख़बार लिखता है कि मदरसों से जुड़े कई लोग इस फैसले को मुसलमान विरोधी कह रहे हैं, लेकिन अगर मदरसे धार्मिक शिक्षा के अलावा अंग्रेजी, विज्ञान और गणित जैसे विषयों की तालीम भी दें तो इससे छात्रों का भला ही होगा.

मदरसा शिक्षा भी है उर्दू मीडिया की सुर्खियों में

अख़बार ने इंटरनेट और टेक्नोलजी के दौर में आधुनिक शिक्षा को सबसे बड़ी जरूरत बताया है.

वहीं ‘हिंदोस्तान एक्सप्रेस’ ने पिछले दिनों एयर इंडिया के दो विमानों को उड़ान भरने में देरी के दो मंत्रियों पर लगे आरोपों पर संपादकीय लिखा है.

अख़बार कहता है कि देश में वीआईपी कल्चर हावी है और ये किसी एक पार्टी तक ही सीमित नहीं है.

अख़बार की राय है कि राजनेताओं को सिर्फ़ अपनी सुविधा की परवाह होती है, फिर चाहे आम लोगों को कितनी भी परेशानी उठानी पड़े.

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