पाकिस्तान नीतिः नरम पड़ेंगे 'सख़्त' मोदी!

नरेंद्र मोदी, नवाज़ शरीफ
    • Author, आकार पटेल
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

भारतीय मीडिया में पाकिस्तान मामले के जानकारों को दो भागों में बांटा जा सकता है.

पहले वे लोग हैं जिन्हें दूसरा पक्ष 'नरम' करार देता है. वे किसी भी सूरत में भारत और पाकिस्तान की नियमित बातचीत की वकालत करते रहते हैं.

उन्हें लगता है कि पाकिस्तान में सेना और सियासी लोगों के बीच का मनमुटाव एक हक़ीकत है और इस रस्साकशी का असर भारत पर पड़ता है.

उनके अनुसार भारत का हित यह सुनिश्चित करने में है कि पाकिस्तान के सियासी लोग अमन और तरक्की के रास्ते पर रहें.

पढ़ें विश्लेषण

हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी
इमेज कैप्शन, अलगाववादी संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता सैयद अली शाह गिलानी.

भारत में मीडिया का एक हिस्सा पाकिस्तान के प्रति नरम रवैया रखता है, इसका मतलब ये है कि पाकिस्तानी नेताओं के साथ बातचीत जारी रखी जाए, उस सूरत में भी जब कोई चिढ़ाने वाला शख्स मौजूद हो- जैसे पाकिस्तान के उच्चायुक्त का कश्मीरी गुटों और लोगों से बातचीत करना.

इसका ये मतलब भी होता है कि बातचीत तब भी जारी रखी जाए जब वाजिब वजहों से लोगों में गुस्सा हो जैसे कि मुंबई में लश्कर-ए-तैयबा का हमला.

पाकिस्तान मामलों के जानकारों में दूसरा वो तबका है जिन्हें 'नरम' लोग 'सख्त' विचारों वाला कहते हैं.

ऐसे 'सख्त' लोगों में वे भी हैं जो ये सोचते हैं कि पाकिस्तान की राजनीति इतनी बड़ी है कि उसे अलग अलग करके नहीं देखा जा सकता है.

वैर का भाव

नियंत्रण रेखा पर गश्त करते भारतीय सैनिक.
इमेज कैप्शन, कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर गश्त करते भारतीय सैनिक.

उनका मानना है कि पाकिस्तान की फौज़ भारत के बारे में राय और नीति पर हमेशा ही अपना असर डालती रहेगी.

इस तरह के किसी भी ढांचे में पाकिस्तान के सियासतदां या तो भारत को परेशान करते रहेंगे या फिर आप्रासंगिक हो जाएंगे और इस सूरत में एक मान्यता ये भी बनती है कि पाकिस्तान भारत को लेकर बैर का भाव हमेशा बनाए रखेगा.

यानी सख़्त पक्ष वाले मानते हैं कि चूंकि ऐसी बात है तो जब हम कर सकते हों तब हमें पाकिस्तान को नज़रअंदाज कर देना चाहिए और जब मुमकिन हो उसे सबक सिखाया जाए और हर हाल में बातचीत से बचा जाए क्योंकि इसका वास्तव में कोई फायदा नहीं होने वाला है.

परमाणु ज़खीरा

पोखरण में दूसरे परमाणु विस्फोट के बाद.

पिछले दो दशकों में दूसरे-दूसरे समूहों ने भारत के सत्ता प्रतिष्ठान की सोच को प्रभावित किया है और पंजाबी पृष्ठभूमि वाले नेता इंद्र कुमार गुजराल और मनमोहन सिंह जैसे कुछ एक अपवादों को छोड़ दें तो भारत में पाकिस्तान को लेकर 'नरम' रुख रखने वाले नेता न के बराबर ही हुए हैं.

भारतीय जनता पार्टी का रुख पाकिस्तान को लेकर हमेशा सख्त रहा है लेकिन इसका कोई सकारात्मक नतीज़ा नहीं निकला है.

वास्तव में यह कहा जा सकता है कि बीजेपी के नेताओं ने एक तरह से भारतीय हितों को नुक़सान पहुंचाया है.

अटल बिहारी वाजपेयी को करगिल में धोखा खाने तक पाकिस्तान के प्रति नरम माना जाता था.

लेकिन ये भी सच है कि वाजपेयी के दौर में ही भारत के हथियारों के ज़खीरे में परमाणु हथियार शामिल किए गए.

चरमपंथी हिंसा

कश्मीर, चरमपंथी हिंसा

शायद इसलिए वायपेयी के विचारों पर 'सख्त' रवैया रखने वाले लोगों का असर था.

यहां यह बात भी माननी होगी कि वाजपेयी के दौर में हुए पोखरण-दो के धमाकों से वास्तव में भारत को कोई फायदा नहीं हुआ.

