नीतीश कुमार के पाला बदलने की वजह क्या है?

नीतीश कुमार
    • Author, प्रदीप कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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नीतीश कुमार एक बार फिर सुर्ख़ियों में हैं. आख़िर उन्होंने वह कर दिखाया, जिसकी चर्चा पिछले कई महीनों से राजनीतिक गलियारे में चल रही थी.

चर्चा यही थी कि नीतीश कुमार फिर से पाला बदलने जा रहे हैं और इसकी तस्दीक तो उसी दिन हो गई थी कि जब जनता दल यूनाइटेड के अंदर आरसीपी के कथित भ्रष्टाचार की ख़बर आने के बाद आरसीपी सिंह ने जनता दल यूनाइटेड और नीतीश कुमार पर हमला किया.

आरसीपी सिंह ने नीतीश कुमार पर हमला करते हुए दो ऐसी बातें कहीं जो खुल्लम खुल्ला नीतीश के विरोधी भी नहीं करते हैं. उन्होंने कहा, "नीतीश कुमार कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते, सात जन्म तक नहीं बन सकते."

इसके अलावा आरसीपी सिंह ने कहा, "जनता दल यूनाइटेड डूबता जहाज़ है. आप लोग तैयार रहिए, एकजुट रहिए.चला जाएगा."

ये दो बातें हैं जिसको लेकर नीतीश कुमार हमेशा से कहीं ज़्यादा सतर्कता बरतते रहे हैं. राजनीतिक तौर पर उनकी महत्वाकांक्षा देश के शीर्ष पद पर रही है. यही वजह है कि जनता दल यूनाइटेड पार्टी के संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने बीजेपी से गठबंधन से अलग होने से पहले प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि नीतीश कुमार में प्रधानमंत्री बनने के तमाम गुण हैं.

नीतीश कुमार की राजनीति को नज़दीक से जानने वाले कई नेताओं ने तस्दीक की है प्रधानमंत्री पद की चर्चा होने परे नीतीश कुमार प्रफुल्लित होते रहे हैं. आरसीपी सिंह भी नीतीश कुमार के बरसों तक सबसे क़रीब रहे हैं, ज़ाहिर होता है कि उनके मनोभावों को समझते हुए ही आरसीपी सिंह ने ये निशाना साधा था.

जैसा कि उम्मीद थी कि उनके इन बयानों का जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन उर्फ़ ललन सिंह ने जवाब दिया. ललन सिंह के प्रेस कांफ्रेंस में भी दो ऐसी बातें हुईं जिससे यह तय हुआ कि बीजेपी और जनता दल यूनाइटेड की राह जुदा होने वाली है.

नीतीश -आरसीपी

ललन सिंह ने पहली बात यही कही कि बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान चिराग पासवान को हमारे नुकसान के लिए खड़ा किया गया था और अब हमारी पार्टी को तोड़ने की कोशिश की गई है.

इसकी चर्चा जनता दल यूनाइटेड के पटना में हुई विधायकों और सांसदों की बैठक में भी हुई. नीतीश कुमार ने खुद अपने नेताओं को संबोधित करते हुए कहा कि हमारा लगातार अपमान किया गया, हमारी पार्टी को लगातार कमज़ोर करने की कोशिश की गई.

जनता दल यूनाइटेड से जुड़े सूत्रों के मुताबिक 'बीजेपी के एक नेता का आरसीपी सिंह के साथ एक ऑडियो बातचीत ने इस अलगाव को बढ़ावा दिया. इस बातचीत में कथित तौर पर आरसीपी सिंह को जनता दल यूनाइटेड में कुछ करने को कहा जा रहा है.'

हालांकि इस तमाम घटनाक्रम को लेकर बीजेपी के किसी बड़े नेता का कोई बयान सामने नहीं आया है. नई दिल्ली एयरपोर्ट से पटना लौटते हुए उड़े हुए चेहरे के साथ शाहनवाज़ हुसैन ने कहा, "हमारी पार्टी किसी को नहीं तोड़ती है, हमलोग केवल अपनी पार्टी को मज़बूत करते हैं."

इससे पहले बिहार में महीने की शुरुआत में बीजेपी के अध्यक्ष जेपी नड्डा के एक बयान को अहम माना रहा था जिसमें उन्होंने कहा था कि आने वाले दिनों में सभी क्षेत्रीय दल ख़त्म हो जाएंगे. इससे पहले भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से महाराष्ट्र में शिवसेना को दो गुटों में विभक्त किया था, उसको लेकर भी जनता दल यूनाइटेड के नीतीश कुमार सशंकित हो गए थे.

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि ये सब अचानक से हुआ है. बिहार की राजनीति पर लंबे समय से नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "आरसीपी सिंह पर ठीकरा फोड़ा जा रहा है, लेकिन नीतीश कुमार इस गठबंधन से बाहर निकलने की पोजिशनिंग लंबे समय से कर रहे थे."

दरअसल 2020 विधानसभा चुनाव के बाद से ही नीतीश कुमार के लिए लगातार असहज स्थिति बनी हुई थी. पार्टी के अंदर भी और उस सरकार के अंदर भी, जिसके वे मुखिया थे.

