मैं अब दिल्ली नहीं जाऊँगाः अन्ना हज़ारे

- Author, देवीदास देशपांडे
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए, रालेगांव सिद्धि से लौटकर
रालेगांव सिद्धि...सिर्फ दो साल पहले देश भर में चर्चित रहे इस गांव में अब कोई चहल-पहल नहीं महसूस होती. सबकुछ सामान्य लगता है. इस बात पर यकीन करना मुश्किल होता है कि भ्रष्टाचार के विरोध की लड़ाई के प्रतीक अन्ना हज़ारे यहीं रहते हैं.
खुद अन्ना हज़ारे अब राजनीति के संबंध में कोई बात नहीं करना चाहते और जनलोकपाल के लिए अपनी लड़ाई स्वयं आगे ले जाना चाहते हैं.
<link type="page"><caption> पढ़ेंः टीम अन्ना में फिर उथल-पुथल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/04/120422_anna_hazare_lokpal_infighting_adg.shtml" platform="highweb"/></link>
पुणे से लगभग 80-90 किलोमीटर दूर रालेगांव में मैं जब उतरता हूं तो वही नजारा देखने को मिला जो महाराष्ट्र के किसी भी आम गांव में होता है. अन्ना हज़ारे की संस्था 'हिंद स्वराज ट्रस्ट' गांव से लगभग एक किलोमीटर दूर है. वहां पहुंचने पर पता चलता है कि अन्ना से मिलने के लिए पास लेना पड़ता है.
संस्था के ऑफ़िस से पास लिया तो पता चला उस दिन मैं केवल आठवां व्यक्ति था जो अन्ना से मिलने आया था. अन्ना के कमरे तक जाने पर पता चलता है कि उनकी तबियत खराब है. सुरक्षा के लिए तैनात एक पुलिसकर्मी बताता है, "आप उन्हें पांच बजे मिल सकते हैं."
पूरा दिन गुजारने के बाद मैं संस्था में फिर से पहुंचता हूं. दिल्ली से आए कुछ लोग वहां मिलते हैं.
अन्ना के सहायकों में से एक व्यक्ति सुबह की एक घटना बताता है, "दिल्ली के एक कर्मचारी ने आकर संस्था के अहाते में अनशन शुरू किया था. केजरीवाल को समर्थन देने की उसकी मांग थी. पुलिस के हस्तक्षेप के बाद उस कार्यकर्ता को वहां से हटाया गया. दिल्ली से कई लोग पिछले हफ़्ते भर से आ रहे है. सीडी कांड से संबंधित कुमार विश्वास भी उनमें से एक थे."
ज़मीन-आसमान का फर्क

आखिर चार घंटों के इंतजार के बाद लगभग छह बजे अन्ना फिर से मुलाकातियों से मिलने का सिलसिला शुरू करते हैं. उम्मीद के मुताबिक दिल्ली से आए कार्यकर्ता पहले अन्ना से मिलते हैं. लगभग आधे घंटे के इंतजार के बाद अन्ना का सहकारी आकर पुकारता है, 'पुणे से आए पत्रकार कौन हैं, आइए.'
जब मैं अंदर पहुंचता हूं तो हरे रंग के सोफे पर बैठे हुए अन्ना को देखकर यकीन नहीं होता. दो साल पहले पुणे की एक सभा में "सरकार की नीयत ठीक नहीं है" की दहाड़ लगाने वाले और साल भर पहले पुणे में एक पत्रकार परिषद में "मेरी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई" की हुंकार भरने वाले अन्ना और इस अन्ना में जमीन-आसमान का फर्क था.
<link type="page"><caption> पढ़ेंः अन्ना का अनशन</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/03/120325_anna_fast_va.shtml" platform="highweb"/></link>
एक बुझी-बुझी सी थकी हुई सी और मुठ्ठी भर ही सही लेकिन उपस्थित लोगों से उकताई हुई शख्सियत. जब लोकपाल बिल के लिए आंदोलन चरम पर था यही अन्ना इसी छोटे से कमरे में हर दिन हजारों लोगों से गर्मजोशी से मिलते थे. उस अन्ना को देखनेवाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह मानना मुश्किल था कि ये वही अन्ना हैं.
मैं अपना परिचय देता हूं और आने का मकसद बताता हूं. कम सुनाई देने के कारण अन्ना कान पर हाथ रखते हैं और मैं वही बात ऊंची आवाज में दोहराता हूं. पूछता हूं कि शाज़िया इल्मी प्रकरण और हाल की अन्य कई घटनाओं पर अन्ना का क्या मत है?
अन्ना जवाब देते हैं, "अरे, मैं आजकल प्रेस से बात नहीं करता. मेरी तबियत खराब चल रही है. मुझे किसी बात पर कुछ नहीं कहना है."
अरविंद को समर्थन?

अरविंद केजरीवाल के बारे में पूछने पर सुबह की अनशन वाली घटना का जिक्र करते हुए अन्ना कहते हैं, "मैंने साफ़ कर दिया है कि केजरीवाल अगर राजनीति छोड़ दें तो मैं उन्हें समर्थन दूंगा."
क्या वे अपना आंदोलन आगे जारी रखेंगे? इसी सवाल के वक्त वे धीरे से कराहते हुए उठते हैं और एक कर्मचारी की सहायता से अंदर के कमरे की ओर चलने लगते हैं. वे धीरे से कहते हैं, "देखते हैं. डॉक्टर ने अनशन करने से मना कर दिया है."
<link type="page"><caption> पढ़ेंः अन्ना के रवैये से हैरान केजरीवाल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/09/120920_anna_new_way_ml.shtml" platform="highweb"/></link>
जबकि बुधवार को ही जारी किए गए एक लिखित बयान में अन्ना ने कहा था, "लोकपाल बिल के लिए वे रालेगांव सिद्धि में ही आंदोलन करेंगे. संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान यह आंदोलन होगा."
वे कहते हैं, "मैं अब दिल्ली नहीं जाऊंगा."
सिर्फ दो मिनट की इस मुलाकात के बाद बाहर आया तो युवाओं का एक समूह और एक देहाती आदमी अहाते में अन्ना से मुलाकात के लिए रुके थे.
अन्ना के सहायक उन्हें बताते है, "अन्ना अब आराम करने गए हैं और वे उनसे कल मिल सकते हैं."
मैं फिर गांव के उसी अंधेरे चौक पर लौटता हूं जहां दोपहर को उतरा था. वहां वैसी ही शांति थी जैसी किसी भी गांव में अमूमन होती है.
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