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किसान आंदोलन की कामयाबी क्या जन आंदोलनों को भी देगी नया जीवन?
भारत में किसान आंदोलन के एक साल पूरे हो रहे हैं. नरेंद्र मोदी सरकार ने सितंबर, 2020 में तीन विवादास्पद कृषि क़ानून लागू करने का फ़ैसला लिया था. इन तीनों क़ानूनों के विरोध में 25-26 नवंबर, 2020 से दिल्ली की सीमाओं पर जुट कर किसानों ने अपना आंदोलन शुरू किया था.
इस आंदोलन के एक साल पूरे होने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि क़ानूनों को वापस लेने का एलान किया है, लेकिन दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का प्रदर्शन अब भी जारी है.
इन तीन क़ानूनों की वापसी की संवैधानिक प्रक्रिया भी शुरू हो गई है. बुधवार को मोदी सरकार के मंत्रिमंडल ने इन क़ानूनों की वापसी के बिल को मंजूरी दे दी है और अब इसे संसद के पटल पर रखा जाएगा.
लेकिन किसान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे संयुक्त किसान मोर्चा ने इन क़ानूनों को संसदीय प्रक्रिया के ज़रिए निरस्त करने के साथ किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी पर क़ानून बनाने की मांग की है. साथ ही उन किसानों के परिजनों के लिए मुआवज़े की भी मांग की है जिन्होंने आंदोलन के दौरान अपनी जान गवाईं हैं.
लेकिन जिस तरह से केंद्र सरकार ने इन तीनों क़ानून को वापस लिया, उससे देश भर में यह संदेश ज़रूर गया कि किसानों ने मोदी सरकार को झुकने पर मज़बूर कर दिया. हालांकि किसान आंदोलन से जुड़े लोगों और कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार ने ये फ़ैसला उत्तर प्रदेश और पंजाब के विधानसभा चुनावों को देखते हुए लिया है.
क्या दूसरे आंदोलनों को मिलेगी जान?
अब सरकार ने फ़ैसला चाहे जिस रणनीति के तहत लिया हो लेकिन मोदी सरकार ने कृषि क़ानूनों को लेकर जिस तरह से अपने क़दम पीछे खींचे हैं, उससे देश भर में चल रहे दूसरे आंदोलनों को एक नया जीवन मिल गया है.
सामाजिक आंदोलन और सूचना के अधिकार क़ानून से जुड़े रहे निखिल डे इस बारे में कहते हैं, "निश्चित तौर पर ये किसानों की जबरदस्त जीत है. यह सरकार जिस तरह से अड़ गयी थी और जिस तरह से उसने इन क़ानूनों को अपने अहम का मुद्दा बना लिया था, उसे देखते हुए इन क़ानूनों को वापस लेना आम किसानों की जीत है. हालांकि ये ज़रूर है कि ये फ़ैसला चुनावों को देखते हुए लिया गया है. लेकिन इसने दूसरे आंदोलनों के साथियों को मज़बूती दी है."
निखिल डे के मुताबिक़, "किसान आंदोलन की कामयाबी की सबसे बड़ी वजह ये नहीं थी कि किसान दिल्ली की सीमाओं पर जमे हुए थे. उनके अनुसार, इस आंदोलन का दायरा लगातार बढ़ रहा था और यही मोदी सरकार के लिए चिंता की असल वजह बन गया था."
वे कहते हैं, "जो किसान दिल्ली की सीमाओं पर इस आंदोलन में शामिल हो रहे थे, वो अपने गांव वापस लौटने पर वहां भी लोगों को किसान आंदोलन के बारे में बता रहे थे. बात धीरे-धीरे ज़मीनी स्तर पर पहुंचने लगी थी. इससे सरकार के विरोध में एक माहौल बनने लगा था. इसने सरकार को कहीं ज़्यादा डराया है."
क्या इसके पीछे सरकार की रणनीति है?
