सपा-बसपा 'गठबंधन' को कांग्रेस की कितनी ज़रूरत?

सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी
    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित

उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों की एकता यानी महागठबंधन की तस्वीर को लेकर एक बार फिर अटकलें शुरू हो गई हैं. इन चर्चाओं का मुख्य मुद्दा ये है कि गठबंधन कांग्रेस के साथ होगा या फिर बिना कांग्रेस के.

जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है तो विधानसभा चुनाव के उत्साहित नतीजों के बावजूद वो यही संकेत दे रही है कि राज्य में बीजेपी को हराने के लिए पार्टी सपा और बसपा के अलावा कुछ छोटे दलों के साथ गठबंधन करके ही चुनाव लड़ना चाहती है लेकिन तीन राज्यों में कांग्रेस सरकारों के शपथ ग्रहण समारोह में समाजवादी पार्टी -बहुजन समाज पार्टी की ग़ैर मौजूदगी ने ऐसी अटकलों को हवा दी है.

इस घटनाक्रम के बाद ये चर्चा गर्म हो गई कि सपा और बसपा कांग्रेस पार्टी को गठबंधन में नहीं रखेंगी और इन दोनों दलों के बीच सीटों का तालमेल भी लगभग हो चुका है. लेकिन सपा और बसपा, दोनों ही दलों के नेताओं ने ऐसे किसी समझौते की बात से इनकार किया है. ख़ुद अखिलेश यादव भी ऐसी अटकलों को ख़ारिज कर चुके हैं.

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी

गठबंधन की उलझी तस्वीर

वहीं दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन के बाद मिली करारी पराजय की वजह से फूंक-फूंककर क़दम रख रही है. पार्टी का मानना है कि उसे गठबंधन में जितनी सीटें मिलने की संभावना है, उससे ज़्यादा सीटें वो अकेले ही लड़कर जीत सकती है.

कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता वीरेंद्र मदान कहते हैं कि फ़िलहाल उनकी पार्टी राज्य की सभी अस्सी सीटों पर लड़ने की तैयारी कर रही है लेकिन यदि आलाकमान गठबंधन के बारे में कोई निर्देश देता है तो राज्य इकाई उसे ज़रूर मानेगी.

दरअसल, सपा नेता अखिलेश यादव कांग्रेस को लेकर उतने आक्रामक अब तक नहीं दिखे हैं लेकिन बीएसपी नेता मायावती अपने विरोधी के रूप में कांग्रेस को बीजेपी के बराबर रखने में सार्वजनिक तौर पर भी कभी कोताही नहीं करती हैं.

तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जब कांग्रेस पार्टी के साथ उनका गठबंधन टूट गया था तो उन्होंने सीधे तौर पर आरोप लगाया था कि कांग्रेस छोटी पार्टियों को ख़त्म करना चाहती है. हालांकि मायावती ने राहुल और सोनिया के प्रति नरमी दिखाते हुए गठबंधन के रास्ते को पूरी तरह से बंद भी नहीं किया था.

मायावती, सोनिया गांधी, ममता बनर्जी और राहुल गांधी

गठबंधन से कांग्रेस को फ़ायदा या नुकसान?

कांग्रेस पार्टी ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीएसपी के साथ गठबंधन नहीं किया, बावजूद इसके उसे इन राज्यों में जीत हासिल हुई. हालांकि राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यदि कांग्रेस ने बीएसपी और सपा को भी साथ में लिया होता तो परिणाम इससे भी बेहतर हो सकते थे. लेकिन इन राज्यों की जीत के बाद कांग्रेस पार्टी में गठबंधन को लेकर वो उत्सुकता नहीं है जैसी कि पहले थी.

ऐसा माना जा रहा है कि गठबंधन में कांग्रेस पार्टी को सपा और बसपा की ओर से अधिकतम दस सीटें दी जा रही हैं. जबकि पार्टी की रणनीति ये है कि वो अपने बड़े और प्रभावी नेताओं को उनके क्षेत्रों से लड़ाने की तैयारी कर रही है. ऐसी स्थिति में उसे इस बात की पूरी उम्मीद है कि वो गठबंधन की तुलना में अकेले लड़कर ज़्यादा सीटें पा सकती है.

