क्यों घट रही है पारसियों की आबादी?

जियो पारसी अभियान की प्रचार सामग्री.
    • Author, सुशांत एस मोहन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुंबई
  • प्रकाशित

भारत के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने पारसियों को आबादी बढ़ाने के लिए प्रेरित करने का एक नया रास्ता निकाला है, जिसका नाम है 'जियो पारसी' कैंपेन.

इस कैंपेन के तहत देशभर में 62,000 के आंकड़े तक लुढ़क चुके पारसी समुदाय के लोगों को उनकी जनसंख्या बढ़ाने के लिए कहा जा रहा है.

लेकिन पारसी समुदाय के भीतर ही इसका विरोध शुरू हो गया है.

इस कैंपेन के पीछे की हक़ीकत क्या है, पढ़ें पूरी रिपोर्ट

क्यों हो रहें हैं पारसी कम?

जहांगीर पटेल

मुंबई के सबसे पॉश इलाक़ों में से एक फ़ोर्ट एरिया में अपने ब्रिटिश काल के ऑफ़िस में बैठे 'पारसियाना' मैगज़ीन के संपादक जहांगीर पटेल बताते हैं, ''जब 1000 ईसवी से 1300 ईसवी के बीच पारसी भारत आए थे तब भी उनकी आबादी आज के मुक़ाबले ज़्यादा थी. लेकिन पारसी समुदाय की कड़ी नीतियों के चलते ये समुदाय सिकुड़ने लगा.''

पटेल बताते हैं, ''पारसी समुदाय ने बाहर के लोगों के लिए अपने दरवाज़े बंद कर लिए हैं. अगर कोई महिला पारसी समुदाय से बाहर शादी करती है तो वो पारसी नहीं रह जाती. अगर कोई बाहरी समुदाय से यहां शादी करके आती है तो उसे या उसके बच्चों को भी पारसी होने का दर्जा नहीं दिया जाता, ऐसे में पारसी लोग बढ़ेंगे कैसे?''

पारसियाना

जहांगीर पटेल पिछले 40 साल से 'पारसियाना' मैगज़ीन निकाल रहे हैं. वो कहते हैं, ''हमने कई बार अपनी मैगज़ीन के माध्यम से इन बंधनों को तोड़ने की कोशिश की है, लेकिन इसका ख़ास असर नहीं पड़ा. आज भी ग़ैरपारसी व्यक्ति को चाहे वो पुरूष हो या महिला, पारसियों के मंदिर के अंदर आने की सख़्त मनाही है.''

'प्योर' पारसी की तलाश

जियो पारसी अभियान की प्रचार सामग्री

ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में पीएचडी कर रहीं सिमिन पटेल इस कैंपेन की धुर विरोधी हैं.

वो कहती हैं, ''पारसियों कि संख्या बढ़ाने के लिए बच्चे पैदा करने की नहीं, बल्कि पारसी कल्चर को बढ़ाने की ज़रूरत है.''

वो कहती हैं, "हज़ारों साल पुरानी पारसी संस्कृति को बढ़ावा देने की बजाए आप जनसंख्या बढ़ाने की बात कर रहे हैं. आप अभी भी बाहरी दुनिया के दरवाज़े अपने लिए बंद रखना चाहते हैं और ‘प्योर’ पारसी (पारसी मां-बाप से पैदा होने वाले बच्चे) के लिए ज़ोर दे रहे हैं."

पारसियों की इमेज

पारसियों के बारे में कुछ बातें जो प्रचलित हैं वो ये कि वो बेहद अमीर होते हैं, उनके पास विंटेज गाड़ियां होती हैं और वो बेहद बड़े घरों में रहते हैं.

इन बातों पर जंहागीर कहते हैं, "ये बात सच है कि वाडिया,<link type="page"><caption> टाटा</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/09/120831_ratan_tata_retire_pa.shtml" platform="highweb"/></link>, गोदरेज जैसे अमीर घराने पारसियों के हैं लेकिन ये भी सच है कि बस ऐसे चार पांच घराने ही हैं."

साल 2001 की जनसंख्या के आंकड़ों के हिसाब से देश में 69 हज़ार से कम पारसी बचे थे. 'पारसी वेलफ़ेयर स्टेट' के आंकड़ों के हिसाब से अब ये आंकड़ा 60 हज़ार के क़रीब आ चुका है.

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