केजरीवाल बार-बार माफ़ी पर क्यों आ जाते हैं?

केजरीवाल
    • Author, प्रमोद जोशी
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

किसान गजेंद्र सिंह की आत्महत्या पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपनी ग़लती को माना है.

उनका कहना है कि, "हमें उस दिन अपनी सभा ख़त्म कर देनी चाहिए थी." इस ग़लती का एहसास उन्हें बाद में हुआ.

ग़ालिब का शेर है, "की मेरे क़त्ल के बाद उसने जफ़ा से तौबा, हाय उस ज़ूद-पशेमां (गुनाहगार) का पशेमां (शर्मिंदा) होना."

केजरीवाल का ग़लती मान लेना मानवीय नज़रिए से सकारात्मक और ईमानदार फ़ैसला है. उनकी तारीफ़ होनी चाहिए.

पर पिछले दो साल में वे कई बार ग़लतियों पर शर्मिंदा हो चुके हैं.

क्या यह भी कोई प्रयोग था?

केजरीवाल की किसान रैली

सवाल है कि वे ठीक समय पर पश्चाताप क्यों नहीं करते? देर से क्यों पिघलते हैं? इसलिए शक़ पैदा होता है कि यह शर्मिंदगी ‘रियल’ है या ‘टैक्टिकल?’

क्या आम आदमी पार्टी प्रयोगशाला है? और क्यों जो हो रहा है वह प्रयोग है?

दिसम्बर 2013 में पहले दौर की सरकार बनाने और 49 दिन बाद <link type="page"><caption> इस्तीफ़ा देने</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/05/140521_aap_kejriwal_dp" platform="highweb"/></link> के ठोस कारण साफ़ नहीं हुए थे कि उन्होंने लोकसभा <link type="page"><caption> चुनाव में उतरने का</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/03/140316_arvind_kejriwal_banaras_ap" platform="highweb"/></link> फैसला कर लिया.

उसमें फ़ेल होने के बाद फिर से दिल्ली में सरकार बनाने की मुहिम छेड़ी.

इधर, इस साल जब से उन्हें विधानसभा चुनाव में जबर्दस्त <link type="page"><caption> सफलता</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2015/02/150209_arvind_kejriwal_aap_win_bjp_rns" platform="highweb"/></link> मिली है, पार्टी को ‘अंदरूनी’ <link type="page"><caption> बीमारी लग गई</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2015/03/150328_aap_trending_on_social_media_md" platform="highweb"/></link> है.

गांधी जी के नक़्शे कदम पर!

महात्मा गांधी

भारत के आज़ादी के आंदोलन में उत्तर प्रदेश में गोरखपुर के पास स्थित एक कस्बा, चौरीचौरा का ज़िक्र आता है.

चौरीचौरा में 4 फ़रवरी 1922 को आंदोलनकारियों ने अंग्रेज़ सरकार की एक पुलिस चौकी को आग लगा दी थी. इस घटना में 22 पुलिसकर्मी जल कर मर गए थे.

इस हिंसा के बाद महात्मा गांधी ने कहा था, "हिंसा होने के कारण असहयोग आन्दोलन को जारी रखना उचित नहीं है."

उन्होंने अपना देशव्यापी सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित कर दिया, जो बारदोली से शुरू होने वाला था.

गांधी को अपनी राजनीति में ‘साधन और साध्य’ की एकता को साबित करने की इच्छा थी.

नमाज़ छुड़ाने गए रोज़े गले पड़े?

केजरीवाल

धारा के ख़िलाफ़ फ़ैसले दृढ़प्रतिज्ञ नेता ही कर सकता है. पर नेता की धार का फ़ैसला भी वक़्त करता है.

क्या केजरीवाल समय की शिला पर ख़रे उतरेंगे? जंतर-मंतर की यह रैली पार्टी के बिखराव को रोकने की कोशिश का एक हिस्सा थी.

इसका फ़ायदा मिलने के बजाय, यह उल्टे गले पड़ती नज़र आ रही है.

दिसम्बर 2013 में चुनाव परिणाम आने के पहले <link type="page"><caption> वे कहते थे</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/12/131210_delhi_government_formnation_an" platform="highweb"/></link> कि हम किसी भी पार्टी से समर्थन नहीं लेंगे और न किसी को समर्थन देंगे.

पर कांग्रेस की पेशकश पर वो फिसल गए और ‘आप’ की पहली सरकार बनी.

इसके बाद जनवरी 2014 के तीसरे हफ़्ते में ही पुलिस व्यवस्था को लेकर उनकी सरकार का केंद्र सरकार के साथ टकराव हो गया. मुख्यमंत्री केजरीवाल <link type="page"><caption> धरने पर जा बैठे</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/01/140121_delhi_kejrival_dharna_chaos_rd" platform="highweb"/></link>.

धरने से गिरे इस्तीफ़े में अटके

केजरीवाल

धरना जितना नाटकीय था उतनी ही नाटकीय थी उस धरने की वापसी.

‘आप’ सरकार जिस फंदे में दो दिन फँसी, वह तत्कालीन केंद्र सरकार का फेंका हुआ था.

अंततः केंद्र सरकार ने टकराव टाला, पर ‘आप’ को एक्सपोज़ करने के बाद. केजरीवाल ने शुक्रिया के अंदाज में उसे ‘महान विजय’ घोषित किया.

इसके बाद रहने के लिए मकान और मंत्रियों की गाड़ियों की व्यवस्था को लेकर दूसरा अंतर्विरोध सामने आया.

चूंकि पार्टी ने सादगी पर जोर दिया था, इसलिए वे सवाल भी उठे. अंततः फ़रवरी में सरकार ने इस्तीफ़ा दे दिया.

बाद में यह स्वीकार किया कि <link type="page"><caption> इस्तीफ़ा देना ग़लत</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/04/140411_kejriwal_delhi_cm_aa" platform="highweb"/></link> था.

मुक़ाबला अपनों से

योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण

उस इस्तीफ़े के बाद पिछले एक साल में पार्टी बाहर से ज़्यादा अपनों से लड़ रही है.

केजरीवाल ने रामलीला मैदान पर दूसरी बार शपथ लेते वक्त कहा, "हम भटक गए थे. हमने पूरे देश में जीतने की ठान ली थी. भगवान ने हमें सबक सिखा दिया."

प्रकारांतर से यह बात शर्मिंदगी में नहीं, बल्कि अपने विरोधी गुट की आलोचना में कही गई थी.

एक समय में ‘आप’ से जुड़ने वालों की जबर्दस्त बाढ़ थी.

आप समर्थक

तब योगेंद्र यादव ने कहा था कि बाढ़ के साथ कचरा भी आता है. फ़िल्टरिंग की चुनौती है. उस फ़िल्टरिंग में वे <link type="page"><caption> खुद अटक गए</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2015/04/150420_aap_rebels_expelled_sm" platform="highweb"/></link>.

संयोग है कि जंतर-मंतर कांड तब हुआ है जब फ़िल्टरिंग के बड़े फ़ैसले हो रहे थे.

ग़लतियाँ शायद कुछ और हुईं हैं, जिनकी स्वीकारोक्ति नहीं हो पाई है.

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