सियासत में घिरा कुदरत का मारा एक गांव

मालीण गांव
    • Author, देवीदास देशपांडे
    • पदनाम, पुणे से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

दो महीने पहले महाराष्ट्र के पुणे ज़िले के आंबेगाव तालुका के जिस मालीण गांव में प्रकृति का कहर टूटा था, वहां गांव के निवासी तो नदारद है लेकिन यह मुद्दा लगातार चुनावों में छाया है.

30 जुलाई को हुए भूस्खलन में मालीण गांव में 151 लोग मारे गए थे.

मालीण गांव आंबेगाव तालुका के 40 आदिवासी गावों में से एक है. यहां चुनाव का माहौल नहीं के बराबर है.

देवीदास देशपांडे की रिपोर्ट

गांव के सरपंच दिगंबर भालचिन अडिवरे, आहुपे जैसे दूसरे आदिवासी गांवों में जाकर प्रचार कर रहे हैं. गांव में पहले 576 मतदाता थे जिनमें से लगभग आधे गांव में रहते थे.

अब यह संख्या लगभग 70-80 के आसपास रह गई है.

मालीण गांव

भूस्खलन के बाद आरोप लगाया गया था कि पडकई योजना इस दुर्घटना का कारण बनी है.

पूरे महाराष्ट्र में यह योजना केवल आंबेगाव तालुका में चलाई जा रही है. इसके तहत पूर्वोत्तर राज्यों की तर्ज पर झूम पद्धति से खेती की जाती है.

मदद करने से रोका

इस क्षेत्र के विधायक और राज्य विधानसभा के अध्यक्ष दिलीप वलसे पाटिल कहते हैं, "केवल आदिवासी लोगों की खेती अधिक लाभदायक हो, इसलिए मैंने यह योजना सरकार से मंजूर करवाई थी."

उन्होंने आगे बताया, "इस हादसे के बाद विरोधियों के प्रचार के कारण इस योजना को स्थगित किया गया है. इससे नुक़सान आदिवासी लोगों का हुआ है."

मालीन गांव

क्षेत्र के सांसद शिवसेना नेता शिवाजीराव आढलराव पाटिल का आरोप है कि इस योजना में भ्रष्टाचार हुआ है तथा इससे पर्यावरण की हानि हुई है जिससे यह घटना घटी.

वह कहते हैं, “पडकई योजना में किसकी मशीन इस्तेमाल की गई और किसको पैसा दिया गया, इसकी जांच होनी चाहिए.”

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का कहना है कि शिवसेना के लोग दुर्घटना के समय मदद के लिए मालीण नहीं गए वहीं शिवसेना के नेताओं का कहना है कि उन्हें मदद करने से रोका गया.

पुनर्वास

मालीण गांव

जहां भूस्खलन हुआ गांव का वह हिस्सा खाली है. वहां से थोड़ी दूरी पर टीन के शेड बन रहे हैं जहां बचे-खुचे लोगों का पुनर्वास हो रहा है.

कुछ लोग दूसरे गांव में चले गए हैं और कुछ लोग पुणे या मुंबई चले गए हैं.

गांव की ओर जाने वाली सड़क पर लोगों के लिए 25 शेड बनाए गए हैं जबकि यहां 32 शेड की ज़रूरत थी. इन शेडों में खिड़कियां नहीं है जिससे कई लोग नाराज़ भी हैं.

यहां काम करने वाले मजदूरों का कहना है कि उन्हें बताया गया था कि 35 शेड बनाए जाने हैं.

बहरहाल, अभी तक इन शेडों में रहने के लिए कोई ग्रामीण वापस नहीं आया है.

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