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नज़रिया: 'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुद्दे बहुत गिनाए, पर नया संदेश नहीं था'
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के 72वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सवा घंटे से लंबे अपने संबोधन में ढेर सारे मुद्दों की चर्चा की. प्रधानमंत्री के रूप में अपनी और एनडीए सरकार की 'बेमिसाल कामयाबी' की फ़ेहरिस्त पेश की.
उनका कहना था कि 2013 के बाद से देश काफी बदला है. हर क्षेत्र में अभूतपूर्व तरक्की हुई है. लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, औद्योगिक विकास, शांति व्यवस्था या समावेशी विकास के क्षेत्र में सरकार ने ठोस तौर पर क्या कुछ किया, इस बारे में आधिकारिक और प्रामाणिक ढंग से कुछ नहीं बताया. वह किसी चुनावी रैली के भाषण की तरह राजनीतिक था. उसमें व्यापकता, गहराई और गरिमा की कमी नज़र आई!
सबसे बड़ी बात है कि प्रधानमंत्री के मौजूदा कार्यकाल का लालकिले की प्राचीर से यह आखिरी भाषण था, पर उसमें कोई नई बात या नया संदेश नहीं था.
अपनी सरकार की एक अति महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य योजना 'आयुष्मान भारत' पर उन्होंने काफ़ी कुछ कहा, पर देशवासियों को इस योजना के बारे में प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और स्वास्थ्य मंत्री न जाने कितनी बार पहले भी बता चुके हैं. सरकार की तरफ से इसका बहुत व्यापक प्रचार पहले किया जा चुका है.
25 सितम्बर से लागू की जाने वाली नई स्वास्थ्य योजना (आयुष्मान भारत) का पहला ऐलान केंद्रीय वित्त मंत्री के रूप में अरुण जेटली ने पिछले फरवरी महीने में पेश सरकार के वार्षिक बजट किया था. तब से लगातार इस राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना का प्रचार जारी है.
इस योजना के तहत तकरीबन 10 करोड अपेक्षाकृत गरीब परिवारों को 5 लाख रुपये प्रतिवर्ष का स्वास्थ्य-कवर प्राप्त होगा. यह एक बीमा-आधारित योजना है, फसल बीमा योजना की तरह.
इस योजना में केंद्र और राज्य सरकारें परिवारों के बीमा प्रीमियम की अदायगी आदि में योगदान करेंगी. ऐसी योजनाएं ज़रूरतमंदों के बजाय आमतौर पर बीमा कंपनियों को ही फ़ायदा पहुंचाती हैं. सरकारी तंत्र और बीमा कंपनियों के बीच एक तरह का दृश्य-अदृश्य गठबंधन कायम हो जाता है. देखना होगा कि इस बहुत प्रचारित योजना का हश्र क्या होता है.
बुनियादी स्वास्थ्य ढाँचे की कमी
दूसरी बड़ी समस्या है, अपने देश में स्वास्थ्य सेवाओं के आधारभूत ढांचे, अस्पतालों और संस्थानों की कमी का. यूपी, झारखंड और बिहार जैसे बड़े प्रदेशों में जिला और मंडल स्तर के अस्पतालों की स्थिति दयनीय है.
'आयुष्मान भारत' के योजनाकारों ने बीमा आधारित योजना बनाते समय इस पहलू पर क्या ध्यान दिया? अनेक लोग प्रधानमंत्री जी को व्यावहारिक और ज़मीनी राजनीतिज्ञ कहते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में बहुप्रचारित स्वास्थ्य योजना के क्रियान्वयन की इस ख़ास चुनौती की कोई चर्चा नहीं की. फिर सरकार के इस दावे में कितना दम है कि इस योजना से 10 करोड़ परिवारों के 50 करोड़ लोग लाभान्वित होंगे?
'स्वच्छ भारत' योजना के तहत देश में सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण एक अच्छी और ज़रूरी पहल है. यह बात सही है कि पहले इस पर ध्यान नहीं दिया गया, लेकिन फसल बीमा या किसानों को अन्य राहत देने के सरकारी दावे बेमतलब लगते हैं, किसानों की आत्महत्याएं जारी हैं.
पूरे देश में कृषि क्षेत्र गतिरोध और संकट का शिकार है. सच तो ये है कि मौजूदा सरकार ने अपने सवा चार सालों के कार्यकाल में कुछ बड़े कॉरपोरेट घरानों के आर्थिक सुदृढ़ीकरण, 'हिंदुत्व' के नाम पर सामाजिक विभाजन और विभेदीकरण के एजेंडे पर ही ज्यादा ज़ोर दिया. किसानों, मजदूरों और नौजवानों के वास्तविक मुद्दों को संबोधित करने में उसने बहुत कम दिलचस्पी दिखाई.
