महात्मा गांधी और चाय

चाय को नशे की चीज बताने का विरोध करता पोस्टर
इमेज कैप्शन, चाय को नशे की चीज बताने का विरोध करता पोस्टर
    • Author, अमिताभ सान्याल
    • पदनाम, पत्रकार, दिल्ली
  • प्रकाशित

अगले साल इस समय तक चाय भारत का राष्ट्रीय पेय बन जा सकता है. मगर सच्चाई ये है कि लगभग 50 साल पहले तक भारतीय लोग चाय के शौकीन नहीं थे.

ये 19वीं शताब्दी के पहले 50 वर्षों में ब्रिटेन की औपनिवेशिक नीतियाँ ही थीं जिनकी बदौलत भारत 2006 तक दुनिया का सबसे बड़ा चाय उत्पादक बना रहा, जबतक कि चीन उससे आगे नहीं निकल गया.

मगर चीन से बिल्कुल अलग, भारत के अधिकतर हिस्से में चाय का ऐसा कोई चलन नहीं था. 50 के दशक तक भारत अपने यहाँ उगनेवाली आधी से अधिक चाय का निर्यात किया करता था. देश के भीतर चाय की माँग के सुस्त रहने के लिए महात्मा गांधी जैसे राष्ट्रवादी नेताओं के कड़े निर्देश भी जिम्मेदार थे.

अब यदि ऐसे कठिन दौर से निकलकर चाय राष्ट्रीय पेय बनने की स्थिति में आ गया है, तो इसके लिए उसे 20वीं शताब्दी की शुरूआत में चाय को बढ़ावा देने के लिए हुए जबरदस्त प्रचार का शुक्रिया अदा करना चाहिए.

वायसराय कर्जन ने चाय के प्रचार के पैसे जुटाने के लिए 1903 में चाय के व्यापार पर टैक्स लगाया और टी सेस बिल लागू कर दिया. इसके पूर्व के दो दशकों में लंदन के चाय बाज़ार में चीन का हिस्सा 70% से घटकर 10% रह गया था. उसकी जगह भारत और सीलोन (श्रीलंका) के उत्पाद ने ले ली थी.

वर्ष 1900 तक औसत ब्रिटिश परिवार में चाय का चलन था, और ये एक बड़ा बाज़ार होने के बावजूद लगातार घट रहा था. ऐसे समय इंडियन टी एसोसिएशन ने, जो कि ब्रिटिश कंपनियों का एक समूह था, उसने चाय के दूसरे सबसे बड़े बाज़ार अमरीका की ओर निगाह डाली. अमरीका, उसका पुराना उपनिवेश जिसने आजादी की आवाज उठाते हुए डेढ़ सौ साल पहले चाय पर टैक्स बढ़ाने का जोरदार विरोध किया था.

1920 के अंत में आर्थिक मंदी के वक्त जब अमरीकी अर्थव्यवस्था और लंदन में चाय के भाव औंधे मुँह जा गिरे, तो टी एसोसिएशन ने भारतीय बाज़ार का रूख किया.

शुरूआत और विरोध

चाय को सेहत और ताकत का पेय बताता पोस्टर
इमेज कैप्शन, चाय को सेहत और ताकत का पेय बताता पोस्टर

उस समय तक चाय केवल पूर्वोत्तर भारत के दो बर्मी मूल की जनजातियों, सिंगफ़ो और खामती, में ही प्रचलित नहीं थी जो कि सदियों से चाय पीते आए थे. इस समय तक चाय कोलकाता में भारत के ऊपरी और मध्यवर्ग के लोगों के बीच भी लोकप्रिय हो चुकी थी, जब कोलकाता ब्रिटिश भारत की राजधानी था और दुनिया का सबसे बड़ा बंदरगाह.

इतिहासकार गौतम भद्र बताते हैं कि 1926 में लिखी गई अमृतलाल बोस की रचना – पिंटू का थिएटर जाना (पिंटुर थिएटर दैखा) – में बताया गया है कि कैसे चाय मिट्टी के बरतनों में दी जा रही थी, ठीक उसी तरह जिस तरह कि अभी भी गाँवों में दी जाती है.

मगर चाय की लत उस तेजी से जोर नहीं पकड़ पा रही थी जैसा कि उत्पादक चाहते थे. ब्रिटेन की वारिक युनिवर्सिटी में आर्थिक इतिहासकार बिष्णुप्रिय गुप्ता बताते हैं कि 1910 में भारत में चाय का बाजार मात्र 82 लाख किलोग्राम था, जबकि इसी साल ब्रिटेन ने 13 करोड़ चाय खरीदी थी. 1920 के दशक भर में चाय की भारत में माँग बढ़कर दो करोड़ 30 लाख किलोग्राम तक ही पहुँच पाई.

चाय की इस कमजोर माँग का एक कारण था राष्ट्रवादी नेताओं की ओर से चाय का उग्र विरोध, जो मुख्य रूप से चाय बागानों में मजदूरी की स्थिति को लेकर हुआ करता था.

इसकी एक झलक 1914 में प्रकाशित शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के बांग्ला उपन्यास परिणीता में मिलती है, जिसकी मुख्य पात्र ललिता चाय नहीं पीती क्योंकि राष्ट्रीय आंदोलन से प्रभावित उसके प्रेमी शेखर को महिलाओं का चाय पीना पसंद नहीं.

