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आधार पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से कौन खुश और कौन नाराज़?
आधार की अनिवार्यता और उससे निजता के उल्लंघन पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फ़ैसला तो सुना दिया है लेकिन जानकार मानते हैं कि इस फ़ैसले में कई चीज़ें अब भी स्पष्ट नहीं हुई हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार यानी आज आधार नंबर की अनिवार्यता पर फ़ैसला सुनाते हुए कहा, "आधार नंबर संवैधानिक रूप से वैध है."
हालांकि पांच जजों की संवैधानिक पीठ में से एक, जस्टिस चंद्रचूड़ ने अलग राय जताते हुए आधार को असंवैधानिक माना. उन्होंने कहा कि आधार एक्ट को धन विधेयक की तरह पास करना संविधान के साथ धोखा है.
सिटिज़न फ़ोरम फ़ॉर सिविल लिबर्टीज़ के संयोजक डॉ. गोपाल कृष्ण कहते हैं कि भले ही सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुना दिया हो लेकिन इस फ़ैसले के साथ ही इस पर सवालिया निशान भी लग गया है. हालांकि उन्होंने ये ज़रूर कहा है कि यह फ़ैसला आम लोगों के हित को ध्यान में रखकर लिया गया है.
एक ओर जहां राजनीतिक महकमों में आधार पर आए फ़ैसले को लेकर उहापोह है वहीं लोगों में भी एक मत नहीं है. एक वर्ग इस फ़ैसले के समर्थन में है, वहीं एक तबका इसका पक्षधर नहीं है.
सामाजिक कार्यकर्ता अश्विनी कुलकर्णी इस फ़ैसले का स्वागत करती हैं.
अश्विनी कहती हैं कि आज सुप्रीम कोर्ट का जो निर्णय आया है उससे समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े शख़्स को भी सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सकेगा. साथ ही डेटा प्रोटक्शन के लिहाज़ से जो चिंता एक आम नागरिक को रहती है, वो भी कम होगी.
वो कहती हैं, "हमसे जुड़ी जो जानकारी हमसे ली जाती है, हमें इसकी कोई गारंटी नहीं दी जाती है कि उन जानकारियों की सुरक्षा की जाएगी या वे जानकारियां किसी और तक नहीं पहुंचेगी. इसलिए एक ऐसे क़ानून की सख़्त ज़रूरत है जो हम से जुड़ी तमाम जानकारियों की सुरक्षा कर सके और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में एक ऐसे क़ानून बनाने की बात कही गई है."
वहीं मुंबई स्थित समाजसेवी उल्का महाजन भी इस फ़ैसले पर अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करती हैं.
लेकिन टैक्स भरने वालों के लिए अनिवार्य
बतौर उल्का, आम लोगों के लिए मोबाइल कनेक्शन और बैंक अकाउंट से आधार को जोड़ना एक बड़ा मसला था. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने जो राहत दी है, वो वाकई बड़ी है. इसके अलावा सेक्शन 57 का प्रावधान हटाया जाना भी स्वागत योग्य है. हालांकि इस फ़ैसले को लेकर उल्का के कुछ सवाल भी हैं.
वो कहती हैं, "आधार को पैन कार्ड और टैक्स रिटर्न फ़ाइल करने के लिए अनिवार्य कर दिया गया है. अब इस स्थिति में तो अनकहे तौर पर भी ज़्यादातर आबादी के लिए ये अनिवार्य हो ही जाता है. लेकिन जो याचिका थी उसमें तो यही कहा गया था कि यह अनिवार्य न हो. ऐसे में इस फ़ैसले से स्पष्ट हो जाता है कि कोर्ट ने इसे पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है, जो बेशक़ चिंता की बात है."
अश्विनी की तरह उल्का भी डेटा प्रोटेक्शन की बात पर खुशी ज़ाहिर की है.
हालांकि आईआईएम में प्रोफ़ेसर और अर्थशास्त्री रीतिका खेड़ा इससे अलग मत रखती हैं.
उन्होंने कहा, "जस्टिस चंद्रचूड़ की तरह मुझे भी यही लगता है कि यह असंवैधानिक है और ये निजता के अधिकार का हनन करता है."
जो दिक्क़तें हुईं, उनका क्या: ज्यां द्रेज़
रीतिका के मुताबिक, निजता के अधिकार का हनन लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है. वह कहती हैं कि आगे भी आधार के ख़िलाफ उनकी लड़ाई जारी रहेगी.
वो कहती हैं, "जस्टिस चंद्रचूड़ का जो फ़ैसला है वो बहुमत का फ़ैसला होता तो बेहतर होता लेकिन.... सरकार दावा करती है कि जिन लोगों ने आधार में अपना नाम पंजीकृत कराया, स्वेच्छा से कराया लेकिन ऐसा नहीं है. सबको कोई न कोई डर दिखाया गया. लेकिन अच्छी बात है कि अब कुछ मौलिक ज़रूरतों के लिए आधार की ज़रूरत नहीं लेकिन अभी इसमें बहुत से सुधार की गुंजाइश है."
वहीं अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से ग़रीब वर्ग को कुछ राहत तो ज़रूर मिलेगी लेकिन जो मुख्य मु्द्दे थे उन पर अब भी कोई ख़ास सुधार नहीं हुआ है.
"एक ओर जहां ये कहा जा रहा है कि अब आधार अनिवार्य नहीं है लेकिन डीबीटी और पैन कार्ड के लिए इसे अनिवार्य करके एक तरह से तो आप इसे अनिवार्य ही कर रहे हैं."
दूसरा मुद्दा निजता का है. जो अब भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो सका है. इसके साथ ही ग़रीबों को इसके चलते बीते सालों में जिन दिक्क़तों से गुज़रना पड़ा उस पर भी बहुत कुछ नहीं कहा गया.
आधार पर आए फ़ैसले को लेकर लोगों के अपने-अपने मत हैं लेकिन बहुत सी जगहों पर इसकी अनिवार्यता को ख़त्म करके कोर्ट ने राहत तो दी ही है.
लेकिन गोपाल मानते हैं कि अभी बहुत सी चीज़ें उलझी हुई हैं और इसके लिए आगे सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू-पिटीशन या फिर स्पष्टीकरण याचिका डाली जा सकती है.
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