वहीं मुंबई में सामाजिक आंदोलनों का चेहरा माने जाने वाले मयंक गांधी मोदी सरकार के इस फ़ैसले को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं.
उन्होंने बताया, "कृषि क़ानूनों की वापसी का फ़ैसला बिल्कुल राजनीतिक रणनीति के तहत लिया गया फ़ैसला है. इसे किसानों की जीत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. पंजाब और उत्तर प्रदेश के चुनाव अगर दो साल बाद होते तो किसानों का आंदोलन दो साल तक जारी रहता और ये लोग क़ानून वापस नहीं लेते."
हालांकि निखिल डे ये मानते हैं कि किसानों के इस आंदोलन से भारत के दूसरे तमाम आंदोलनों को काफ़ी कुछ सीखना चाहिए.
वे बताते हैं, "किसानों के इस आंदोलन की सबसे ख़ास बात यह रही है कि यह आंदोलन पूरी तरह से अराजनीतिक बना रहा. रास्ते में तमाम तरह की अड़चनें और चुनौतियां आईं, लेकिन इन लोगों ने हिम्मत नहीं हारी."
निखिल डे कहते हैं, "इस आंदोलन को आम किसानों का साथ मिला. इन लोगों ने यह दिखाया कि जहां रोकोगे, वहीं बैठकर हमारा आंदोलन शुरू हो जाएगा. जगह-जगह किसान पंचायत शुरू होने लगे थे. यह प्रतिबद्धता आख़िर तक बनी हुई है. जन आंदोलनों की यही ख़ासियत होती है कि वे नदी जैसे होते हैं, वह अपने आप चलती है, चलाई नहीं जाती."
दूसरे आंदोलन को इससे सीखने की ज़रूरत
वैसे मयंक गांधी और निखिल डे, दोनों का ही मानना है कि किसान आंदोलन से सबक़ लेते हुए दूसरे आंदोलन ख़ुद को मज़बूत ज़रूर कर सकते हैं. हालांकि मयंक गांधी ये भी मानते हैं कि मौजूदा सरकार केवल चुनावी जोड़-घटाव की ही भाषा समझती है, आंदोलनों की भाषा को नहीं.
वैसे किसान आंदोलन से पहले देश में नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) और एनआरसी का मुद्दा भी आंदोलन का रूप ले चुका था.
नागरिकता संशोधन क़ानून के मुद्दे पर भी दिल्ली के शाहीन बाग़ सहित देश भर में कई जगहों पर आम लोगों ने सड़कों पर उतर कर आंदोलन का समर्थन किया. हालांकि उस आंदोलन को एक धर्म विशेष के चश्मे से देखा गया और कोविड संक्रमण की लहर के आने के बाद इस आंदोलन की ताप कम हो गई.
निखिल डे कहते हैं, "नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ बड़े तबक़े में महिलाएं सड़कों पर निकलीं. वे महिलाएं जो कभी घरों से बाहर नहीं निकलीं थीं, अपने घरों से बाहर निकल कर सड़कों पर चली आयीं. वे न केवल संविधान की ताक़त को समझने लगी थीं, बल्कि लोगों को अपने हक़ों के बारे में भी बताने लगी थीं. लेकिन समाज को बांट कर उस आंदोलन को कमज़ोर करने की कोशिश की गई. लेकिन ये तरीक़ा किसान आंदोलन में नहीं चला."
क्या फिर गरमाएगासीएए और कश्मीर का मुद्दा ?
कृषि क़ानूनों की वापसी से एक बार फिर सीएए का मुद्दा गरमा रहा है. मोदी सरकार के तीनों क़ानूनों की वापसी पर असदुद्दीन ओवैसी ने प्रधानमंत्री पर तंज़ कसते हुए कहा, "यह किसान आंदोलन और किसानों की सफलता है. वह दिन दूर नहीं जब मोदी सरकार सीएए क़ानून भी वापस लेगी."
इस क़ानून का सबसे ज़्यादा असर पूर्वोत्तर के राज्यों में देखे जाने की आशंका जताई गई थी. ख़ासकर असम में अभी भी ये एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है.
