मडगांव की ये 'भदेल' हैं कुली नंबर-1

महिला कुली
    • Author, सोनिया फ़िलिंटो
    • पदनाम, फ़ोटोपत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित

गोवा के दक्षिणी शहर मडगांव में महिलाएं ढुलाई का काम करती हैं. इन्हें भदेल कहते हैं.

ये महिलाएं इस पेशे में कई पीढ़ियों से हैं. इनमें अधिकांश की मां या सास भी यही काम किया करती थीं.

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मडगांव बाज़ार में अब बहुत कम संख्या में ही भदेल रह गई हैं, लगभग एक दर्जन. इन सभी की उम्र 50 साल के आस पास है. अगली पीढ़ी से किसी ने भी इस पेशे को नहीं अपनाया.

मारिया बोर्गीज़ कहती हैं, "इस काम में हमारी लड़कियों की कोई रुचि नहीं है. वे कुछ पढ़ लिख गई हैं इसलिए ऑफ़िस में काम करना चाहती हैं."

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ये महिलाएं सुबह के घरेलू काम निपटा कर, पास के गांवों से बसों में यहां आती हैं. ये सुबह आठ से 10 बजे के बीच आती हैं और शाम 6.30 बजे तक यहां काम करती हैं.

भदेल कुनबिस जनजाति की हैं, जिन्हें गोवा का मूल निवासी माना जाता है.

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एपाइन आलमीडा बिल्कुल कुनबि स्टाइल के पोशाक पहने हुए हैं. हालांकि कपड़े और उनके रंग पारम्परिक इस्तेमाल किए जाने वाले कपड़ों से अलग हैं, क्योंकि ऐसे कपड़े अब नहीं बुने जाते.

भदेल औरतें

ये भदेल महिलाएं मडगांव बाज़ार में गोदामों और दुकानों पर काम करती हैं. ऐसा माना जाता है कि अतीत में गोवा के अन्य बाज़ारों में भी ये काम करती थीं, लेकिन इसके साक्ष्य बहुत कम हैं, जिनका लोकगीतों में ज़िक्र मिलता है.

जिन लोगों को उनकी सेवाओं की ज़रूरत होती है, वो जानते हैं कि भदेल कहां मिलेंगी, यानी, मडगांव बाज़ार में दुकानों की क़तार में एक पुरानी दुकान के सामने.

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यह ईसाई त्यौहार का मौसम है, बाज़ार में गहमागहमी कम रहती है. हालांकि यह व्यसाय के लिए मंदा समय है, लेकिन इससे इन महिलाओं को थोड़ा आराम मिल जाता है.

1990 के दशक के अंत में जब कोंकण रेलवे की शुरुआत हुई तो पड़ोसी राज्यों से सस्ते मज़दूरों का आना शुरू हुआ, जिससे इन महिलाओं को कड़ी प्रतिद्वंद्विता का सामना करना पड़ा.

भदेल महिलाएं

स्थानीय व्यापारी कहते हैं कि वो भदेलों पर आंख मूंद कर भरोसा करते हैं और उन्हें बैंक में भारी मात्रा में पैसे जमा करने के लिए भेजते हैं.

ये महिलाएं एक दिन में 50 से 200 रुपए तक कमाती हैं. एक औसत आकार का शॉपिंग बैग ले जाने का उन्हें तीन रुपये मिलता है, स्टील की एक आलमारी ले जाने का 50 रुपए मिलता है, जिन्हें ले जाने वाली सभी महिलाओं में बांट दिया जाता है और 50 किलो का सामान ढोने के लिए 20 रुपए मिलते हैं.

महिला कुली

एलपाइन अलमीडा एक दुकानदार के लिए सामान से भरा टोकरा ले जा रही हैं.

गोवा में दोपहर बाद जब दुकानें बंद हो जाती हैं तो उनके सामने भदेल महिलाएं भोजन करती हैं.

बिल्ली

और यह बिल्ली भोजन के इस समय को कभी नहीं भूलती.

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ये महिलाएं भोजन के बाद थोड़ा आराम करती हैं और इस समय उन्हें काम के लिए बहुत कम ही कहा जाता है.

सत्तर साल की रीता कमारा इन भदेल महिलाओं में सबसे बुज़ुर्ग हैं. वह बीड़ी पीती हैं.

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साल 2011 में गोवा सरकार का उन भदेल महिलों की सेवाओं पर ध्यान गया, जो पिछले 25 साल से इस पेशे में हैं. उन्हें एकमुश्त 25,000 रुपये का मानदेय दिया गया.

वरिष्ठ नागरिकों की पेंशन स्कीम ये महिलाएं आवेदन कर सकती हैं, लेकिन भदेल स्वाभिमानी मज़दूर हैं और मदद लेने में उन्हें झिझक होती है.

पॉलिन अलमीडा

कुछ भदेल महिलाओं को चश्मा लग चुका है लेकिन काम के समय असुविधा के चलते वो इसे नहीं पहनतीं.

काम के बाद जब घर लौटने का समय होता है तो पॉलिन अलमीडा का चश्मा निकल आता है.

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