बिहार चुनाव के 'कुरुक्षेत्र' में राजनीतिक मुद्दों का 'महाभारत' - विश्लेषण

तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार
    • Author, मणिकांत ठाकुर
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित

जातीय जकड़न से मुक्त मतदान की जो हवा अचानक चुनावी मैदान में रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे ज़रूरी मुद्दों को लेकर ज़ोर पकड़ती हुई-सी दिखने लगी थी, उसका रुख़ 'जंगलराज के युवराज' वाले जुमले से मोड़ देने की सत्ताधारी खेमे की कोशिशें भी परवान चढ़ रही हैं.

इस पर और बातें करने से पहले आइए, बिहार विधानसभा चुनाव संबंधी मतदान के दूसरे दौर में जिन 94 सीटों के लिए आगामी मंगलवार को वोट डाले जाएँगे, उस पर थोड़ी चर्चा कर लें. इस समय इन 94 सीटों में से 50 पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का और 41 पर 'महागठबंधन' का क़ब्ज़ा है.

यहाँ इस बात को ध्यान में रखना ज़रूरी है कि पिछले विधानसभा चुनाव (2015) में लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और कांग्रेस का 'महागठबंधन' 94 में से 70 सीटें जीत कर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को कड़ी शिकस्त देने में कामयाब हुआ था.

इस बार जेडीयू के साथ है बीजेपी, और दोनों का यह सत्ताधारी गठबंधन अपनी आंतरिक तनातनी को किसी तरह संभालते हुए 'महागठबंधन' से सीधी टक्कर झेल रहा है.

दूसरे चरण के मतदान वाले क्षेत्रों में आरजेडी ने 56, बीजेपी ने 46, जेडीयू ने 43 और कांग्रेस ने 24 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे हैं. वामपंथी दलों में सीपीआई-एमएल के 6, सीपीआई के 4 और सीपीएम के भी 4 प्रत्याशी इन्हीं क्षेत्रों से चुनाव लड़ रहे हैं.

सबसे बड़ी चुनौती जेडीयू के सामने है, क्योंकि पिछले चुनाव में उसकी जीती हुई 30 सीटों को इस बार बचाने के लिए आरजेडी जैसा मददगार तो उसके साथ अब है नहीं.

तेजस्वी यादव

साथ ही नीतीश सरकार के ख़िलाफ़ दिखने लगे जनाक्रोश, चिराग़ पासवान और तेजस्वी यादव की तरफ़ से सीधे नीतीश कुमार पर तेज़ हुए हमले और परोक्ष रूप से बीजेपी से भी अनबन जैसी मुश्किलों का दबाव जेडीयू को झेलना पड़ रहा है.

पहले दौर के मतदान वाले 71 विधानसभा क्षेत्रों में वोटिंग के रुझान से मिले संकेतों को 'महागठबंधन' के अनुकूल और एनडीए के प्रतिकूल बताया जा रहा है.

हालांकि इसे बहुत अचरज भरा इसलिए नहीं माना जा सकता, क्योंकि पहले दौर में जिन इलाक़ों में मतदान हुए उनके ज़्यादातर हिस्से आरजेडी और वामपंथी सीपीआई-एमएल के प्रभाव वाले क्षेत्र रहे हैं.

लेकिन हाँ, पिछले चुनाव में आरजेडी को इस इलाक़े में मिली 38 सीटों की तुलना में इसबार अगर 40 से अधिक सीटें मिल जाने की संभावना प्रेक्षक बता रहे हैं, तो यह महागठबंधन के लिए बड़ी बात है.

बड़ी बात इसलिए, क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में जेडीयू के सहयोग से आरजेडी को इस क्षेत्र में 38 सीटें मिल पाई थीं. चलिए, अब लौटते हैं उसी 'सत्ताधारी खेमे की कोशिशों' वाली बात पर, जिसका ज़िक्र शुरुआत में किया गया है.

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कहते भी हैं कि चुनावी बयार कब किस ओर पलट जाए, कहा नहीं जा सकता. यानी एक नई बात आम चर्चा में तेज़ी से उभर आई है.

