आम बजट 2014: ‘ये यूपीए-3 का बजट है’

    • Author, डॉक्टर भरत झुनझुनवाला
    • पदनाम, अर्थशास्त्री, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
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उम्मीदों के विपरीत नरेंद्र मोदी सरकार का पहला बजट एक खोया हुआ अवसर साबित हुआ है. नई सरकार से आशा थी कि वो अर्थव्यवस्था को एक नया रास्ता दिखाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

अरुण जेटली का बजट 'यूपीए–3' के बजट जैसा दिख रहा है. कुछ चीज़ें अच्छी हैं बजट में, उसके लिए मैं उनका स्वागत करता हूं लेकिन जिन बड़े कदमों के उठाए जाने की उम्मीद थी वो नहीं हुआ.

सरकार ने सबसे बड़ा जो अवसर खोया है वो है नई नौकरियां पैदा करने का.

नौकरियां

सरकार का विज़न हो सकता है कि जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था में सुधार होगा वैसे-वैसे नौकरियां पैदा होंगी, लेकिन ऐसा असल में होने नहीं वाला.

विकास दर जब सात-आठ प्रतिशत थी तब भी नई नौकरियां अपने आप पैदा नहीं हुईं, तो इस वक्त ऐसा होने का सवाल ही नहीं है.

मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना) जैसे कार्यक्रमों में बदलाव करके इन्हें रोज़गार परक बनाना चाहिए था ताकि उद्योगों के लिए नौकरियां देना लाभप्रद हो जाए.

विदेशों में देशी पूंजी

बजट की दूसरी सबसे बड़ी कमी ये है कि देशी पूंजी का विदेशों में जो निवेश हो रहा है उसे मोड़कर भारत लाए जाने पर कोई कदम नहीं उठाए गए.

टैक्स दरों में भी कोई खास बदलाव नहीं है. सिगरेट और तम्बाकू पर कर बढ़ाना अच्छा है.

वहीं गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों, कृषि प्रसंस्करण, कंप्यूटर पार्ट्स और आईटी क्षेत्र से जुड़ी चीज़ों को जो रियायतें दी गई हैं, वे भी सही हैं.

कल्याणकारी स्कीमें

सरकार की कल्याणकारी स्कीमों के बारे में बात की जाए तो इस बजट की रणनीति भी यूपीए जैसी है.

ग़रीबों को सरकार पर आश्रित रखने वाले स्कीमों को बढ़ावा मिला है. उन्हें रोज़गार देने के लिए कोई नई स्कीम नहीं है.

ढांचागत सेवाएं और निर्माण क्षेत्र

निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र कई सालों से मंदी में थे. इन क्षेत्रों में सुधार योजनाएं लागू किए जाने की उम्मीद की जा रही थी.

इस बजट में छोटे और मझोले उद्योगों को टैक्स रियायत दी गई है जो स्वागत योग्य है. लेकिन इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या आयात थी.

चीन से जो सस्ता माल आ रहा है उस पर कस्टम टैक्स बढ़ाने की उम्मीद थी जो नहीं हुआ. इस क्षेत्र में कोई अभूतपूर्व सुधार नहीं होंगे.

कृषि क्षेत्र

किसान को अपनी फसल का सही दाम नहीं मिलता.

अगर सरकार ये सोचती है कि किसान को कर्ज़ देकर वो उसकी हालत में कोई बेहतरी कर रही है तो वो गलत है. किसानों को कर्ज़ के बोझ में दबाना गलत है.

वित्त मंत्री को चाहिए था कि किसान को सही दाम दिलाने के लिए कदम उठाते.

आयकर पर रियायत

टैक्स-फ्री सीमा पचास हज़ार तक बढ़ाई गई है, जिससे मध्यम वर्ग को फ़ायदा होगा. साथ ही होम लोन पर भी टैक्स छूट दी गई है, जो स्वागत योग्य है.

लेकिन ग़रीबों को इस बजट से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा. ये बजट उनके लिए बेमतलब है.

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