महिलाओं के मुद्दों के नाम पर वह सिर्फ़ 'तीन तलाक़' तक सीमित रही. ऐसा लगा कि उसका सारा जोर 'मुस्लिम सामाजिक सुधार' में है पर हिंदू धर्मावलंबियों के बीच सुधार का उसने कभी उल्लेख तक नहीं किया. उसने सिम्मी से लेकर जाकिर नाइक तक पर लगाम लगाई, पर सनातन संस्था और गोरक्षा के नाम पर हत्या और खून-खराबा करने वाले गोगुंडों की निजी वाहिनियों पर खामोश रही.
प्रधानमंत्री जी ने यह तो बताया कि पहले 'रेड टेप' था, अब 'रेड कार्पेट' है लेकिन इससे औद्योगिक विकास की गति कितनी बढ़ी, रोजगार कितना सृजित हुआ और उससे सरकार को राजस्व कितना आया? खासतौर पर इसलिए कि इस वक्त देश में एनपीए को लेकर मौजूदा सरकार पर लगातार सरकार उठाये जा रहे हैं.
मेहुल 'भाई' चोकसी तो एंटीगा नामक एक देश के सम्मानित नागरिक बन चुके हैं. ये बात भी सामने आ गई है कि उनके वहां जाने और बसने में मौजूदा सरकारी एजेंसियों ने किस तरह उनकी मदद की. विजय माल्या सहित कई कॉरपोरेट कप्तान अपने बैंकों से अरबों का कर्ज़ लेकर देश से बाहर बस गए हैं.
गोगुंडों पर चुप्पी
वे किसी भी हालत में कर्ज़ चुकाने को तैयार नहीं. दूसरी तरफ, छोटे-छोटे कर्ज के जाल में फंसे लाखों किसान और नौजवान आत्महत्या कर रहे हैं. प्रधानमंत्री जी, भारत आज वैश्विक स्तर पर आत्महत्याओं और बलात्कारों के लिए कुख्यात हो रहा है. आप कह रहे हैं कि देश बहुत समृद्ध और खुशहाल हुआ है.
अगर समृद्धि का मतलब सिर्फ़ कॉरपोरेट के पूंजी विस्तार से है तो बात सही है कि इस वक्त एशिया के सर्वाधिक खरबपति अपने मुल्क में हैं पर गैरबराबरी के मामले में हम दुनिया के 180 मुल्कों के बीच 135वें नंबर हैं.
शिक्षा और स्वास्थ्य पर हम दुनिया के तमाम लोकतांत्रिक देशों में सबसे कम खर्च करते हैं. दुनिया के 'हंगर इंडेक्स' में भी अपने देश की स्थिति शर्मनाक नज़र आती है. देश की राजधानी दिल्ली में छोटी-छोटी बच्चियां भूख से मर जाती हैं. इन आंकड़ों से हमारी दुर्दशा का अनुमान लगाया जा सकता है.
प्रधानमंत्री जी ने महिलाओं की स्थिति में सुधार का जिक्र किया और अपनी सरकार की पीठ थपथपाई, पर स्वयं केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि भाजपा-शासित मध्य प्रदेश, यूपी, राजस्थान और हरियाणा जैसे सूबों में बलात्कार के अपराधों में तेज़ी से इजाफा हो रहा है. सरकारों की मदद से चलाते जा रहे शेल्टर होम भी बलात्कार के अड्डे बन गये हैं.
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में अगली औद्योगिक क्रांति का भारत नेतृत्वकर्ता हो, इसके लिए अधीरता जाहिर की, पर 'माब लिंचिंग', गोगुंडई, जाति उत्पीड़न, महिला-दमन, दलित-आदिवासी शोषण और सांप्रदायिक उन्माद से भरे समाज को औद्योगिक क्रांति की अगुवाई के लिए कैसे तैयार करेंगे?
भारत जैसे विविधता भरे समाज को एक खुशहाल राष्ट्र-राज्य और सुसंगत लोकतांत्रिक देश के रूप में कैसे विकसित किया जाय, क्या रास्ता और रणनीति हो, 72वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आज हमें इन सवालों पर ज्यादा संजीदा और वस्तुगत होकर सोचने-समझने की ज़रूरत है.
प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन में इन चुनौतियों और सवालों का ठोस जवाब नहीं मिलता. उनका पूरा संबोधन अपनी सरकार की बड़ाई और अतीत की कमज़ोरियों की आलोचना पर केंद्रित है. राष्ट्र के बड़े सवालों पर उसमें किसी तरह का गहन चिंतन नहीं नहीं नजर आता.
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