असहज थे नीतीश कुमार

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सरकार का मुखिया होने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी के मंत्रियों, विधानसभा अध्यक्ष और नेताओं का उन पर लगातार दबाव दिखा. यूनिफॉर्म सिविल कोड और तीन तलाक़ जैसे मुद्दों की चर्चा नीतीश कुमार की राजनीति को असहज करने जैसी ही स्थिति थी. यही वजह है कि गठबंधन से अलग होने से पहले अपने नेताओं के सामने नीतीश कुमार ने कहा भी कि बीजेपी ने अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ा था.

इसकी शुरुआत इस सरकार के बनने के तुरंत बाद शुरू हो गई थी, जब बीजेपी ने नीतीश कुमार के बेहद क़रीबी सुशील कुमार मोदी को बिहार की सरकार से बाहर का रास्ता दिखा दिया था. दरअसल नीतीश कुमार और सुशील कुमार की आपसी अंडरस्टैंडिंग ऐसी थी कि वे एक दूसरे की ज़रूरत को अच्छी तरह समझते थे.

बिहार बीजेपी के कई नेताओं ने 2020 के चुनाव के दौरान भी माना था कि सरकार आएगी लेकिन ये जोड़ी आगे नहीं रहेगी. सुशील कुमार मोदी को बाद में बीजेपी ने राज्य सभा भेज तो दिया लेकिन उनकी कमी बिहार बीजेपी को सोमवार को खली होगी.

तेजस्वी- नीतीश कुमार

सोमवार को बीजेपी नीतीश कुमार से संपर्क करने की कोशिश कर रही थी और वे फोन लाइन पर नहीं आ रहे थे, अगर सुशील कुमार मोदी बिहार की राजनीति में सक्रिय होते तो संपर्क करना आसान होता. सरकार बनने के बाद विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा के साथ नीतीश कुमार की नोंकझोंक को दुनिया भर में लाइव देखा गया था.

जातीय जनगणना को लेकर भी नीतीश कुमार ने अलग रास्ता लिया, लेकिन तब बिहार की बीजेपी ने राष्ट्रीय नेतृत्व से अलग रास्ता लेकर गठबंधन को बनाए रखने की कोशिश की.

इसके बाद ही नीतीश कुमार ने इफ़्तार पार्टी में तेजस्वी यादव के घर पहुंचे और वहां कुछ दूर पैदल चलकर उन्होंने बीजेपी को एक संकेत दे दिया था. इसके बाद लालू प्रसाद यादव के बीमार होने पर नीतीश कुमार ना केवल उन्हें देखने गए बल्कि मीडिया में घोषणा की थी राज्य सरकार लालू जी के इलाज का सारा ख़र्च उठाएगी.

नीतीश कुमार के बीजेपी से अलग होने की इस कहानी में एम्स अस्पताल की भी अहम भूमिका रही है. जहां लालू प्रसाद यादव अपना इलाज करा रहे थे और वहीं जनता दल यूनाइटेड के वरिष्ठ नेता वशिष्ठ नारायण सिंह भी इलाज कराने पहुंचे थे. इन दो समाजवादी धड़े के नेताओं की आपसी मुलाकातों ने महागठबंधन को एकजुट करने में अहम भूमिका निभायी. वशिष्ठ नारायण सिंह उन वरिष्ठ नेताओं में हैं जो राजनीतिक मुद्दों पर नीतीश कुमार से सलाह मशविरा करते रहे हैं.

यूपीए में बढ़ेगी भूमिका?

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वहीं दूसरी तरफ़ पार्टी के अंदर, आरसीपी सिंह की वजह से पार्टी का संकट कम होने का नाम नहीं ले रहा था. पार्टी अध्यक्ष ललन सिंह के साथ उनके रिश्तों में तल्खी आती जा रही थी. कभी नीतीश सरकार में आरसीपी टैक्स का जिक्र तेजस्वी यादव ने भी किया था. उन्हीं आरसीपी सिंह पर पार्टी की ओर से आर्थिक अनियमितता का आरोप भी है, जिसके जवाब में उन्होंने पार्टी से ही इस्तीफ़ा दे दिया है.

इन सबके बाद ही नीतीश कुमार ने मंगलवार, नौ अगस्त को एनडीए का साथ छोड़ते हुए फिर से महागठबंधन का दामन थाम लिया है. नौ अगस्त को राज्यपाल को अपना इस्तीफ़ा सौंपने के बाद नीतीश कुमार सीधे लालू-तेजस्वी यादव के घर पहुंचे और कहा कि हमने एनडीए को छोड़ने का फ़ैसला कर लिया था. उन्होंने यह भी कहा कि 2017 में महागठबंधन से अलग होने का उन्हें अफ़सोस है और वे उसे भूल करके आगे बढ़ने को तैयार हैं.

कहते हैं कि इतिहास खुद को दोहराता है. नीतीश कुमार के इसी बयान के साथ बिहार में राजनीति का एक चक्र पूरा हुआ. 2015 में महागठबंधन की सरकार के वे मुखिया बने थे. लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने आपस में मिलकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह के विजय रथ को रोक दिया था.

