बादलों से घिरा, भीग रहा है चेरापूँजी

चेरापूंजी
    • Author, मुकेश कुमार
    • पदनाम, वरिष्ठ टीवी पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

कभी दुनिया में सबसे ज़्यादा बारिश वाली जगह के रूप में मशहूर चेरापूँजी, इन दिनों फिर से भीग रहा है. जंगल, पहाड़, पशु-पक्षी सब भीग रहे हैं. साथ में भीग रहे हैं देश-विदेश से आने वाले लाखों सैलानी.

इधर-उधर से आने वाले बादल लोगों को अपने साए में ले लेते हुए उनका स्वागत करते हैं. हल्की सी ठंडक के साथ उनकी अदृश्य छुअन महसूस करते हैं.

बरून मजूमदार आसनसोल से सपरिवार यहाँ आए हैं. बादलों के इस खेल में शामिल होकर वे पूछते हैं- ''भला ये आनंद और कहाँ मिल सकता है?''

मैं जब चेरापूँजी (जिसे सोहरा भी कहा जाता है) पहुँचा तो बारिश का पहला दौर थमा ही था. 21 मई से शुरू हुई बरसात लगभग एक पखवाड़े बाद थमी थी.

लेकिन बादलों की आवाजाही थमी नहीं थी. अगले दिन से फिर बूंदाबांदी शुरू हो गई.

अल नीनो में ज़्यादा बारिश !

यहाँ के मौसम विभाग के प्रभारी विजय सिंह का कहना है कि जब उत्तर भारत में कम बारिश होती है तो यहाँ ज़्यादा. इस लिहाज़ से इस साल ज़्यादा बारिश होने का अनुमान है. जून के पहले 10 दिनों में ही 3026 मिलीमीटर बारिश हो चुकी है. ये औसत से ज़्यादा है.

अल नीनो के प्रभाव का ज़िक्र करते हुए सिंह दिलचस्प आँकड़े और जानकारियाँ देते हैं. वे कहते हैं कि चेरापूँजी से सबसे ज्यादा बारिश वाला स्थान होने का ताज छिन चुका है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से 16 किलोमीटर के फासले पर स्थित मौसिनरम ने ये रुतबा हासिल कर लिया है.

लेकिन 2014 में 48 घंटे तक सबसे ज़्यादा 2493 मिलीमीटर वर्षा के साथ, इस अवधि में सर्वाधिक वर्षा का रिक़ॉर्ड मौसिनरम के नाम हो गया था. एक वर्ष में सबसे अधिक 26470 मिलीमीटर बरसात का रिकॉर्ड चेरापूँजी के ही नाम दर्ज़ है.

खेती संभव नहीं

लेकिन चेरापूँजी की लोकप्रियता में इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ा है. पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र वही है. प्राकृतिक सौंदर्य और खूबसूरत झरनों को निहारने वे यहाँ खिंचे चले आते हैं.

सर्वाधिक वर्षा होना चेरापूँजी के लिए दुर्भाग्य भी है क्योंकि मिट्टी की ऊपरी सतह तेज़ बारिश के साथ बह चुकी है इसलिए यहाँ खेती संभव नहीं रह गई है.

विडंबना ये भी है कि सर्वाधिक वर्षा के मामले में दूसरे स्थान पर रहने वाले लोग ठंड के दिनों में बूंद-बूंद पानी के लिए मोहताज हो जाते हैं.

बारिश के पानी के संरक्षण का कोई इंतज़ाम नहीं किया गया है, इसलिए पानी के लिए लोगों को कई किलोमीटर का फासला तय करना पड़ता है.

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