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नोटबंदी: पहले से सुस्त रियल इस्टेट की कमर टूटी
पेशे से इंजीनियर रहे आमिर ज़ैदी का बरसों पुराना सपना और चार साल की दौड़-धूप सार्थक होने की कगार पर पहुंची ही थी कि आठ नवंबर, 2016 की तारीख़ आ गई.
हसरत मोहानी, चंद्रशेखर आज़ाद और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के शहर उन्नाव में लॉन्च होने वाले आमिर ज़ैदी के हाउसिंग प्रोजेक्ट के बारे में 'कभी हर रोज़ 10-15 लोग पूछताछ के लिए आते थे, लेकिन उस दिन के बाद से क़रीब दो-तीन माह तक तो कोई फटका भी नहीं.'
ज़ैदी को उम्मीद है कि उनका प्रोजेक्ट जनवरी तक शायद शुरू हो जाए, क़रीब साल भर से ज़्यादा की देरी से!
कानपुर से सटे उन्नाव से तक़रीबन 483 किलोमीटर से दूर उत्तर प्रदेश के ही दूसरे शहर नोएडा में कम से कम दो लाख फ्लैट ऐसे हैं जिनका कोई ख़रीदार नहीं.
ख़रीदार का इंतज़ार करते फ्लैट
आमिर ज़ैदी कहते हैं, "500 और 1000 रुपयों के नोट पर बैन के ऐलान के बाद सबसे पहले तो लोग बैंकों में पैसा जमा कराने में लग गये, उसके बाद मुझे लगता है कि इन्वेस्टमेंट करने में एक हिचकिचाहट भी है. शायद टैक्स के मामलों को लेकर परेशान किए जाने का डर लोगों में कहीं से समा गया है."
अमेडस नाम की कंस्ट्रक्शन कंपनी के मालिक अनिर्बान साहा कहते हैं, "रियल स्टेट को इन्वेस्टमेंट रिटर्न के लिए सबसे बेहतर क्षेत्र माना जाता था लेकिन स्थिति अब वो नहीं रही. रियल स्टेट अब सबसे अधिक मुनाफ़ा कमाने वाला क्षेत्र नहीं रहा इसलिए उसका फर्क़ पड़ा है."
अनिर्बान साहा बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, "दूसरे लोगों के पास आमदनी का वो हिस्सा जो ख़र्च के लिए उपलब्ध होता है उसका बड़ा हिस्सा कैश में हुआ करता था अब वो अनुपात बिगड़ गया है."
"नोटबंदी से रियल स्टेट में कैश लेन-देन की जो गुंजाइश होती थी उससे फ़र्क़ तो पड़ा है,' प्रॉपटी डीलर रमेश जोशी अनिर्बान की बात से सहमत दिखते हैं और साथ ही कहते हैं 'लेकिन इसकी वजह से रियल स्टेट पर जब भी ब्लैक मनी की बात होती थी तो उंगली भी उठती थी.'
क़ीमत में गिरावट
रमेश जोशी के मुताबिक़ पहले रियल स्टेट में कई तरह के रेट होते थे - जैसे प्रशासन के ज़रिये ख़ास क्षेत्रों के लिए तय की गई क़ीमत, और, फिर बाज़ार का भाव; और दोनों में काफ़ी फ़र्क़ हुआ करता था, कई मामलों में तो सरकारी तय क़ीमत की तिगुनी-चौगनी. चूंकि अब कैश के लेन-देन होने की गुंजाइश पहले के बनिस्बत कम हुई है तो दोनों के फर्क़ में कमी आई है.
हालांकि इस गिरती क़ीमत को लोग ख़रीदारों के लिए फ़ायदे का सौदा बता रहे हैं, कुछ का ये मानना है कि निवेश के इरादे से प्रॉपर्टी खरीदने वाले लोग अब उसे पहले की तरह फायदे का सौदा नहीं मानते.
बाज़ार से जुड़े लोगों का कहना है कि अब ज्यादातर घर या फ्लैट वही लोग खरीद रहे हैं, जिन्हें उसमें रहना होता है.
ज़ाहिर है इससे रियल इस्टेट सेक्टर में पैसा पहले की तरह नहीं आ रहा है और जब पैसे नहीं लगेंगे तो क्षेत्र का विकास या तो रुक जाएगा और कम से कम धीमा तो पड़ेगा ही. यहां ये बात याद रखने की ज़रूरत है कि रियल इस्टेट में साल 2013-14 के आसपास से पहले से ही धीमापन देखने को मिल रहा था.