वरिष्ठ पत्रकार सुभाष मिश्र कहते हैं कि सीटों के अलावा कांग्रेस को अकेले लड़ने में और भी फ़ायदे नज़र आ रहे हैं, "एक तो हर लोकसभा सीट पर उसे एक नेता मिल जाएगा, दूसरे पार्टी लोकसभा चुनाव के बहाने अपने संगठन को एक बार फिर खड़ा करने की कोशिश कर सकती है. गठबंधन की स्थिति में तो उसे बहुत कम सीटें मिलेंगी और संगठन भी वहीं रह पाएगा, पूरे राज्य में नहीं."

राहुल गांधी

सुभाष मिश्र भी इस बात से इनकार नहीं करते हैं कि कांग्रेस सीटों के मामले में अकेले लड़कर भी गठबंधन की तुलना में ज़्यादा ला सकती है. उधर कांग्रेस के तमाम ज़मीनी नेता भी यही चाहते हैं और लगातार मांग कर रहे हैं कि पार्टी अकेले चुनाव लड़े.

राज्य कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "हमारी पार्टी के कार्यकर्ता तो अकेले लड़ने के पक्ष में हैं लेकिन नेता गठबंधन पर ज़ोर दे रहे हैं. ख़ासकर वो, जो लोकसभा चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं. उन्हें लगता है कि गठबंधन की स्थिति में उनकी जीत सुनिश्चित हो जाएगी."

सुभाष मिश्र का कहना है कि सपा और बसपा साथ मिलकर बीजेपी को नुकसान पहुंचाएंगे, ये तय है. उनके मुताबिक, इससे कोई बहुत फ़र्क नहीं पड़ता कि कांग्रेस गठबंधन में आती है या नहीं. वो कहते हैं, "बीजेपी और कांग्रेस का ठोस वोटबैंक लगभग एक जैसा है यानी अगड़ी जातियां. सपा और बसपा के एक साथ आने पर दलित, पिछड़ों और अल्पसंख्यक मतों का कम से कम विभाजन होगा."

मायावती और अखिलेश यादव

मुक़ाबला त्रिकोणीय हुआ तो बटेंगे वोट

लेकिन यहां ये सवाल भी महत्वपूर्ण है कि बीएसपी की तुलना में सपा अपने मतों को कितना दूसरे को दिला सकती है. वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं कि बीएसपी नेता मायावती को इस बात की पूरी आशंका पहले भी थी और अभी भी है. उनके मुताबिक, मायावती की ये आशंका विधान परिषद और राज्य सभा चुनाव के दौरान और पुख़्ता हो गई थी जब सपा, बीएसपी उम्मीदवार को नहीं जिता पाई थी.

जानकारों का ये भी कहना है कि सपा और बसपा के लिए राज्य में बीजेपी और कांग्रेस में से किसी का भी मज़बूत रहना नुकसानदायक है लेकिन वोटों का विभाजन रोकने की विवशता ही उन्हें कांग्रेस से गठबंधन के लिए प्रेरित कर रही है. त्रिकोणात्मक संघर्ष में निश्चित तौर पर मतों का बंटवारा होगा.

शरत प्रधान कहते हैं, "दरअसल, दोनों ही पार्टियों को पता है कि यूपी में कांग्रेस की मज़बूती का मतलब है, इन दोनों पार्टियों का कमज़ोर होना. ख़ासकर मायावती के पास तो लगभग वही वोट बैंक भी है जो कभी कांग्रेस का हुआ करता था. लेकिन अभी इन तीनों दलों के सामने अस्तित्व का संकट है. इसलिए लोकसभा चुनाव में साथ आना इनकी मजबूरी है. दूसरे, ये उसका सीधा लाभ भी देख रहे हैं. लेकिन इन दोनों पार्टियों के नेता जिस क़दर भ्रष्टाचार के आरोपों की जद में फँसे हैं, सत्तारूढ़ सरकार इनसे कुछ भी करा सकती है. "

मायावती, ममता बनर्जी, राहुल गांधी, चंद्रबाबू नायडू

गठबंधन नहीं हुआ तो बीजेपी को फ़ायदा

हालांकि गठबंधन से कांग्रेस को अलग रखने के लिए अन्य राज्यों में विपक्षी नेताओं की सक्रियता भी कहीं न कहीं ज़िम्मेदार है. ये चर्चा भी काफ़ी तेज़ी से चल रही है कि महागठबंधन की बजाय मायावती एक तीसरे मोर्चे के लिए प्रयासरत हैं. इस मोर्चे में अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, शरद पवार, लालू यादव, चंद्रबाबू नायडू जैसे उन नेताओं को शामिल किया जा सकता है जो कांग्रेस और बीजेपी दोनों से बराबर दूरी रखते हैं.

