जोधपुरः गैस से चलने वाला शवदाह गृह

गैस शवदाह गृह
    • Author, आभा शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

एक पेड़ को बड़ा होने में 50 साल लगते हैं पर जलकर खाक होने में महज 50 मिनट.

यह विचार है ओमनाथ का जो कोई पैंतालीस साल से जोधपुर के एक श्मशान में काम करते हैं.

उन्होंने न जाने कितनी चिताओं में टनों लकड़ियों को धू-धू कर जलते देखा है.

अब सिवांची गेट स्थित इस मोक्षधाम में गैस आधारित शवदाह गृह में बिना लकड़ियों के उपयोग के अंतिम संस्कार हो जाता है.

पढ़िए ये रिपोर्ट विस्तार से

ओमनाथ इसे बहुत अच्छा क़दम मानते हैं.

दाह संस्कार के लिए पेड़ों की कटाई रोकने और पर्यावरण संरक्षण के लिए यह पहल ओसवाल समाज के श्याम कुंभट द्वारा उमराव चंद गौतमचंद चेरिटेबल ट्रस्ट के माध्यम से की गई है.

बेहद कम लागत

गैस शवदाह गृह

जोधपुर शहर के विधायक कैलाश भंसाली बताते हैं कि इस गैस आधारित दाहगृह में एक अंतिम संस्कार के लिए एक गैस सिलेंडर की ज़रूरत होती है और 30 मिनट का समय लगता है.

हाल ही में उनकी बहन के निधन के बाद उनका अंतिम संस्कार यहीं किया गया.

देश में कम ही स्थानों पर ऐसे शवदाह गृह हैं. संभवतः पश्चिम बंगाल में गैस चालित शवदाह गृह पहले से ही हैं. भंसाली के अनुसार, कुंभट को यह प्रेरणा अपने कोलकाता प्रवास के दौरान ही मिली होगी.

बड़े शहरों में विद्युत् चालित शवदाह गृह भी हैं, पर उन्हें स्थापित करने में करीब चार से पांच करोड़ रुपए लगते हैं और संचालन में भी बिजली महँगी होने की वजह से काफ़ी खर्च आता है.

उनका कहना है इस लिहाज से गैस भट्टी वाला शवदाह गृह पर्यावरण संरक्षण और व्यय दोनों ही तरह से बेहतर है.

पर्यावरण सुरक्षित

गैस शवदाह गृह

पारंपरिक रूप से लकड़ियों से शवदाह करने के लिए 200 से 300 किलो लकड़ियों की ज़रूरत पड़ती है, जिसका खर्च कम से कम तीन से पांच हज़ार के बीच पड़ता है.

एक सिलेंडर गैस द्वारा यह काम करीब 400 रुपए में संपन्न हो जाता है. इस पहल का सबने स्वागत किया है. जोधपुर निवासी अनिल भंडारी कहते हैं, "बात पैसों से अधिक पेड़ों को बचाने की है, क्योंकि हरियाली वैसे ही काफी कम होती जा रही है."

जोधपुर के मोक्षधाम में इस गैस चालित शवदाह गृह को स्थापित करने में करीब 35 लाख रुपए का खर्च आया, जिसमें मशीन, गैस कंटनेर, ट्राली और उसका बेस आदि शामिल हैं. इसमें दस बर्नर लगे है.

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