तबसे जारी अर्थव्यवस्था में सुस्ती ने दूसरे क्षेत्रों की तरह रियल इस्टेट पर भी अपनी काली छाया फैला दी थी. साथ ही बिल्डरों ने ख़रीदारों से पैसे लेकर दूसरे नए प्रोजेक्ट्स में लगा दिए थे जिसका नतीजा ये हुआ ख़रीदारों में भरोसे की कमी.
ख़रीदारों की परेशानी
एक तरफ़ जहां बिल्डरों को ग्राहक नहीं मिल रहे हैं, वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो मकान की किश्त और किराया एक साथ भर रहे हैं क्यों कि उनके बिल्डर ने उन्हें वक्त पर फ्लैट नहीं दिए.
तीस हज़ारी और दिल्ली हाई कोर्ट में वकालत करने वाले शिव नाथ ने 2012 में दो कमरों का एक फ्लैट गाज़ियाबाद के एक तैयार हो रहे प्रोजेक्ट में लगाया, उन्हें घर की चाभी 2016 में मिलनी थी लेकिन अब जबकि साल 2017 ख़त्म होने को है उन्हें नहीं मालूम कि अपने घर में रहने का उनका सपना कब पूरा होगा!
शिव नाथ कहते हैं, "फ़िलहाल तो मुझे जिस फ्लैट में रह रहा हूं उसके किराये के अलावा ख़रीदे गये फ्लैट की क़िस्त भी चुकानी पड़ रही है. जिसने मेरी माली हालत पस्त कर दी है."
तो क्या सरकारी और बिल्डर के रेट के फर्क़ में कमी आने से काला धन को रोकने में सफ़लता हासिल हुई है जो नोटबंदी के लिए सरकार के कई कथित उद्देश्यों में से एक था?
नाम न बताने की शर्त पर दिल्ली से बाहर के एक ख़रीदार कहते हैं, "बिल्डरों के पास नकदी खपाने के अभी भी बहुत से रास्ते खुले हैं, इसलिए ये नहीं कहा जा सकता कि बिना हिसाब की नकदी आना बंद हो गया है. "
जी नहीं, कैश का लेन-देन अब भी जारी है. आप बिल्डर के पास जाएं और उससे कहें कि आपके पास अतिरिक्त कैश है तो वो आपकी बुकिंग बैक डेट में करके बाक़ी का पैसा कैश में ले लेगा.'
'कैश ज़रूरी है'
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के रियल इस्टेट में ठेकेदार का काम करनेवाले जितेंद्र कुमार कहते हैं, 'सुधार के नाम पर ये बर्बादी है.'
'सरकार को समझना होगा कि इस क्षेत्र के लिए कैश ज़रूरी है,' जितेंद्र कुमार अपनी बात समझाने के लिए कहते हैं, "आख़िर मज़दूरों को या कंस्ट्रक्शन में काम आनेवाले माल जैसे सरिया, रेत वग़ैरह की ख़रीद के लिए कैश की ज़रूरत है."
वो कहते हैं कि ये असंगठित क्षेत्र है जिसका बड़ा हिस्सा मज़दूरों के सहारे काम करता है और उसके पास कहां बैंक खाता, कहां पेटीएम?
कुमार कहते हैं, 'पहले मेरे पास ख़ुद 100 के आसपास मज़दूर काम किया करते थे लेकिन अब मुश्किल से 15-20 बचे हैं, बाक़ी सब गांव जाकर बैठ गए हैं. मज़दूर को काम ख़त्म होते ही शाम को कैश चाहिए, अगर आप उससे बैंक खाते या चेक देने की बात भर भी कर लें तो वो दूसरे दिन सामान लेकर ग़ायब हो जाता है.'
रियल इस्टेट से जुड़े लोगों का कहना है कि नोटबंदी की मार के बाद जो रही सही कमी रह गई थी वो जीएसटी ने पूरी कर दी है. हालांकि रियल इस्टेट पर जीएसटी नहीं लगा है लेकिन बिल्डिंग में इस्तेमाल होने वाली चीज़ो पर ये लागू है.
'इस क्षेत्र में एक बड़ा वर्ग उतना पढ़ा लिखा नहीं है और उसके लिए इन क़ाग़ज़ातों को भरना इतना आसाना नहीं, दूसरे जीएसटी ने हर चीज़ की क़ीमत बढ़ा दी है जिससे लागत में बढ़त हो रही है.'
वो कहते हैं, 'घर बनेगा तब तो लोगों को मिलेगा ना.'
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