'गांव में मरना चाहता हूं, कैंप में नहीं'

छत्तीसगढ़ के आदिवासी
    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित

कासोली कैंप में बैठे हुए गागड़ू राम लेकाम इशारा कर बताते हैं, "वो...उधर, नदी के उस पार मेरा गांव था चिंगेर. बहुत याद आती है गांव की. लेकिन अब क्या. सब ख़त्म हो गया." यह सब कहते-बताते गागड़ू राम मायूस हो जाते हैं.

दंतेवाड़ा ज़िले का कासोली पहले एक गांव था, अब भारी सुरक्षाबल और कांटेदार लोहे के तारों से घिरा हुआ सरकारी कैंप है. इसी कैंप में पिछले दस सालों से गागड़ू राम रह रहे हैं.

कासोली कैंप के पीछे एक गांव है छिंदनार और उसके पीछे बहती है चौड़े पाट वाली इंद्रावती नदी. नदी के उस पार अबूझमाड़ के इलाके में गागड़ू राम का गांव चिंगेर था.

सलवा जुडूम और विस्थापन

छत्तीसगढ़ में आदिवासी कैम्प
इमेज कैप्शन, छत्तीसगढ़ में आदिवासी कैम्प

2005 में जब बस्तर में छत्तीसगढ़ सरकार के संरक्षण में माओवादियों के ख़िलाफ़ सलवा जुडूम नाम से अभियान शुरू हुआ तो 644 गांवों को ख़ाली करा दिया गया.

लाखों की संख्या में लोग अपने गांव-घर से विस्थापित हुए. कुछ परिवारों ने आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और ओडीशा का रुख़ किया तो कुछ माओवादियों के साथ चले गए.

50 हज़ार से अधिक लोग 18 सरकारी राहत शिविरों में रहने आ गए.

दस साल पहले अपना गांव चिंगेर छोड़ कर कासोली राहत शिविर में रहने आए गागड़ू राम भी उन हज़ार लोगों में से एक हैं, जिन्हें उम्मीद थी कि वो जल्दी ही अपने गांव लौट जाएंगे. लेकिन वे कभी लौट नहीं पाए.

कुछ ऐसे ही हाल में रह रहे हैं पल्लेवाल गांव के मुरिया आदिवासी मंगड़ू राम.

मंगड़ू राम से उनके बचपन और गांव की बात करें तो उनकी बूढ़ी आंखें चमकने लगती हैं. उनके पास बचपन से लेकर अब तक की न जाने कितनी यादें हैं.

गाँव वापसी की उम्मीद

मंगड़ू राम
इमेज कैप्शन, मंगड़ू राम अपने गाँव वापस जाना चाहते हैं.

पास के पेड़ से बोलती किसी चिड़िया की आवाज़ को पहचानने की कोशिश करते हुए मंगड़ू राम रुआंसी आवाज़ में कहते हैं, “मैं अपने गांव में मरना चाहता हूं. यहां कासोली कैंप में नहीं.”

कासोली में लगभग 3000 लोग रहते हैं, जिनमें 568 परिवार ऐसे हैं, जो सलवा जुड़ूम के बाद यहां आए. ज़ाहिर है, जो लोग सलवा जुड़ूम के बाद इस गांव में रहने के लिए आए, उन्हें 10 साल बाद भी ‘बाहरी’ की तरह ही देखा जाता है.

शुरू में इन शिविरों में रहने वालों को राज्य सरकार की ओर से रहने की जगह और मुफ़्त खाना उपलब्ध कराया जाता था, लेकिन धीरे-धीरे ये सुविधाएं बंद होती चली गईं. अब इन राहत शिविरों में रहने वाले मज़दूरी कर अपना घर चलाते हैं.

परिवार की खोज

कुछ हैं, जिन्होंने पढ़ाई की और अब नौकरी करते हैं. डूंगा गांव की श्यामवती मंडावी उनमें से एक हैं.

श्यामवती, छत्तीसगढ़
इमेज कैप्शन, अबूझमाड़ की रहने वाली श्यामवती

श्यामवती अबूझमाड़ इलाक़े के ओरछा के हॉस्टल में रह कर पढ़ाई कर रही थीं, तभी उन्हें एक दिन पता चला कि अब डूंगा से उनका परिवार कहीं चला गया है. कहां, यह उन्हें नहीं पता था.

कई दिनों की तलाश के बाद उन्हें पता चला कि उनका परिवार कासोली के सरकारी शिविर में है.

12वीं की पढ़ाई के बाद श्यामवती पंचायत में ऑपरेटर का काम कर रही हैं.

श्यामवती कहती हैं, “सबका जीवन बिखर गया. मेरे साथ डूंगा गांव की दो छोटी बच्चियां रहती हैं. उनके माता-पिता दोनों की मौत हो गई. उनका कोई रिश्तेदार नहीं बचा. वो कभी इस घर तो कभी उस घर रह रही थीं. मैं उन्हें अपने साथ ले आई.”

एक बच्ची को श्यामवती ने हॉस्टल में डाल दिया है. जल्ह ही उसकी छुट्टियां होने वाली है. छुट्टियां बिताने के लिए वह कासोली के इसी शिविर में आने वाली है.

नेताओं की सुरक्षा

सलवा जुडूम, छत्तीसगढ़

सलवा जुड़ूम के शीर्ष नेताओं में से एक चैतराम अटामी इसी कासोली कैंप में रहते हैं, हमेशा सुरक्षाकर्मियों से घिरे.

अटामी कहते हैं, “खुले जंगल में आज़ादी से रहने वाले आदिवासी के लिए इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता कि वह लोहे के कांटेदार तारों के बीच सुरक्षा की क़ैद में रहे. लेकिन इसके अलावा कोई चारा कहां हैं!”

कैंप से बाहर को जाने वाली सड़क पर एक पेड़ के नीचे बैठे मंगड़ू राम कहते हैं, “मोदी आए थे, वो बोले हैं कि मैं दादा लोगों को ख़त्म कर दूंगा, उनको समझा दूंगा.”

फिर ज़मीन को अंगूठे से कुरेदते हुए ख़ुद ही कहते हैं, “कहां खत्म हो रहा है ये. ये तो अब और बढ़ रहा है. लगता है, एक दिन यहीं कैंप में ही हम सब को ख़त्म होना होगा.”

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