इस क़ानून का विरोध करने के चलते ही असम के सामाजिक कार्यकर्ता और विधायक अखिल गोगोई को नेशनल इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी (एनआईए) ने दिसंबर 2020 में यूएपीए क़ानून के तहत गिरफ़्तार किया था. छह महीने जेल में रहने के बाद उन पर जुलाई में मुक़दमा हटा लिया गया. अखिल गोगोई संयुक्त किसान मोर्चा में भी शामिल हैं.
अखिल गोगोई इस बारे में कहते हैं, "किसान आंदोलन की कामयाबी के बाद हम लोगों को बड़ा हौसला मिला है. हम लोग अब नागरिकता संशोधन क़ानून के लिए लोगों को एकजुट कर रहे हैं. आप यक़ीन नहीं करेंगे कि असम की अधिकांश जनता इस क़ानून के ख़िलाफ़ है. यही स्थिति पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों की है. हम लोग कोशिश कर रहे हैं कि एकजुट होकर क़ानून के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएं."
'आंदोलन में कभी समझौता नहीं करना चाहिए'
किसान आंदोलन की कामयाबी से मिली सबसे अहम सीख के बारे में अखिल गोगोई बताते हैं, "किसान आंदोलन इसलिए कामयाब रहा, क्योंकि आंदोलन के शीर्ष नेताओं ने कोई समझौता नहीं किया. उन पर तरह-तरह के दबाव और प्रलोभन थे. लेकिन शीर्ष नेताओं ने आंदोलन को जमाए रखा. सरकार ने कितने ही अत्याचार किए लेकिन उनकी प्रतिबद्धता नहीं डिगी. देश के दूसरे तमाम आंदोलनों को यही सीख लेनी है कि लड़ाई में कभी समझौता नहीं करना है."
मोदी सरकार 2014 में केंद्र में आई और लगातार दो चुनावों में सरकार को जिस तरह का बहुमत मिला, उससे एक धारणा बन चुकी थी कि आम लोगों के विरोध प्रदर्शनों का असर इस सरकार पर नहीं पड़ता. हालांकि बीते सात सालों के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में कुछ न कुछ विरोध प्रदर्शन देखने को ज़रूर मिलता रहा.
इन आंदोलनों का ही असर रहा है कि इसी सरकार ने कृषि क़ानूनों से पहले एससी-एसटी एक्ट में संशोधन और विश्वविद्यालयों में नियुक्ति संबंधी 13 सूत्री रोस्टर पर अपने फ़ैसलों को वापस लिया. इसके अलावा भूमि अधिग्रहण क़ानून को भी मोदी सरकार को वापस लेना पड़ा था. लेकिन दूसरे कई आंदोलनों को लेकर सरकार का रवैया काफ़ी हद तक कठोर दिखने वाला रहा.
चाहे कश्मीर में धारा 370 को ख़त्म करना रहा हो या फिर जम्मू और कश्मीर राज्य का अस्तित्व ख़त्म करना, इन सबके ख़िलाफ़ स्थानीय स्तर पर लोगों में आक्रोश भी दिखा. हालांकि केंद्र सरकार कश्मीर में आम लोगों के सामने विकास के नए रास्ते खुलने का हवाला लगातार दे रही है. लेकिन आम कश्मीरियों का भरोसा मोदी सरकार अब भी पूरी तरह से हासिल नहीं कर सकी.
निखिल डे कहते हैं, "कश्मीर के मामले में हम लोगों ने देखा कि कैसे वहां की आम जनता के विचारों को साथ नहीं लिया गया. लोकतंत्र का तकाज़ा तो यही है कि वहां के लोगों से सलाह-मशविरा करने के बाद ही फ़ैसला लिया जाए."
अखिल गोगोई कहते हैं, "सीएए आंदोलन को सरकार ने सांप्रदायिक रंग देकर कमज़ोर कर दिया लेकिन किसान आंदोलन को हर तरह से बदनाम करने कि उनकी कोशिशें कामयाब नहीं हुई. वो इसलिए कि किसान आंदोलन के नेताओं का फ़ोकस बिल्कुल स्पष्ट था."