चाय की हालत इससे भी नहीं सुधरी जब 1920 के दशक में प्रख्यात केमिस्ट और राष्ट्रप्रेमी आचार्य प्रफुल्ल राय ने ऐसे कार्टून बनाए जिनमें चाय की तुलना जहर से की गई. हालाँकि एक अन्य व्यंग्यकार राजशेखर बसु, जिन्हें पता था कि राय को सुबह-सुबह चाय बेहद पसंद है, उन्होंने लिखा – आचार्य हर सुबह एक लीटर जहर पीते हैं.

इसके बाद महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक, ए की टू हेल्थ, में लिखा कि चाय में रहनेवाला तत्व टैनिन शरीर के लिए अच्छा नहीं होता. उन्होंने चाय को तंबाकू की ही तरह की एक चीज बताया.

चाय को लेकर एक और बात काफी चली हुई थी कि इससे त्वचा काली पड़ जाती है. गोरेपन को लेकर अत्यंत आग्रही लोगों, खासकर उत्तर भारत के लोगों में, इसका और असर पड़ा. तब चाय को लेकर लोगों को विज्ञान की आधी-अधूरी समझ और भरपूर दुष्प्रचार को जमकर परोसा जा रहा था.

प्रचार

चाय बनाने की विधि बताता पोस्टर
इमेज कैप्शन, चाय बनाने की विधि बताता पोस्टर

ऐसी अभूतपूर्व विषम स्थिति में चाय उत्पादकों को यथासंभव मदद चाहिए थी. टी सेस कमिटी का नाम 1933 में बदलकर टी मार्केटिंग एक्सपैन्शन बोर्ड कर दिया गया, जो कि वर्तमान का टी बोर्ड है.

इस बोर्ड ने रेलवे स्टेशनों पर सचित्र विज्ञापन लगाने शुरू किए जिनमें चाय बनाने की विधि बताई जाती थी और ये दावा किया जाता था कि चाय सेहत के लिए अच्छी ही नहीं है बल्कि इससे ताकत भी मिलती है.

1930 और 40 के दशक में बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में शहरी इलाकों में वाहनों पर बड़ी केतलियाँ घुमाई जाती थीं और लोगों को बताया जाता था कि चाय कैसे बनती है. चाय के जहर होनेवाले दावे को ठंडा करने के लिए चाय को उबालने को बढ़ावा दिया गया और भारत में अधिकतर जगह चाय ऐसे ही बनती है.

निजी कंपनियों ने भी अलग प्रचार शुरू किया. दिल्ली में सान चा टी हाउस के मुख्य कार्यकारी संजय कपूर कहते हैं,"आजादी से पहले, ब्रुक बॉण्ड की गाड़ियाँ शहर भर में घूमती थी और कहती थी कि अगर वो दूध लेकर आएँ तो वे चाय बना देंगे."

इन सम्मिलित प्रयासों का असर ये हुआ कि 1930 के दशक तक भारत में चाय की खपत दोगुना हो गई.

लेकिन, इसके बावजूद 1940 के दशक तक भारत में चाय का बाजार काफी सीमित ही रहा. 1947 के बाद चाय एक ऐसा महँगा उत्पाद समझी जाने लगी जिससे कि विदेशी मुद्रा की कमाई हो सकती है, ना कि घर पर पिया जाए.

1950 के दशक में, भारत में उगाई गई 28 करोड़ किलोग्राम चाय का 70 प्रतिशत स्टॉक निर्यात किया गया.

बड़ा बदलाव

सबसे बड़ा बदलाव 60 के दशक में आया जब कामकाजी लोगों ने चाय को हाथोंहाथ लेना शुरू किया.

चाय स्टॉलों की संख्या में अचानक आई तेजी के पीछे गौतम भद्र चाय की एक नई किस्म को कारण बताते हैं जिसमें कि काली चाय की एक ऐसी क्वालिटी तैयार की गई जो सस्ती थी और जिसे आसानी से उबाला जा सकता था.

आज भारत दुनिया का चौथा चाय उत्पादक देश है. नॉर्थ ईस्टर्न टी एसोसिएशन के चेयरमैन और चाय को राष्ट्रीय पेय का दर्जा दिलवाने के लिए प्रयास करनेवाले लोगों में अग्रणी, बिद्यानंद बड़काकोती कहते हैं,"2011 में भारत में 98 करोड़ 80 लाख किलो चाय में से 85 करोड़ किलो चाय की देश में ही खपत हो गई, मगर 1997 से 2007 के बीच चाय की कीमतों को धक्का लगा है. राष्ट्रीय पेय के दर्जे से देश के बाहर हमारी ब्रांडिंग मजबूत होगी."

मगर बड़काकोती की निगाह जहाँ बाहर के बाज़ार पर है, वहीं टी बोर्ड की डेपुटी चेयरमैन रोशनी सेन की निगाह देसी बाजार पर है.

वे कहती हैं,"2007 में हुए एक अध्ययन से पता चलता है कि भारत में चाय की माँग उत्पादन से अधिक तेजी से बढ़ रही है. इसका मतलब कि हमें चाय का आयात करना पड़ सकता है."