लेकिन जानकारों का मुताबिक, मौजूदा परिस्थिति में ऐसे किसी मोर्चे के ज़रिए विपक्षी मतों का बिखराव होगा और बीजेपी को इसका सीधा फ़ायदा होगा.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के मुताबिक, पिछले दिनों हुए फूलपुर, गोरखपुर, कैराना और नूरपुर के उपचुनाव ये साफ़ दिखाते हैं कि गठबंधन करके उत्तर प्रदेश में बीजेपी को आसानी से रोका जा सकता है. लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि सभी दलों को एक साथ आना, खासकर कांग्रेस का.

राहुल गांधी और विपक्ष के दूसरे नेता

क्या कहते हैं आंकड़े

यदि 2014 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों को देखें, तो कांग्रेस भले ही यूपी में कमज़ोर दिखती हो लेकिन कई सीटों पर उसकी पकड़ मजबूत है. 2014 में बीजेपी ने अकेले दम पर 71 सीटों के साथ 42.63 फ़ीसदी वोट हासिल किए थे. समाजवादी पार्टी को 22.35 फ़ीसदी वोट और पांच सीटें मिली थीं लेकिन बीएसपी को 19.7 फ़ीसदी वोट मिलने के बावजूद वो एक भी सीट नहीं जीत पाई.

वहीं कांग्रेस महज़ 7.53 फ़ीसदी मतों के बावजूद दो सीटें जीतने में क़ामयाब हो गई थी. यही नहीं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कई सीटों पर उसने बीजेपी को कड़ी टक्कर भी दी थी और कांग्रेस पार्टी को 2019 में ये उम्मीद और भी ज़्यादा सकारात्मक दिख रही है. जानकारों का कहना है कि इस इलाक़े में कांग्रेस पार्टी भीम आर्मी और राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन करके कथित महागठबंधन की तुलना में कहीं ज़्यादा फ़ायदा ले सकती है.

मायावती और सोनिया गांधी

बीएसपी से बीजेपी में गए एक वरिष्ठ नेता नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं कि कांग्रेस से मायावती को हमेशा से ही ख़ौफ़ रहा है कि कहीं वो उसके वोट बैंक पर दोबारा कब्ज़ा न जमा ले. इनके मुताबिक मायावती कांग्रेस से गठबंधन से पहले सौ बार सोचेंगी लेकिन ये भी सही है कि इस समय राजनीतिक सौदेबाज़ी और नफ़े-नुकसान से ज़्यादा अस्तित्व का सवाल है. और ये सवाल बहुजन समाज पार्टी के सामने सबसे ज़्यादा गंभीर होकर खड़ा है.

उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता ज़ीशान हैदर कहते हैं, "कांग्रेस से ज़्यादा महागठबंधन की ज़रूरत सपा और बसपा को है. साथ आने पर इन्हीं दलों का ज़्यादा लाभ होगा क्योंकि कांग्रेस की वजह से विपक्षी मतों का बिखराव नहीं होगा. दूसरे, कांग्रेस तो अपनी कमी की भरपाई दूसरे राज्यों से भी कर सकती है, ये पार्टियां कहां से करेंगी?"

बहरहाल, गठबंधन का स्वरूप क्या होता है ये आने वाले दिनों में तय हो जाएगा लेकिन जानकारों का कहना है कि यूपी में पिछले एक साल के भीतर हुए उपचुनाव और हाल ही में तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में विपक्षी गठबंधन की ताक़त और अलग लड़ने के प्रभाव का लिटमस टेस्ट तो हो ही चुका है.

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