मुद्दे और भी हैं
इन बड़े मुद्दों के अलावा देश में कई अन्य मुद्दे और आंदोलन लंबे समय से लगातार प्रासंगिक बने हुए हैं. इनमें श्रम क़ानूनों का उदारीकरण, निजीकरण का विरोध, जातिगत जनगणना कराने की मांग, नई शिक्षा नीति और आरक्षण को ठीक से लागू करने जैसी मसले भी हैं.
इनके साथ ही जल, जंगल और ज़मीन बचाने से लेकर रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था के अलावा क़ानून, प्रशासन और भ्रष्टाचार जैसे आम लोगों से जुड़े मुद्दे भी चर्चा में बने हुए हैं.
बड़ी-बड़ी सरकारी कंपनियों की बिक्री के ख़िलाफ़ भी आंदोलन ज़ोर पकड़ सकता है. देशभर में लाखों की संख्या में लोग ठेके पर काम कर रहे हैं, उनकी आपसी एकता भी कभी आंदोलन का रूप ले सकती है.
दिल्ली यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. लक्ष्मण यादव कहते हैं, "किसान आंदोलन की कामयाबी के सांकेतिक मायने हैं. मोदी सरकार जब से सत्ता में आई है, तब से आम लोगों में आंदोलन की जो समझदारी थी, उसने उस पर अंकुश लगाया है.''
वे कहते हैं, ''सरकार लोगों को अराजनीतिक बनाने की कोशिश कर रही है और तो और सबकी समझदारी को राष्ट्रवाद के चश्मे से देखा जा रहा है. ऐसी सरकार का झुकना तो अहम है ही."
लक्ष्मण यादव ने बताया, "उच्च शिक्षा में समाज के पिछड़े और दलितों को उनका हक़ नहीं मिल रहा. ऐसे दौर में सरकार नई शिक्षा नीति लेकर आई है, जो शिक्षा को निजीकरण की ओर ले जा रही है और आरक्षण को कमज़ोर कर रही है.''
उनके अनुसार, किसान आंदोलन ने ये दिखाया है कि हम लोग नई शिक्षा नीति पर विरोध प्रदर्शन करके सरकार को इसे भी वापस लेने पर मज़बूर कर सकते हैं.
'लेकिन सभी आंदोलन ऐसे रूप नहीं ले सकते'
हालांकि निखिल डे ये भी दोहराते हैं कि कोई दूसरा आंदोलन किसान आंदोलन जितना बड़ा हो जाए, ऐसा न तो ज़रूरी है और न ही संभव.
वे कहते हैं, "किसान आंदोलन तो पूरी दुनिया में अपनी तरह का अकेला आंदोलन है. स्वतंत्र भारत में इस तरह का आंदोलन पहले कभी नहीं हुआ. ऐसे में दूसरे आंदोलन भी इस जैसा बन पाएंगे, इसकी उम्मीद नहीं करनी चाहिए. लेकिन छोटे-छोटे आंदोलन भी न्याय की लड़ाई लड़ सकते हैं, ये हौसला भी होना चाहिए."
कोविड संक्रमण के दौरान, देश में स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली भी एक अहम मुद्दा बना रहा. पिछले कुछ सालों में बेरोज़गारी की दर भी लगातार बढ़ी है.
ऐसे में समाज का उपेक्षित तबक़ा चाहे तो किसान आंदोलन से सबक लेते हुए आंदोलन का रास्ता चुन सकता है. किसान आंदोलन की कामयाबी ने एक तरह से इन आंदोलनों को एक नई ताक़त ज़रूर दी है.
इस बारे में निखिल डे कहते हैं, "जो आंदोलनजीवी कह रहे थे, अब उन्हें माफ़ी मांगनी पड़ रही है. यही है आंदोलनों की ताक़त."
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