हक़ीक़त से कोसों दूर नशामुक्ति केंद्र

नशा मुक्ति केंद्र
    • Author, आरज़ू आलम
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

दिल्ली सरकार का महिलाओं और बच्चों के लिए अलग से एक भी नशा मुक्ति केंद्र नहीं है.

सरकारी अस्पतालों के नशा मुक्ति केंद्रों के नियम ऐसे हैं कि बिना दो-तीन सहयोगियों के नशे की शिकार महिला का दाख़िला मुश्किल है.

आकड़ों की हक़ीक़त

नशे की शिकार महिला

हनुमान रोड के फुटपाथ पर रहने वाले बजरंगी कहते हैं, "हम नशे की शिकार अपनी बेटी को लेकर कई सरकारी अस्पतालों में गए लेकिन हमें बाहर कर दिया गया, फिर हमने द्वारका के एक निजी अस्पताल में दाखिला करवाया, लेकिन वहां ज़्यादा फ़ीस के कारण हम बेटी को वापस ले आए."

सरकारी हलफ़नामे के अनुसार 38 जगहों पर नशा मुक्ति केंद्र चल रहे हैं, लेकिन हक़ीक़त में सिर्फ कागज़ों पर.

जहां केंद्र मौजूद हैं वहां भी कहीं छत लटकी पड़ी है तो कहीं पर बिजली के तार लटक रहे हैं.

आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली की आबादी का दो फ़ीसदी हिस्सा नशे की चपेट में है, जिसमें महिलाएं और बच्चों की अच्छी खासी तादाद मौज़ूद है.

दिल्ली महिला एवं बाल कल्याण विभाग के नशा मुक्ति विभाग के निदेशक सुभाष चंद वत्स का कहना है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि दिल्ली में महिला एवं बच्चों के लिए कोई नशा मुक्ति केंद्र नही हैं और सरकार इसके लिए प्रयासरत है.

दिल्ली सरकार की ओर से दिल्ली हाई कोर्ट में जमा किए गए एफिडेविट में नशा मुक्ति केंद्रों की गलत जानकारी दिए जाने के संबंध में उनका कहना है कि वह उस समिति में नहीं थे जब यह सूची बनाई जा रही थी, अगर ऐसा हुआ है तो यह एक गंभीर त्रुटी है.

नहीं है अलग केंद्र

दिलशाद कॉलोनी में रहने वाले राम मनोहर अपने 13 वर्षीय बेटे विकास को लोहे की चेन से बांधकर रखते हैं.

वह अपना दुखड़ा बताते हैं, "विकास पिछले तीन साल से फ्ल्यूड सूंघ रहा है. हम कई नशा छुड़ाने वाले केंद्रों पर गए लेकिन वहां इसे लेने से मना कर दिया गया, एक ने रखा तो वहां लड़कों से बदतमीजी की बात सामने आने के बाद हम इसे वहां से ले आए."

नशे का शिकार बच्चा

क्नॉट प्लेस के फुटपाथ पर रहने वाली शारदा ने कथित तौर पर 17 सितंबर 2014 को नशे की हालत में खुद को आग लगा कर मार लिया था.

आत्महत्या

नशे का शिकार बच्चा

शहरी अधिकार मंच के नाम से गैर-सरकारी संस्था चला रही इंदुप्रकाश बताती हैं, "शारदा को जब 7-8 महीने पहले पता चला की वह गर्भवती है तो वह अपने नशे की लत छोड़ने की कोशिश करने लगी."

वे बताती है, "हम शारदा को लेकर राममनोहर लोहिया और अन्य सरकारी अस्पतालों में गए लेकिन कड़े नियमों और महिलाओं के लिए अलग से कोई विशेष केंद्र ना होने की वजह से उन्हें वाइडब्लूसीए(एनजीओ) सराय रोहिल्ला में दाखिला दिला दिया."

लेकिन उन्होंने बताया कि इंतज़ाम न होने के चलते वहां से भी उन्हें नाज़ुक अवस्था के बावजूद निकल जाने के लिए मजबूर किया गया."

शारदा ने आख़िरकर आत्महत्या के ज़रिए नशे की आदत से मुक्ति पा ली.

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