जबकि हक़ीकत ये है कि ठीक इसके उलट पाकिस्तान पर तुरंत परमाणु विस्फोट करने का दबाव पड़ा और भारत को उन फायदों से हाथ धोना पड़ा जो उसे परंपरागत रूप से था.

परमाणु छतरी के नीचे चरमपंथियों की करतूतें जब तक जारी रहीं जब तक राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ ने इस पर रोक न लगा दी.

आंकड़ें इसकी गवाही देते हैं. पिछले साल कश्मीर में 181 लोग मारे गए थे जबकि इस साल 147 लोग मारे गए हैं. 1990 के बाद से मरने वालों की ये सबसे कम संख्या है. 2001 में कश्मीर में 4507 लोग हताहत हुए थे जबकि 2012 में 117 लोग जिसमें से 84 चरमपंथी थे.

कश्मीर का हल

एक आम कश्मीरी

इसका मतलब हुआ कि कश्मीर में चरमपंथी हिंसा लगभग खत्म होने के कगार पर है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कड़े शब्दों में चरमपंथ को बढ़ावा देने वालों की आलोचना की है लेकिन सच ये है कि भारत के खिलाफ पाकिस्तान की शह पर होने वाली हिंसक घटनाएं कमोबेश खत्म हो गई हैं.

और जब तक कि हम ये मानते रहेंगे कि कश्मीर में होने वाली सभी तरह की हिंसक घटनाओं को पाकिस्तान की शह रहती है तब तक हमें यह भी मानना होगा कि ये हालात कश्मीर मसले के सियासी हल निकलने की सूरत तक जारी रहेंगे.

मुझे लगता है कि 'सख्त' रवैया रखने वाली जमात के नेता के तौर पर मोदी ने बिना ज़्यादा सोच विचार के पाकिस्तान के साथ बातचीत खत्म करने का फैसला कर लिया है.

मोदी की नीति

नवाज़ शरीफ, पाकिस्तान

मोदी ने पाकिस्तान के बारे में सख्त बातें कहीं लेकिन इसी हफ्ते उन्हें न चाहते हुए भी एक 'दुश्मन' नवाज़ शरीफ से हाथ मिलाना पड़ा और यह बातचीत को बंद करने के फैसले के बावजूद हुआ.

लेकिन सवाल उठता है कि क्या उन पर दबाव डाला गया था? क्योंकि यह तो होना ही था और जैसा कि किसी ने कहा था कि इस मसले पर मोदी की नीति का कोई बहुत ज्यादा मतलब नहीं है.

यह केवल दिखाने की कवायद थी. सख्त और अड़ियल रुख खासकर उस वक्त लेना जब यह फायदा का सौदा न हो और समझदारी की बात भी न लगे.

इस तरह से रूठने का हम भारतीयों को क्या फायदा होने वाला है? न तो बीजेपी में और न ही मीडिया में मौजूद उसके 'कट्टर' समर्थकों में कोई ऐसा है जो इस पर रोशनी डाल सकता है.

सीमा पर गोलाबारी

कश्मीर, तनाव, भारत -पाकिस्तान संघर्ष

अरुण जेटली ने दावा किया कि उन्होंने सीमा पर गोलाबारी में हताहत होने वाले भारतीयों की तुलना में उस पार के आम लोगों को ज़्यादा संख्या में मार कर पाकिस्तान को एक कड़ा सबक दिया है.

अगर इसे सबक मान भी लें तो बहुत से भारतीय इससे सहमत नहीं होंगे. क्या वे इस बात की गारंटी दे सकते हैं कि सीमा पर होने वाली गोलाबारी हमेशा के लिए खत्म हो गई है?

और अगर वे ऐसा नहीं कर सकते तो ऐसे वक्त में जब रिश्ते तल्ख हो रहे हों तो माहौल को ठंडा करने की कोशिश करने की बजाय पाकिस्तान से बातचीत न करने का क्या मतलब है.

परिस्थिति बदलेगी!

जम्मू कश्मीर की सुरक्षा परिस्थिति

पिछले 20 सालों में ये स्पष्ट हो चुका है कि सख्त रवैया रखने वाली जमात के विचारों में कुछ भी ठोस बात नहीं है. हालात इसको बयान करते हैं.

भारत इतना भी ताकतवर नहीं है कि वह पाकिस्तान की बाहें मरोड़ सके क्योंकि बीजेपी ने पहले ही इस महाद्वीप को परमाणु रणक्षेत्र बना दिया है.

कश्मीर के मसले पर भारत अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता से इनकार करता रहा है और फिलहाल भारत पाकिस्तान से बात नहीं करेगा.

यह परिस्थिति बदलेगी और बदले हुए हालात में भारत और इस कट्टर समूह को अपना रवैया थोड़ा नरम करना होगा.

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