दूसरे चरण के मतदान वाले क्षेत्रों की चुनावी हवा कुछ इस तरह बदलती हुई-सी बताई जा रही है, जो पिछले कई दिनों से तेजस्वी यादव को सियासी रफ़्तार दिला रही थी.

दस लाख लोगों को सरकारी नौकरी, बदहाल शिक्षा/चिकित्सा व्यवस्था में सुधार और भ्रष्टाचार पर कारगर चोट जैसे मुद्दों को केंद्र में रख कर धुआँधार प्रचार अभियान में जुटे तेजस्वी यादव को देख लोगों को लगने लगा जैसे चुनावी मैदान में वही छाए हुए हों.

पहले दौर का मतदान आते-आते जब चुनाव में बीजेपी और जेडीयू के पिछड़ने की सरेआम चर्चा होने लगी, तब दोनों दलों ने, लगता है, अपनी अंदरूनी मार-पछाड़ को दरकिनार कर के अस्तित्व-रक्षा की जुगत भिड़ाने में जुट गए.

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सत्तापक्ष में इस कला के मर्मज्ञ और असरदार जुमला गढ़ लेने में सबसे सक्षम सिद्ध हो चुके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास बिहार एनडीए ने अपना 'त्राहि माम' संदेश पहुँचाया.

फिर क्या था, प्रधानमंत्री ने दरभंगा, मुज़फ़्फ़रपुर और पटना की अपनी चुनावी सभाओं में तेजस्वी यादव को सीधे निशाना बना कर 'जंगलराज के युवराज' वाला ऐसा बॉम्बशेल छोड़ा कि लालू राज का ख़ौफ़ दिखाने संबंधी उनकी रणनीति मीडिया में उछल-उछल कर लालू विरोधी जमातों पर असर डालने लगी.

प्रधानमंत्री ने अपने पद का वज़न हल्का हो जाने देने की हद तक जा कर ये भी कह डाला कि अपने परिवार को हज़ारों करोड़ का मालिक बनाने वालों और रंगदारी वसूल करने वाले अराजक तत्वों को फिर सत्ता में आने से रोकिए.

ज़ाहिर है कि जनजीवन से जुड़े बुनियादी सवालों या राज्य में बढ़ते अपराध और भ्रष्टाचार पर कोई जवाब जिस सत्ता के पास नहीं हो, वह अपने वर्तमान को छोड़, औरों के भूतकाल से लोगों को डराने लगता है.

उधर, तेजस्वी ने भी चुनावी भाषण करते हुए अति उत्साह में बाबूसाहब के सामने ग़रीबों के सीना तान कर चलने वाले लालूराज का ज़िक्र कर दिया, जिसे जेडीयू-बीजेपी ने खूब प्रचारित कराया.

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बिहार की राजनीति का एक सच ये भी है कि चुनाव के समय जाति और धर्म के आधार पर किसी ध्रुवीकरण का जवाबी ध्रुवीकरण (काउंटर पोलराइज़ेशन) होने लगता है.

ऐसा होते हुए कई बार देखा गया है. इस बार चूँकि महागठबंधन के रणनीतिकारों ने असली मुद्दों को भटकाने वाले प्रयासों से नहीं उलझने की ठान ली है, इसलिए मामला अभी तक बिगड़ा नहीं है. लेकिन अगले दो चरणों के मतदान में नहीं बिगड़ेगा, जैसी कोई गारंटी भी नहीं है.

दूसरी तरफ़, बीजेपी और जेडीयू के बीच जो मतभेद से अधिक मनभेद सार्वजनिक होने लगे थे, उन्हें बयानों के पैबंद से फ़िलहाल ढँक दिया गया है.

अपने मुख्यमंत्री पद को और अगले पाँच साल तक सुनिश्चित कराने के लिए नीतीश कुमार ने भाजपाई दिग्गजों को भले ही झुका लिया हो, पर कमल के फूल में तीर के शूल कितने गहरे हैं, इसका जवाब और मरहम दोनों ही आने वाले वक़्त के पास है.

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