लड़कियों का जनेऊ कराने वाली लड़कियां

लड़कियों का उपनयन संस्कार कराती हुई लड़कियाँ, हिन्दू धर्म
    • Author, नरेश कौशिक
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

अपनी भारत यात्रा के दौरान मैंने एक अनूठा दृश्य देखा. उत्तर प्रदेश के देवरिया ज़िले के बरपार गांव में पूर्व सांसद और जनरल प्रकाश मणि त्रिपाठी के घर वैदिक विधि से दो बच्चों का उपनयन संस्कार हो रहा था.

लेकिन दो पुरुष पंडित वहाँ केवल मूक दर्शक थे. संस्कार करा रही थीं एक महिला पंडित, पाणिनि कन्या महाविद्यालय वाराणसी की आचार्य नंदिता शास्त्री.

दरअसल यह उपनयन संस्कार जनरल त्रिपाठी की पौत्रियों तारिणी और ईशा का था. मैं अब तक यही समझता था कि उपनयन संस्कार, जिसमें पारम्परिक रूप से बच्चों को जनेऊ पहनाकर दीक्षा के लिए तैयार किया जाता रहा है, केवल लड़कों का ही होता है.

जब मेरे मित्र शशांक त्रिपाठी ने, अपनी बेटियों के उपनयन संस्कार में शामिल होने का न्योता दिया, तो एक बार तो चौंक गया.

बराबरी का दर्जा

लड़कियाँ, उपनयन संस्कार, हिन्दू धर्म

ऐसे समय जबकि भारत में महिलाओं के प्रति अपराध की ख़बरें दुनिया में ज़्यादा सुनी जा रही हैं, ऐसी किसी भी बात का समर्थन करना स्वाभाविक है जहाँ लड़कियों और महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिल रहा हो.

कई लोगों का कहना है कि उपनयन संस्कार वैदिक काल में लड़कियों और लड़कों दोनों का होता था.

भारत में कहीं कहीं यह परंपरा चलती रही है, जैसे बिहार के बक्सर जिले के मैनिया गांव में पिछले तीन दशक से लड़कियों का उपनयन संस्कार कराया जाता है. लेकिन यह अपवाद ही है.

तारिणी और ईशा के उपनयन संस्कार की विशेषता यह थी कि यह महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिलाने की मांग को बुलंद करने के एक उत्सव का भाग था.

इस उत्सव में भारत के कई भागों और विदेशों से लोग जमा हुए. उपनयन संस्कार से एक दिन पहले गोरखपुर विश्वविद्यालय में एक विचार-गोष्ठी हुई जिसमें महिलाओं को सामान अधिकार देने के विषय पर चर्चा हुई.

सार्वजनिक वादा

लड़कियाँ, उपनयन संस्कार, हिन्दू धर्म

इसमें भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी ने लड़कियों को शिक्षा में बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालय के उपकुलपति और ज़िले के कमिश्नर से सार्वजानिक रूप से वादे करवा लिए.

दोनों कन्याओं के उपनयन संस्कार का नेतृत्व करने वाली आचार्य नंदिता शास्त्री और उनकी छात्राएं इस वैदिक समारोह में छाई रहीं. पुरुष पंडित केवल बीच-बीच में मंत्र बोल देते थे.

वहां उपस्थित बहुत से स्थानीय पुरुष कौतूहल से यह दृश्य देख रहे थे. समझ में नहीं आ रहा था कि कौतूहल दो लड़कियों के उपनयन संस्कार को लेकर था या पुरुष पंडितों की दयनीय स्थिति पर.

अगर आगे बढ़ाना है

दूर से आई एक महिला मेहमान का विचार था कि कन्याओं का संस्कार पुरुष पंडितों से करवाना चाहिए था क्योंकि, पूर्वी उत्तर प्रदेश के इस क्षेत्र में या भारत में कहीं भी, 99 प्रतिशत संस्कार तो पुरुष पंडित ही कराते हैं.

उनका कहना था कि यदि लड़कियों को उपनयन संस्कार के लिए आगे बढ़ाना है तो पुरुष पंडितों को साथ लेकर चलना बेहतर है.

उपनयन संस्कार कौन कराये इस पर बहस हो सकती है लेकिन लड़कियों को ऐसे संस्कार में शामिल करने का विचार सराहनीय है, बावजूद इसके कि यह बराबरी के अधिकार की दृष्टि से मात्र सांकेतिक क़दम ही है.

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