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ऊंची शिक्षा के बाद भी भिखारी बन गये ये लोग
ओडिशा के पावन शहर पुरी में ज़िला प्रशासन ने 'भिखारी-मुक्त पुरी' अभियान शुरू किया है. यहां भीख मांगने वाले सभी लोगों को उनके पुनर्वास के लिए बनाए गए 'निलाद्रि निलयों' में स्थानान्तरित किया जाएगा. इन पुर्नवास केंद्रों में उन्हें मुफ़्त खाना, कपड़ा, बिस्तर, चिकिस्ता और अन्य तमाम सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं. इसका ख़र्च सरकार की तरफ़ से फ़िलहाल चयनित पाँच एनजीओ कर रहे हैं.
साथ ही ये ग़ैर-सरकारी संगठन भिखारियों की पहचान करने में समाज कल्याण अधिकारी की मदद भी कर रहे हैं.
पुरी के ज़िलाधिकारी बलवंत सिंह ने बीबीसी को बताया कि इनके ख़र्च के लिए सरकार की ओर से चुने गए पाँच एनजीओ को प्रति व्यक्ति 3,400 रुपये मासिक दी जाती है.
उन्होंने कहा, "यह पुरी को एक 'हेरीटेज (विरासत) शहर" बनाने के लिए बीते वर्ष शुरू की गई एक योजना का हिस्सा है. एक विश्वस्तरीय विरासत शहर में भिखारियों का होना ठीक नहीं लगता. इसलिए हमने यह अभियान शुरू किया है. हमारी कोशिश यही है कि उन्हें हमेशा के लिए भिक्षावृति से निवृत किया जाए और जहां संभव हो उन्हें उनके परिवार के पास भेज दिया जाए."
भिखारियों का वर्गीकरण कर उन्हें उनके लिए विशेष रूप से बने पुनर्वास केंद्रों में भेजने से पहले उन्हें पुरी शहर में शहरी बेघरों के आश्रयस्थल में कुछ समय के लिए दिन रखा जाता है.
इस 'बेस कैम्प' की संचालिका लोपामुद्रा पाइकराय ने बताया कि 3 मार्च से शुरू हुए इस अभियान के पहले पाँच दिनों में कुल 146 भिखारियों को वहाँ लाया गया.
ज़िला सामाजिक सशक्तिकरण अधिकारी त्रिनाथ पाढ़ी के अनुसार शहर में क़रीब 700 भिखारी हैं.
धरित्री चटर्जी
'बेस कैंप' में जब मैं धरित्री चटर्जी से मिला तो भौंचक्का रह गया. गोरा बदन, तीखे नैननक्श, बॉब कट बाल और फ़र्राटे से अंग्रेज़ी बोलनेवाली यह 54 वर्षीय महिला किसी भी दृष्टि से भिखारिन नहीं लग रहीं थीं. लेकिन सच्चाई यही है कि कालीघाट, कोलकाता की रहनेवाली यह महिला जगन्नाथ मंदिर के पास भिक्षावृति करती हुई पाई गईं और फिर उन्हें यहां लाया गया.
धरित्री कहतीं हैं, "प्रभु जगन्नाथ के प्रति मेरे मन में बचपन से ही एक अद्भुत आकर्षण था. अपनी सांसारिक ज़िम्मेदारियों को पूरा करने के बाद पिछले मई में चक्रवात 'फोनी' के समय मैं पुरी आ गई और फिर यहीं बस गई."
उनसे बातचीत कर लगा कि आध्यात्मिक कारण के अलावा उनके यहाँ आने का शायद कोई पारिवारिक कारण भी था लेकिन अपने परिवार के बारे में खुलकर बात करने से वे कतरा रहीं थीं तो मैंने जोर नहीं दिया.
हां, उन्होंने इतना ज़रूर बताया कि वे शादीशुदा हैं और उनका एक 22 साल का बेटा है. शास्त्रीय संगीत में निपुण यह महिला कभी वेल्लोर के सीएमसी अस्पताल में काम किया करती थीं.
श्रीजीत पाढ़ी
पुरी में शिक्षित भिखारियों का यह अकेला उदाहरण नहीं है. हाल ही में एक ऐसे शख्स को जगन्नाथ मंदिर के पास भीख मांगते हुए पाया गया जो कभी एक मेधावी छात्र था.
श्रीजीत पाढ़ी नाम के इस शख्स ने कटक के रेवेनसा कॉलेज से बेहतरीन नंबरों के साथ इकोनॉमिक्स में एमए किया है. इतना ही नहीं, रेवेनसा में पढ़ाई के दौरान ये कटक-भुवनेश्वर के मौजूदा पुलिस कमिश्नर सुधांशु सारंगी के क़रीबी दोस्त रह चुके हैं.
जब सारंगी और उनके बैच के कुछ अन्य मित्रों को श्रीजीत के बारे में पता चला तो उन्होंने श्रीजीत कि खोज शुरू की और आख़िरकार उहें ढूंढ ही लिया. लेकिन उन्हें देखकर कोई सोच भी नहीं सकता कि ये शख्स एक पोस्ट ग्रैजुएट हैं और एक ज़माने में बेहतरीन छात्र हुआ करते थे.
लंबे, जटानुमा बाल, लंबी दाढ़ी, मैले कुचैले कपड़े और पागलों जैसा बर्ताव. श्रीजीत के बैचमेट्स ने उन्हें पहले पुरी ज़िला अस्पताल में भर्ती किया. यहाँ से उन्हें कटक के एससीबी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के मानसिक रोग विभाग में भेज दिया गया, जहां फ़िलहाल उनका इलाज चल रहा है.