बिहार

लेकिन 20 महीने के बाद तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते उन्होंने जुलाई, 2017 में आनन फ़ानन में राजद का हाथ छोड़ते हुए बीजेपी से हाथ मिला लिया था. इसके बाद लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव ने कई मौकों पर उन्हें 'पलटू राम' या 'पलटू चाचा' कहा था.

लेकिन अब एक बार फिर से दोनों एक साथ हैं. इस महाठबंधन में कांग्रेस की भूमिका भी बेहद अहम है. बीजेपी से अलग होने से पहले नीतीश कुमार ने सोनिया गांधी से कम से कम तीन बार लंबी बातचीत की है. राजनीतिक हलकों में इस बात की चर्चा है कि आने वाले दिनों में यूपीए में नीतीश कुमार की अहम भूमिका होने वाली है.

वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार जयशंकर गुप्ता कहते हैं, "महागठबंधन के पिछले समय में भी यह चर्चा चली थी कि यूपीए का पुनर्गठन किया जाए. हालांकि तब उन्होंने अपने लिए कोई भूमिका नहीं मांगी थी. लेकिन इस बार संभव है कि उन्हें कनवेनर जैसा पद दिया जाए."

राजनीतिक चर्चाओं के मुताबिक यूपीए कनवेनर के तौर पर नीतीश कुमार 2024 में विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद का चेहरा भी हो सकते हैं और इसके लिए वे बिहार की कमान तेजस्वी यादव को थमा सकते हैं. नीतीश कुमार एक बार कह भी चुके हैं कि वे सब कुछ रह चुके हैं, बस एक पद है बाक़ी है. उपेंद्र कुशवाहा के बयान से साफ़ है कि ये पद प्रधानमंत्री का ही है.

अब तक का राजनीतिक सफ़र

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नीतीश कुमार की अपनी राजनीति लालू प्रसाद यादव के सहयोगी के तौर पर भी विकसित हुई थी और इसकी शुरुआत 1974 के छात्र आंदोलन से हुई थी. 1990 में लालू प्रसाद यादव जब बिहार के मुख्यमंत्री बने तब नीतीश कुमार उनके अहम सहयोगी थी. लेकिन जार्ज फर्नांडीस के साथ उन्होंने 1994 में समता पार्टी बना ली.

लालू-नीतीश कुमार

पहली बार 1995 में नीतीश कुमार की समता पार्टी ने लालू प्रसाद यादव के राज के जंगलराज को मुद्दा बनाया था, तब पटना हाईकोर्ट ने राज्य में बढ़ते अपहरण और फिरौती के मामलों पर टिप्पणी करते हुए राज्य की व्यवस्था को जंगलराज बताया था. इसी मुद्दे पर विपक्ष ने 2000 और 2005 का चुनाव लड़ा, 2005 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी.

नीतीश कुमार की राजनीतिक ताक़त

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2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद नीतीश कुमार बीजेपी से अलग हो गए थे. 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्हें महज दो सीटें मिली थीं, इसके बाद 2015 में वे राष्ट्रीय जनता दल के साथ एकजुट हुए. 20 महीने बाद वे फिर से बीजेपी के साथ गए और अब एक बार फिर से आरजेडी के साथ हो गए हैं.

दरअसल, व्यक्तिगत तौर पर ईमानदार और सुशासन बाबू की छवि वाले नीतीश कुमार ने 2005 से पहले बिहार के अत्यंत पिछड़े समुदाय और दलितों का एक बड़ा वोट बैंक एकजुट करने में कामयाबी हासिल की और वह लगातार उनके साथ है.

नीतीश कुमार अपने इस वोट बैंक को लेकर कितने सजग हैं, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे जब भी अपनी पार्टी के पदाधिकारियों से मिलते हैं या फिर भरोसेमंद अफसरों को दिशा निर्देश दे रहे होते हैं, तो हमेशा याद दिलाते हैं कि बिहार के अत्यंत पिछड़े समुदाय का ख्याल रखिए.

नीतीश कई बार ये भी कहते हैं कि आप लोगों को मालूम भी है कि इनकी आबादी बिहार की कुल आबादी की एक तिहाई है, हालांकि यह अभी तक रहस्य ही है कि इस वर्ग की आबादी का हिस्सा कितना है.

नीतीश कुमार- मोदी

लेकिन एक मोटा आकलन यह बताता है कि बिहार की आबादी में करीब एक चौथाई आबादी इसी वर्ग की है, इसमें करीब सौ जातियों का समूह है, जिसे नीतीश कुमार ने साधकर ना केवल एकजुट किया बल्कि बीते 17 सालों से बिहार की सत्ता पर इनकी मदद से काबिज रहे और इसके चलते ही वे ऐसे राजनीतिक जादूगर साबित हुए हैं जिनकी पालकी बीजेपी और आरजेडी- दोनों उठाने के लिए तैयार हैं.

और इसी वजह से यह सवाल भी बेमानी है कि पिछली बार महागठबंधन का साथ छोड़ने की वजहें क्या थीं और इस बार बीजेपी का साथ छोड़ने की वजहें क्या हो सकती हैं.

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