श्रीजीत के परिवारवालों के अनुसार सिविल सर्विस की परीक्षा में नाकामी के बाद वे काफ़ी निराश और हताश हो गए और धीरे-धीरे उनमें मानसिक असंतुलन के लक्षण दिखाई देने लगे.
श्रीजीत के कटक के अस्पताल में भर्ती हुए अभी एक हफ़्ता भी नहीं हुआ. लेकिन इस कम समय में भी उनमें काफ़ी बदलाव आ गया है. जटानुमा बाल अब नदारद हैं. दाढ़ी भी क़रीने से काट दिए गए हैं. मैले कपड़ों के बजाय अब वे एक ढंग के शॉर्ट्स और टी शर्ट पहनते हैं.
उनसे मिलने आनेवाले दोस्तों के साथ वो हँसकर बातें करते हैं औरे उन्हें चाय भी ऑफ़र करते हैं. उनसे यह पूछे जाने पर कि आगे चलकर वे क्या करना चाहते हैं, वे कहते हैं, "मैं बच्चों को पढ़ाना चाहता हूँ."
लक्ष्मीप्रिया मिश्र
धरित्री और श्रीजीत की तरह उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भिक्षावृति को अपनाने वाली एक और महिला हैं लक्ष्मीप्रिया मिश्र.
धरित्री की तरह वे भी धड़ल्ले से अंग्रेज़ी बोलती हैं. लेकिन साथ ही वे संस्कृत के कई श्लोक भी गड़गड़ाकर बोल लेती हैं.
उनकी वेशभूषा को देख कोई सोच भी नहीं सकता है कि पुरी बालिका विद्यालय में पाँच साल तक टीचर रह चुकीं यह महिला कभी गुजरात और इथियोपिया में स्कूली बच्चों को भौतिकी, रसायन विज्ञान और गणित पढ़ाती थीं.
अपने एकमात्र बेटे को खोने के बाद वे अपना मानसिक संतुलन खो बैठीं और भीख मांगने लगीं.
लक्ष्मीप्रिया कहतीं हैं, "परिवार के नाम पर केवल मेरा एक जवान बेटा था. सात साल पहले वह एक दिन अचानक ग़ायब हो गया और आजतक नहीं लौटा. मैं यह भी नहीं जानती कि वह ज़िंदा भी हैं या नहीं."
मानसिक असंतुलन के अलावा लक्ष्मीप्रिया की आँखें भी काफ़ी कमज़ोर हो गई हैं. पुरी के लायन्स क्लब के कार्यकर्ताओं ने उन्हें इलाज के लिए भुवनेश्वर के एक अस्पताल में भर्ती किया है.
"भिखारी-मुक्त अभियान" के कार्यकर्ता बताते हैं कि केवल पाँच दिनों में एक दर्जन से भी अधिक ऐसे लोगों की पहचान की गई है जिन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भिक्षावृति को अपना लिया. ऐसे ही एक और शख्स हैं प्लास्टिक इंजीनियरिंग में डिप्लोमा धारी भुवनेश्वर के गिरिजा शंकर मिश्र.
आख़िर उच्च शिक्षा के बाद भी भीख मांगने पर क्यों उतर आते हैं लोग?
अभियान के सलाहकार सिद्धार्थ रॉय कहते हैं, "इसके कई कारण हो सकते हैं. एक तो है अभिलाषा या लक्ष्य और उपलब्धि में भारी फ़र्क़. जब किसी को लगता है कि उसके क़ाबिलियत के अनुसार उन्हें फल नहीं मिल रहा तो हताशा उन्हें घेर लेती है. श्रीजीत पाढ़ी को इसी वर्ग में शामिल किया जा सकता है."
रॉय दूसरा कारण हमारी पारिवारिक, सामाजिक और वृतिगत जीवन व्यवस्था की ख़ामियों को बताते हैं जिसके कारण आदमी एक साधारण ज़िंदगी जीने की चाह खो देता है.
वे कहते हैं, "कुछ लोग आध्यात्मिक कारणों से भी ऐसा करते हैं क्योंकि हिन्दू धर्म में भिक्षावृति को धार्मिक इजाज़त मिली हुई है. ये भी सच है कि ऐसे लोगों में कुछ 'एसकेपिस्ट' (पलायनवादी) भी हैं."
लेकिन उत्कल विश्वविद्यालय के मनस्तत्त्व विभाग के सेवानिवृत प्रोफ़ेसर प्रताप रथ इसका कोई और ही कारण दर्शाते हैं.
वे कहते हैं, "हमारे समाज और संस्कृति में 'डिग्निटी ऑफ़ लेबर' यानी श्रम का सम्मान नहीं किया जाता. पश्चिमी विकसित देशों में किसी विश्वविद्यालय में पढ़ानेवाला प्रोफ़ेसर भी बिना किसी संकोच के अपने ख़ाली समय में टैक्सी चलाता है या किसी होटल में काम करता है. वहाँ का समाज भी इसे न्यून दृष्टि से नहीं देखता, जैसा हमारे देश में होता है. भारत में आदमी को जब लगता है कि उसे वह काम, नाम या प्रतिष्ठा नहीं मिल रहा जिसका वह हक़दार है तो वह हताशावादी हो जाता है और समाज के बारे में फ़िक्र करना छोड़ देता है. इसलिए शिक्षित लोगों का भिक्षावृति करना आश्चर्य की बात नहीं है."
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